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Raju Srivastava Death: राजू के जाने से अनाथ हो गए कानपुर के गजोधर, पप्पू, छुट्टन और पुत्तन!

सार

Raju Srivastava Death: राजू श्रीवास्तव के परिवार से गहरा ताल्लुक रखने वाले विजय उपाध्याय कहते हैं कि कानपुर के यशोदा नगर की गलियां सूनी हो गईं और न जाने कितने छुट्टन, पुत्तन, पप्पू, गजोधर अनाथ हो गए। राजू चाचा की कानपुर पर इतनी जबरदस्त पकड़ थी कि वह यहां के निर्जीव वस्तुओं में भी अपनी कलाकारी के माध्यम से जान डाल देते थे...
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raju srivastava - फोटो : social media
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विस्तार
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गजोधर...अरे ओ गजोधर...तनिक सुनौ...अऊ छुट्टन कहां है...पुत्तन का बुलाओ...पप्पू का भी...राजू श्रीवास्तव का नाम जब सबसे पहले जेहन में आता है, तो दिमाग में उनकी तस्वीर के साथ एक कई नाम चलने लगते हैं। जिसमें सामने आते हैं गजोधर...छुट्टन, पुत्तन और पप्पू जैसे तमाम अनगिनत नाम, जो कानपुर की गलियों में आज भी आपको राह चलते मिल जाएंगे। राजू श्रीवास्तव की मृत्यु के बाद उनके परिवार से करीबी ताल्लुक रखने वालों ने बताया कि राजू जिन नामों का अकसर जिक्र करते थे, दरअसल वे कोई और नहीं बल्कि उनकी गलियों और उनके शहर-मोहल्ले के ही उनके अपने जानने वाले लोग थे। दरसल राजू अपने अंदर समूचे कानपुर को बसाकर घूमते थे।

एक्टिंग का सभी मानते थे लोहा

राजू श्रीवास्तव के परिवार से गहरा ताल्लुक रखने वाले कानपुर के विजय उपाध्याय कहते हैं कि रिश्ते में राजू उनके चाचा थे। दिल्ली एम्स में उनकी मृत्यु के बाद कानपुर में जैसे ही यह खबर पहुंची, तो उनके इलाके में जहां कभी राजू रहा करते थे, मातम पसर गया। विजय कहते हैं कि कानपुर के यशोदा नगर की गलियां सूनी हो गईं और न जाने कितने छुट्टन, पुत्तन, पप्पू, गजोधर अनाथ हो गए। विजय बताते हैं कि राजू चाचा की कानपुर पर इतनी जबरदस्त पकड़ थी कि वह यहां के निर्जीव वस्तुओं में भी अपनी कलाकारी के माध्यम से जान डाल देते थे। वह बताते हैं, जब राजू चाचा कानपुर आते थे, तो सड़कों पर बैठने वाले छुट्टा जानवरों से लेकर बीच सड़क पर खड़े बिजली के खंभे की भी ऐसी एक्टिंग करते थे कि लगता था कि यह खंबा मानो सच में बोल रहा है।

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राजू श्रीवास्तव के भतीजे के साथ पढ़ने वाले विजय बताते हैं कि राजू चाचा जितने लोगों का नाम अपनी कॉमेडी के दौरान या अपने शो के दौरान लेते थे, दरअसल वो कोई और नहीं बल्कि उनके गली-मोहल्ले के लोग ही थे। वह कहते हैं कि उनके गली में रहने वाले छुट्टन, पप्पू और गजोधर सबको वह करीब से जानते थे। राजू के अंदर हास्य का पुट इतना ज्यादा था कि वह गली-मोहल्ले के लोगों के नाम के साथ ही उनको इस तरीके से संबोधित करते थे कि मानो पूरा कानपुर उनके अंदर समाहित था। कानपुर के ही रहने वाले अनुराग बताते हैं कि आज कानपुर को लेकर जब आप कहीं भी जिक्र करते हैं, तो आपको कानपुर के लोगों के बारे में अलग ही छवि नजर आने लगती है। यह छवि कोई गलत नहीं बल्कि कानपुर के लोगों की वाकपटुता से लेकर उनके सेंस ऑफ ह्यूमर, हाजिर जवाबी और उनके बोलने के अंदाज से लेकर उनके चलने-फिरने, उठने-बैठने तक की हर अदा को अलग बनाती है। अनुराग कहते हैं कि कानपुर की इसी हंसी-ठिठोली और मजाक की खूबसूरत जुगलबंदी को राजू श्रीवास्तव ने न सिर्फ देश बल्कि पूरी दुनिया में एक अलग मुकाम पर पहुंचाया है।

कानपुर को दिया अलग मुकाम

कानपुर के किदवई नगर में रहने वाले हरीश कहते हैं कि आज राजू श्रीवास्तव भले ही इस दुनिया में नहीं हैं, लेकिन हास्य कलाकारों की दुनिया में उन्होंने जो मुकाम बनाया, वह न सिर्फ उन्हें बल्कि कानपुर को एक अलग स्थान दे गया। हरीश बताते हैं कि कानपुर में राजू श्रीवास्तव की तर्ज पर न जाने कितने दूसरे हास्य कलाकार उभरे और उन्होंने न सिर्फ कानपुर बल्कि उत्तर प्रदेश और देश में बड़ा नाम कमाया है। वह कहते हैं कि राजू छोटे शहरों की इस विधा को करीब से पकड़ने में माहिर थे, जो ज्यादातर लोगों के घरों से जुड़ी होती थी। राजू की एक वीडियो के बारे में बात करते हुए हरीश कहते हैं कि उनका दांत खोदते समय...अरे ओ छुट्टन...गजोधर...पप्पू और पुत्तन कहकर संबोधित करना उस हर छोटे शहर और कस्बे से उनको जोड़ देता था, जहां पर ऐसी बात सामान्य थी।

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गली मोहल्ले में आदमी और महिलाओं की होने वाली पंचायतों से लेकर सड़क पर चलने वाले वाहनों और जानवरों की नकल करके हुबहू उसको न सिर्फ पर्दे पर उतार देना, बल्कि अपने लोगों के बीच में उसका चित्रण करना मानो निर्जीव चीजों में भी वह जान डालने जैसा होता था। वह कहते हैं कि राजू श्रीवास्तव का एक शो बहुत पॉपुलर हुआ था,, जिसमें वह सड़क पर बैठी हुई गाय का इंसान के तौर पर चित्रण कर रहे थे। हरीश कहते हैं कि कानपुर की गलियों के अब ना जाने कितने छुट्टन, पुत्तन, गजोधर और पप्पू अनाथ हो गए। यह गांव-कस्बों और छोटे-छोटे शहरों के वह नाम थे, जिन्हें राजू श्रीवास्तव ने देश और दुनिया में एक अलग ऊंचाई दी और इन नामों को वे अमर कर गए।

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