रिजर्व बैंक के गवर्नर रघुराम राजन ने कहा है कि बैंकों के फंसे कर्जो -एनपीए- की सफाई का काम केंद्रीय बैंक को काफी पहले शुरू करना चाहिए था। उनका इशारा इस तरफ था कि इसे पूर्ववर्ती मनमोहन सरकार के समय ही शुरू करना चाहिए था।
राजन ने बीते मंगलवार को रिजर्व बैंक मुख्यालय में दसवें सांख्यिकी दिवस सम्मेलन को संबोधित करते हुए कहा था कि मुद्रास्फीति की तरह, केंद्रीय बैंक की यह -बैैलेंस शीट की सफाई- भी जम्मिेदारी है। उसे बैंकों को ऐसी सफाई के लिए और पहले से ही दबाव डालना चाहिए था।
उन्होंने बताया था कि शुुरूआत में बैंक इसके लिए तैयार नहीं थे। डूबे कर्ज की साफ-सफाई का काम दिसंबर, 2015 में शुरू हुआ था। उस समय रिजर्व बैंक ने 150 ऐसे बड़े खातों की पहचान की थी जिन्हें अपनी ऋण प्रतिबद्धताओं को पूरा करने में समस्या आ रही थी। उनके मुताबिक अच्छी बात यह है कि शुरूआती हिचकिचाहट के बाद बैंक इस काम के लिए तैयार हुए और कुछ तो जो उनसे अपेक्षा थी, उससे भी आगे निकल गए।
राजन ने कहा कि ऋण की समस्या को नजरअंदाज करना आसान था क्योंकि उम्मीद रहती है कि यह किसी तरह से निकल जाएगा। लेकिन कर्ज में हानि की बीमारी बढने की प्रवृत्ति होती है, यह इतनी बढ जाती है कि उसकी अनदेखी करना मुश्किल हो जाता है।
देरी होने पर उसे संभालना आसान नहीं रह जाता है, पूरी बैंकिंग प्रणाली के सामने संकट खड़ा हो जाता है। विशेषज्ञों का कहना है कि राजन का इशारा पूर्ववर्ती मनमोहन सरकार की तरफ है। उनके मुताबिक बैंकों, खास कर सरकारी बैंकों के फंसे कर्जों को साफ करने का काम उसी समय शुरू हो जाना चाहिए था।