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Air Pollution: लंबे समय तक पीएम 2.5 और नाइट्रोजन डाईऑक्साइड के संपर्क में रहना घातक, कैंसर का खतरा

Mon, 14 Aug 2023 05:20 AM IST
Jeet Kumar न्यूज डेस्क, अमर उजाला, नई दिल्ली

सार

वायु प्रदूषण की वजह से आमतौर पर फेफड़ों का कैंसर होने का जोखिम रहता है, लेकिन एक नवीन अध्ययन बताता है कि लंबे समय तक वायु प्रदूषक कणों पीएम 2.5 और नाइट्रोजन डाईऑक्साइड के संपर्क में रहने से बुजुर्गों में अन्य तरह का कैंसर भी पनप सकता है।
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वायु प्रदूषण (प्रतीकात्मक तस्वीर) - फोटो : Social Media
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विस्तार
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वायु प्रदूषण की वजह से आमतौर पर फेफड़ों का कैंसर होने का जोखिम रहता है, लेकिन एक नवीन अध्ययन बताता है कि लंबे समय तक वायु प्रदूषक कणों पीएम 2.5 और नाइट्रोजन डाईऑक्साइड के संपर्क में रहने से बुजुर्गों में अन्य तरह का कैंसर भी पनप सकता है। अमेरिका में लाखों मेडिकेयर लाभार्थियों पर किए गए अध्ययन से यह बात सामने आई है।

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एनवायरनमेंटल एपिडेमियोलॉजी जर्नल में हाल ही में प्रकाशित यह अध्ययन हार्वर्ड टी.एच. चैन स्कूल ऑफ पब्लिक हेल्थ, अमेरिका के शोधकर्ताओं के नेतृत्व में किया गया था। इसमें पाया गया कि करीब 10 सालों तक पीएम 2.5 और नाइट्रोजन हाईऑक्साइड के संपर्क में रहना अधिक उम्र के लोगों के लिए कोलोरेक्टल और प्रोस्टेट कैंसर विकसित होने का जोखिम बढ़ा देता है। 

अध्ययन के मुताबिक, भले ही प्रदूषण का स्तर बहुत कम हो, फिर भी यह स्तन कैंसर और एंडोमेट्रियल कैंसर के अलावा इस तरह के कैंसर का खतरा भी बढ़ जाता है। हार्वर्ड में पर्यावरण स्वास्थ्य विभाग में रिसर्च फेलो यागुआंग वेई ने कहा, हमारा निष्कर्ष बताता है कि वायु प्रदूषण सिर्फ फेफड़ों के लिए ही घातक नहीं होता है, बल्कि कुछ अन्य तरह के कैंसर का कारक भी बन सकता है। 
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यह अध्ययन मानव स्वास्थ्य पर वायु प्रदूषण के प्रभावों के बारे में गहराई से समझने में मददगार है। वेई ने कहा, यह अध्ययन बताता है कि हमें वायु प्रदूषण के प्रभावों को ठीक से परिभाषित करना चाहिए और सारी आबादी के बीच स्वच्छ हवा की पहुंच सुनिश्चित करनी चाहिए।  

व्यापक शोध का नतीजा
ताजा निष्कर्ष व्यापक अध्ययन का नतीजा है। शोधकर्ताओं ने 2000 से 2016 तक नेशनल मेडिकेयर के 65 वर्ष या उससे अधिक आयु के लाभार्थियों के डाटा का विश्लेषण किया। सभी लाभार्थी अध्ययन अवधि के कम से कम शुरुआती 10 वर्षों में कैंसर मुक्त थे। इसमें स्तन, कोलोरेक्टल, एंडोमेट्रियल और प्रोस्टेट कैंसर पर अध्ययन के लिए अलग-अलग समूह बनाए। इसमें हर एक में 22 से 65 लाख के बीच लोग शामिल थे। इसमें अलग-अलग जाति, लिंग, नस्ल, औसत बीएमआई तथा सामाजिक-आर्थिक स्थिति के आधार पर प्रदूषण के प्रभावों का अध्ययन किया गया। इस दौरान जिप कोड के आधार पर इन लोगों के आवासीय स्थलों के आसपास के वायु प्रदूषण की स्थिति का भी विश्लेषण किया गया।

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