अमेरिका के राष्ट्रीय सुरक्षा सलाहकार जेक सुलविन का वक्तव्य काफी महत्वपूर्ण है। जेक कहते हैं कि चारों राष्ट्राध्यक्षों के बीच चीन द्वारा उत्पन्न की गई चुनौतियों पर चर्चा की गई है। इस बैठक में दक्षिण चीन सागर की स्थिति पर भी चर्चा हुई है। क्वॉड का मुख्य उद्देश्य चारो देशों में आपसी सहयोग को बढ़ाना है। जेक कहते हैं कि हम इसके माध्यम से हिन्द-प्रशांत क्षेत्र में एक ऐसा क्षेत्र बनाने का प्रयास कर रहे हैं जो स्वतंत्र, खुला, समावेशी, स्वस्थ और लोकतांत्रिक मूल्यों से जुड़ा हो। यह क्षेत्र जोर-जबरदस्ती से प्रभावित न हो। जो का इशारा चीन की तरफ है।
जेक के समानांतर चीन के विदेश मंत्रालय के प्रवक्ता चाओ लिजिआन का बयान भी महत्वपूर्ण है। वह साफ कहते हैं कि उम्मीद है, चारों देश एक एक्सक्लूसिव ब्लाक (चीन के खिलाफ) बनाने से बचेंगे और उसी दिशा में आगे बढ़ेंगे, जिससे क्षेत्रीय शांति और स्थिरता प्रभावित नहीं होगी। कुल मिलाकर क्वॉड का स्वरूप अमेरिका, जापान, आस्ट्रेलिया के आर्थिक, व्यापारिक हितों की तरफ अधिक जान पड़ रहा है।
कोविड-19 डिप्लोमेसी और भारत को लाभ
बहुत रोचक विषय है। राष्ट्रपति जो बाइडन ने भी भारत की कंपनी को कोविड-19 वैक्सीन की 1 अरब डोज के लिए आर्थिक सहायता की प्रतिबद्धता दिखाई है। भारत ने अपने तमाम पड़ोसी देशों को कोविड-19 की वैक्सीन उपलब्ध कराई है। कोविड-19 डिप्लोमेसी इस मामले में भारत की कूटनीतिक मददगार हो रही है। अंतरराष्ट्रीय संस्था के जरिए पाकिस्तान को भी इसकी डोज मिलेगी। भारत ने अमेरिका की सलाह, खुद महसूस हुई आवश्यकता के आधार पर पाकिस्तान से भी रिश्ते सुधारने का संकेत देना शुरू किया है। अब सवाल आकर अटकता है कि क्वॉड चीन से पैदा होने वाली चुनौतियों में क्या सहयोग कर सकता है? क्या राष्ट्रपति डोनाल्ड ट्रंप के समय में मिले सहयोग जैसा ही रहेगा या उससे कुछ ज्यादा?
भारतीय रणनीतिक सोच रखने वाले मानते हैं कि अभी तो राष्ट्रपति ट्रंप के दौर जैसा ही रहने की उम्मीद है। अमेरिका या कोई देश भारत के लिए चीन से लड़ने नहीं आएगा। कारण साफ है कि अमेरिका, आस्ट्रेलिया, जापान से चीन के आर्थिक और व्यापारिक रिश्ते हैं। अभी इस रिश्ते की बलि देने के मूड में क्वॉड के ये तीनों देश नहीं है। हां, भारत को आर्थिक सहायता, तकनीकी सहयोग, व्यापारिक लाभ, रक्षा सौदे तथा तकनीक आदि क्षेत्र में बड़ी सहूलियतें मिल सकती हैं। भारत इसके जरिए अपनी क्षेत्रीय, आर्थिक और सैन्य ताकत को बढ़ाने का अवसर प्राप्त कर सकता है। भारतीय सामरिक, आर्थिक, कूटनीतिक समझ रखने वाले अभी इससे अधिक क्वॉड को नहीं देख पा रहे हैं।
भारत का नजरिया और चीन के मंसूबे
जिस दक्षिण चीन सागर की बात हो रही है, भारत की उसको लेकर सदैव एक नीति रही है। भारत दक्षिण चीन सागर में शुरू से स्वतंत्र और भयरहित नौवहन तथा वायुक्षेत्र के इस्तेमाल का पक्षधर है। वह इसे अंतरराष्ट्रीय जल क्षेत्र मानता है। अभी तक भारत ने अपनी इसी नीति के इर्द गिर्द अपनी राय रखी है। इसके समानांतर चीन ने दक्षिण चीन सागर में दो दशक से लगातार अपनी मौजूदगी, सैन्य मौजूदगी बढ़ाने की योजना को जारी रखा है। उसके कदम का न केवल भारत, अमेरिका, आस्ट्रेलिया, जापान विरोध करते आए हैं, बल्कि फिलीपींस समेत तमाम देशों को आपत्ति है। क्योंकि इस क्षेत्र से अंतरराष्ट्रीय सामुद्रिक व्यापार का सबसे उपयोगी मार्ग है।
चीन की नजर सैन्य अड्डे के साथ-साथ व्यापारिक मार्ग पर टिकी है। इसी उद्देश्य से उसने पाकिस्तान के ग्वादर बंदरगाह में बड़े पैमाने पर निवेश किया है। ग्वादर से पाक अधिकृत कश्मीर होते हुए चीन तक सिल्क रोड बना रहा है। वन रोड, वन बेल्ट पर काम कर रहा है। ईरान के चाबहार बंदरगाह तक अपनी पहुंच बनाने के लिए बेताब है। अफगानिस्तान में अपनी पहुंच चाहता है और मध्य एशिया तक अपने व्यापारिक रूट का रास्ता देख रहा है। उसने इसी कोशिश को अंजाम देने के लिए पाकिस्तान, रूस, ईरान के सहयोग से अफगानिस्तान शांति वार्ता में अपनी जगह को मजबूत किया है। मलक्का जलडमरू क्षेत्र प्रभाव और उसके इस प्रभाव का अर्थ है कि वह अपनी आर्थिक ताकत, ऊर्जा क्षेत्र की जरूरत और व्यापारिक रूट को मजबूत कर रहा है। इसके लिए चीन को बड़े पैमाने पर अमेरिका की तरह ही सैन्य अड्डे या मौजूदगी बनाने की जरूरत है। वह इस पर काम कर रहा है।
