भारतीय नौसेना की ताकत बढ़ाने की दिशा में एक अहम कदम उठाया गया है। राफेल मरीन लड़ाकू विमान ने 29 अक्तूबर को स्वदेशी विमानवाहक पोत आईएनएस विक्रांत पर पहली ही कोशिश में सफल लैंडिंग की। यह लैंडिंग विमान के परिचालन से पहले चल रहे परीक्षणों के दौरान हुई। नौसेना के मुताबिक, इस सफलता के साथ भारतीय विमानवाहक पोत से राफेल मरीन के संचालन की दिशा में परीक्षणों की शुरुआत हो गई है।
भारतीय नौसेना ने बताया कि राफेल मरीन विमान ने आईएनएस विक्रांत पर अपनी पहली कोशिश में ही सफलतापूर्वक लैंडिंग की। फिलहाल विमान को नौसेना में परिचालन के लिए तैयार करने की प्रक्रिया के तहत परीक्षण किए जा रहे हैं।
इससे पहले गोवा में राफेल मरीन के परीक्षण चल रहे थे। इन परीक्षणों का उद्देश्य विमान में उन जरूरी बदलावों की जांच करना था, जिनकी मदद से वह भारतीय विमानवाहक पोत आईएनएस विक्रांत से उड़ान भरने और उस पर उतरने में सक्षम हो सके।
भारत ने 28 अप्रैल 2025 को फ्रांस के साथ करीब 63 हजार करोड़ रुपये का रक्षा समझौता किया था। इसके तहत भारतीय नौसेना के लिए 26 राफेल मरीन लड़ाकू विमान खरीदे जाने हैं। इनमें 22 सिंगल-सीटर और चार ट्विन-सीटर विमान शामिल हैं।
अधिकारियों के मुताबिक, इन विमानों की आपूर्ति 2028 के अंत या 2029 की शुरुआत तक होने की संभावना है। यह भारत की ओर से राफेल के नौसैनिक संस्करण की पहली खरीद है। इस सौदे में पायलटों का प्रशिक्षण, फ्लाइट सिम्युलेटर, हथियार, जरूरी उपकरण और लंबे समय तक रखरखाव की सुविधा भी शामिल है।
राफेल मरीन फ्रांस की कंपनी दसॉ एविएशन का बनाया लड़ाकू विमान है। इसे खास तौर पर समुद्र में विमानवाहक पोत से संचालन के लिए तैयार किया गया है। फ्रांस की नौसेना पहले से इसका इस्तेमाल कर रही है।
इस विमान का इस्तेमाल हवाई सुरक्षा, समुद्री हमले, निगरानी और जमीन पर मौजूद ठिकानों को निशाना बनाने जैसे अभियानों में किया जा सकता है। इसके शामिल होने से भारतीय नौसेना की समुद्री अभियानों को अंजाम देने की क्षमता बढ़ेगी।
भारतीय नौसेना के पास फिलहाल दो विमानवाहक पोत हैं- आईएनएस विक्रांत और आईएनएस विक्रमादित्य। रक्षा समझौते के तहत खरीदे जा रहे राफेल मरीन विमानों को दोनों विमानवाहक पोतों से संचालित करने की योजना है।
समझौते में भारतीय हथियारों को राफेल विमानों के साथ जोड़ने के लिए तकनीक हस्तांतरण का प्रावधान भी शामिल है। यह सरकार के आत्मनिर्भर भारत अभियान के अनुरूप है। इसके अलावा भारतीय वायुसेना के पास पहले से मौजूद राफेल विमानों के लिए अतिरिक्त उपकरण भी इस समझौते का हिस्सा हैं।