ऐसे हुई डील डन!
राफेल लड़ाकू जेट को शुरुआत से ही एयर-टू-एयर और एयर-टू-ग्राउंड अटैक के लिए बहु-भूमिका सेनानी के रूप में डिजाइन किया गया है, परमाणु रूप से सक्षम है और इसका पुनर्निर्माण भी किया जा सकता है। इसके बाद प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी ने पेरिस की यात्रा के दौरान प्रस्ताव की घोषणा के करीब डेढ़ साल बाद अंततः सितंबर 2016 में फ्रांस के साथ एक अंतर सरकारी समझौते पर हस्ताक्षर किए, जिसे 'राफेल सौदा' कहा गया। इसमें भारत ने 36 राफेल डबल-इंजन के लिए 58,000 करोड़ रुपये खर्च दिए। इस लागत का लगभग 15 प्रतिशत अग्रिम भुगतान किया गया। इस समझौते के मुताबिक, भारत को मिसाइल समेत स्पेयर और हथियार भी मिलने की डील हुई।
कांग्रेस हुई आक्रामक
नवंबर 2017 में कांग्रेस ने राफेल विमानों में एक विशाल घोटाले का आरोप लगाया। कांग्रेस ने कहा कि अनुबंध में खरीद प्रक्रिया का उल्लंघन हुआ, कांग्रेस पार्टी ने रक्षा सार्वजनिक क्षेत्र इकाई, हिंदुस्तान एयरोनॉटिक्स लिमिटेड में एनएसई 1.06% की लागत पर 'क्रॉनी पूंजीवादी' को बढ़ावा देने के लिए सरकार को दोषी ठहराया। कांग्रेस ने आरोप लगाया कि फ्रांस के साथ हस्ताक्षरित सौदा प्रौद्योगिकी हस्तांतरण की पूर्ति नहीं करता है और इसने राजकोष को नुकसान पहुंचाया है। राफले सौदे का 50 प्रतिशत ऑफसेट क्लॉज है, जिसका एक बड़ा हिस्सा अनिल अंबानी के स्वामित्व वाली रिलायंस डिफेंस और संयुक्त कंपनियों को बांटा गया।
गरमाता गया मुद्दा
सौदा घोषित होने के तुरंत बाद, कांग्रेस ने भाजपा पर अरबों डॉलर के सौदे में गैर-पारदर्शिता का आरोप लगाया और इसे 'मेक-इन-इंडिया' कार्यक्रम का 'सबसे बड़ी विफलताओं में से एक' कहा। जनवरी 2016 में, भारत ने फ्रांस के साथ रक्षा सौदे में 36 राफेल जेटों के आदेश की पुष्टि की और इस सौदे के तहत, दसाल्ट और इसके मुख्य सहयोगियों के साथ कुछ तकनीक साझा करने की बात कही। इसी तरह तब से कांग्रेस लगातार इस सौदे पर सरकार से जवाब मांग रही है कि राफेल की सही कीमत बताई जाए, वहीं भाजपा राहुल के बयानों में गड़बड़ियां खोज उन्हें सबूत दिखाने के लिए कह रही है। कांग्रेस बनाम भाजपा की 'राफेल' लड़ाई आने वाले लोकसभा चुनाव का बड़ा हथियार है। इसीलिए कांग्रेस इस मुद्दे की जांच के लिए जेपीसी की मांग पर अड़ी है। देखना है कि मोदी सरकार कैसे विपक्ष को जवाब देती है या फिर वाकई ये मामला जेपीसी की जांच से होकर गुजरेगा। बहरहाल कुछ भी हो आने वाली लड़ाई यानी 2019 के लिए 'राफेल' एक बड़ा मुद्दा तो बन ही गया है।