रणनीतिक मामलों के जानकार प्रो. सी राजामोहन ने कहा है कि पूर्वी लद्दाख में चीन के दुस्साहस ने भारत के साथ उसके रिश्तों में बुनियादी बदलाव ला दिया है। करीब तीन दशक से आपसी भरोसा कायम करने की आड़ में चीन की जोर आजमाइश और जमीन हथियाने की उसकी नीति भारत को अस्वीकार्य है। उन्होंने कहा कि ज्यादातर देश चीन के साथ आर्थिक सहयोग चाहते हैं, लेकिन उसकी विस्तारवादी नीतियों के कारण उसके साथ ऐसी किसी आर्थिक गतिविधियों में शामिल होने से पीछे हट जाते हैं।
पूर्वी लद्दाख, दक्षिण और पूर्वी चीन सागर में चीन की आक्रामकता का जिक्र करते हुए राजा मोहन ने कहा कि चीन को इसका खामियाजा भुगतना होगा। उसके गलत आक्रामकता को ‘राष्ट्रवादी जवाब’ का सामन करना पड़ सकता है। इसमें क्षेत्र में फिर से सत्ता संतुलन के लिए जोर आजमाइश भी झेलनी पड़ सकती है। एक साक्षात्कार में राजा मोहन ने कहा, मैं समझता हूं कि चीन ने संभवत: एशिया में राष्ट्रवाद के स्वभाव का बुनियादी तौर पर गलत आकलन किया है। उन्होंने कहा कि एशिया में ज्यादातर देश राष्ट्रवादी हैं और भारत भी राष्ट्रवादी है। पूरे दक्षिण पूर्व एशिया में मजबूत राष्ट्रवाद की भावना है।
उन्होंने कहा कि एक राष्ट्र की इच्छा को थोपने के प्रयास की प्रतिक्रिया तो होगी, क्योंकि चीन की तरह ज्यादातर एशियाई देशों ने साम्राज्यवादी ताकतों से लड़ाई लड़ी है। इसलिए वे एशिया में किसी नई शक्ति के प्रभुत्व स्थापित करने के प्रयास को आसानी से नहीं मानेंगे। विख्यात सामरिक मामलों के जानकार ने कहा कि चीन अपने आक्रामक रवैये के कारण कई देशों को अमेरिका के करीब ला दिया है। क्योंकि विश्व बिरादरी अब किसी एक देश के प्रभुत्व को स्वीकार करने को तैयार नहीं है, ऐसे में बीजिंग को बाकी दुनिया के विरोध का सामना करना पड़ेगा।