चीन की पर्ल ऑफ रिंग की नीति
पड़ोसी देश की यह नीति दो दशक से भारत के कान खड़ी कर रही है। नौसेना के पूर्व अध्यक्ष एडमिरल अरुण प्रकाश ने अमर उजाला से श्रीलंका के हंबन टोटा में चीन की कंपनियों के पहुंचने पर चिंता जताई थी। तब इसके भी संकेत थे कि चीन सिंगापुर के सेतुवे, बांग्लादेश के चट्गांव, ईरान के चाबहार पर अपनी निगाह गड़ाए है। यह प्रतिक्रिया 2008 की थी और तब पाकिस्तान के ग्वादर बंदरगाह पर चीन की नजरें गड़ी हुई थीं। यह वही समय था जब तत्कालीन प्रधानमंत्री मनमोहन सिंह चीन के प्रधानमंत्री वेन च्या पाओ और राष्ट्रपति हू जिंताओ से पीओके में चीन के रुख पर नाराजगी जताकर विरोध कर रहे थे। भारतीय नौसेना हिन्द महासागरीय देश में बढ़ रही चुनौती, ब्लू वाटर इकोनॉमी को लेकर हिन्द महासागर के करीब ढाई दर्जन देशों के साथ तालमेल बढ़ाने की मजबूत पहल कर रही थी। भारत जापान, आस्ट्रेलिया, अमेरिका के साथ सैन्य अभ्यास और रणनीतिक तैयारी को आगे बढ़ा रहा था। 126 बहु उद्देश्यीय लड़ाकू विमान, 6 स्कार्पियन पनडुब्बी, पी-8 आई नौसैनिक विमानों के सौदे साथ-साथ आगे बढ़ रहे थे।
पूर्व रक्षा मंत्री जॉर्ज जॉर्ज फर्नांडिस ने सही मायने में 2000 में चीन के इस खतरे को भांपकर पाकिस्तान के बजाय उसे दुश्मन नंबर एक बताया था। भारत के कूटनीति के जानकार कहते हैं कि तब फर्नांडिस ने बिल्कुल सही कहा था, लेकिन हम कर क्या पाए? यह तो बात आई और राजनीतिक चर्चा के साथ हवा में उड़ गई। मेजर जनरल मेहता कहते हैं कि अब तो हम महसूस कर रहे हैं कि हमारा दुश्मन नंबर-1 पाकिस्तान नहीं बल्कि चीन है। चीन का अमेरिका से मुकाबला है, लेकिन हमारा मुकाबला चीन से होना है। अब हमें इसे आगे के लिए पूरी शिद्दत से याद रखना होगा।
जॉर्ज फर्नांडिस के अलावा पूर्व राष्ट्रीय सुरक्षा सलाहकार बृजेश मिश्र हमेशा इस बात पर जोर देते थे। यूपीए सरकार के समय में सामरिक महत्व के रक्षा सौदे में देरी और तत्कालीन रक्षा मंत्री एके एंटनी के रुख को लेकर भी वह चिंता जताते थे। अमर उजाला से भी उन्होंने कई बार इसे साझा किया था। बृजेश मिश्र हालांकि कहते थे कि हमें पाकिस्तान से सावधान और चीन से सतर्क रहना होगा। इसलिए सामरिक (सैन्य तैयारी) उसी हिसाब से किए जाने की जरूरत है। वह चेताते थे कि सैन्य आधुनिकीकरण में कोई भी कोताही आने वाले समय में बड़ी चुनौती बन जाएगी। चीन के दोकलम और फिर पूर्वी लद्दाख में आ धमकने के बाद अब पुरानी भविष्यवाणियां सही लग रही हैं।
पिछले एक दशक में पहल भी हुई और नजर अंदाज भी किया
चीन के सामानांतर तैयारी को लेकर भारतीय सामरिक रणनीतिकारों ने कई पहल की, लेकिन नजरअंदाज भी किया। मसलन यूपीए की मनमोहन सिंह सरकार के समय में नीतियां दो रास्ते पर बढ़ रही थी। पहला चीन के द्विपक्षीय व्यापार, व्यापार में संतुलन की कोशिश। दूसरी कोशिश सीमा मुद्दे के समाधान के साथ सीमावर्ती क्षेत्र में संसाधन, सैन्य संसाधन का विकास। भारत ने इसी उद्देश्य से चीन से लगते वायुसेना के स्टेशन का आधुनिकीकरण, नए लड़ाकू विमानों की तैनाती की योजना, लद्दाख में चुशुल और दौलत बेग ओल्डी हवाई पट्टी को जीवंत करना, चीन से सटी वास्तविक नियंत्रण रेखा के पास दो माऊंटेन डिवीन की स्थापना तथा आर्टिलरी को मजबूत बनाने की पहल। लेकिन 2014 में प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी की सरकार ने चीन के रिश्ते को कुछ नया करने की कोशिश में कुछ अच्छा किया तो कुछ मामलों से चूक गई। नतीजतन रिश्ता एक बार फिर अविश्वसनीय मोड़ पर पहुंच गया।