राहत साहब हमारे दिल के बहुत करीब थे। हमारा और उनका तकरीबन 45 वर्षों का साथ था। उन्होंने हमेशा हमें अपना अजीज समझा। हम उतना अपने घरों में नहीं रहे, जितना उनके साथ महफिलों में वक्त गुजारा है। उनके नाम का आभामंडल इतना चमकदार है कि उसका ख्याल आते ही शायरों और श्रोताओं की धड़कनें बढ़ जाती हैं।
एक ऐसे फनकार, जो अपनी खास नजाकत और अंदाज में अपनी शायरी का मुजाहिरा करते थे। जब वे माइक के सामने होते तो लगता था कि किसी दूसरे शायर की जरूरत ही नहीं है और जैसे ही वह पीठ फेरकर जाने लगते तो पूरी महफिल गगनभेदी तालियों के शोर से गूंज उठती।
उन्होंने उर्दू शायरी का समूचा मिजाज बदलकर रख दिया। उनसे पहले मुशायरों में शायरी तरन्नुम से पढ़ी जाती थी, लेकिन राहत इंदौरी साहब ने अपना अलग अंदाज कायम किया। वह अंदाज था पढ़ने का। वह तरन्नुमशिकन बनकर आए और शायरी की दुनिया पर छा गए।
अपने अंदाज-ए-बयां और जिंदादिली से उन्होंने हर उम्र के श्रोताओं का अपना मुरीद बना लिया। बहुत से लोगों ने उनकी शैली की नकल करने की कोशिश की, मगर राहत, राहत ही रहे। उनकी शायरी मीर और गालिब की जमीन पर पैदा हुई एक अलग तरह की शायरी है। राहत इंदौरी ने अपनी शायरी में नई सोच, और बिंबों के मानकों को नई शक्ल दी। जो कहा, सीना ठोंककर कहा। अपने चुटीले अंदाज में उन्होंने व्यवस्था पर सीधे चोट की।
जहां गए...वहां अपने मुरीद बना लिए
उनका चेहरा और उनके जिस्म की भाषा शायरी के एक-एक शब्द को आवाज देती थी। जैसे-जैसे शायरी के हर्फ बदलते, वैसे-वैसे उनके चेहरे की भंगिमाएं भी। नाचती आंखें, मचलते हाथ और माइक पकड़ने का अपना अलग अंदाज, यही तो असली थाती थी राहत साहब की शायरी की। उन्होंने शायरी के कहने का जो अद्भुत संसार रचा, लोग उसके कायल होते गए।
चाहे देश के मंच हों या विदेशों के, राहत ने अपनी जिंदादिली और नटखट अंदाज से शायरी को जो मुकाम दिया, उसे दोहराना नामुमकिन है। हर मजहब और तबके के लोग उनके दीवाने थे। जिस भी शहर में गए, वहां के लोगों को अपना मुरीद बना लिया। इतनी मकबूलियत हासिल कर पाना किसी और के बस की बात नहीं।
आदमी दुनिया भर में शाेहरतें कमा लेता है, लेकिन राहत साहब जैसा कद पाना कहां नसीब होता है। राहत इंदौरी तो केवल एक ही हो सकता है। वक्त कब किसे उठाकर सातों आसमानों की सैर करा दे, कोई नहीं जानता। राहत साहब वक्त की इसी कसौटी पर कसे हुए कुंदन थे, जिसे शायरी के कद्रदान खूब अच्छे से पहचान लेते हैं।
जब तक मुशायरों की महफिलें रहेंगी, तब तक राहत इंदौरी का वजूद कायम रहेगा। उनके जाने से शायरी में कभी न भरने वाला एक रिक्त स्थान पैदा हो गया है। मेरी दुआ है कि उनके परिवार और चाहने वालों को अल्लाह सब्र दे।