पांच सालों के उच्चतम स्तर पर पहुंची खुदरा महंगाई
खाद्य उत्पादों और ईंधन की कीमतों में आए उछाल से दिसंबर में खुदरा महंगाई दर ने सभी अनुमानों को पीछे छोड़ दिया। सरकार की ओर से सोमवार को जारी आंकड़ों में दिसंबर में उपभोक्ता आधारित खुदरा महंगाई (सीपीआई) दर नवंबर के मुकाबले करीब 2 फीसदी ज्यादा रही है। इस दौरान खाद्य कीमतों की महंगाई दर 14.12 फीसदी रही।
आंकड़ों के अनुसार, खुदरा महंगाई दर पिछले पांच महीनों से लगातार बढ़ रही है और दिसंबर में 7.35 फीसदी पहुंच गई।
रिजर्व बैंक ने दिसंबर की मौद्रिक समीक्षा बैठक में दूसरी छमाही के लिए महंगाई दर अधिकम 5.1 फीसदी रहने का अनुमान जताया था। वहीं, रॉयटर्स के एक सर्वे में अर्थशास्त्रियों ने भी दिसंबर में अधिकतम महंगाई दर 6.20 फीसदी रहने की उम्मीद जताई थी। आधिकारिक आंकड़ों ने इन अनुमानों को पीछे छोड़ दिया, क्योंकि खुदरा महंगाई दर नवंबर के 10.01 फीसदी के मुकाबले 14.12 फीसदी पर पहुंच गई है।
60 फीसदी से ऊपर सब्जियों की महंगाई
आंकड़ों की मानें तो प्याज, टमाटर और अन्य सब्जियों की कीमतों में दिसंबर में काफी इजाफा हो गया है। इसका खुदरा महंगाई पर सबसे ज्यादा असर हुआ। अक्तूबर मेंसब्जियों की महंगाई दर जहां 26 फीसदी थी, वहीं नवंबर में बढ़कर 36 फीसदी हो गई। दिसंबर में इसमें बेतहाशा बढ़ोतरी आई और सब्जियों की महंगाई दर 60.5 फीसदी हो गई। इसके अलावा पेट्रोल-डीजल के दामों में बढ़ोतरी का भी खुदरा महंगाई पर असर हुआ।
मार्च तक रहेगी मार, नहीं घटेगा रेपो रेट
एक्सिस कैपिटल के मुख्य अर्थशास्त्री पृथ्वीराज श्रीनिवास ने कहा, मार्च 2020 तक खुदराम महंगाई के औसतन 6.5 फीसदी पर बने रहने का अनुमान है। ऐसे में फरवरी में होने वाली आरबीआई की मौद्रिक समीक्षा बैठक में रेपो रेट घटाना मुमकिन नहीं होगा। उन्होंने कहा कि बजट से पहले आए महंगाई के आंकड़े काफी महत्वपूर्ण हो सकते हैं।
लगातार बढ़ी है खुदरा महंगाई
महीना दर (फीसदी में)
जुलाई 3.15
अगस्त 3.28
सितंबर 3.99
अक्टूबर 4.62
नवंबर 5.54
आर्थिक सुस्ती से 2019-20 में कम पैदा होंगे 16 लाख रोजगार
अर्थव्यवस्था में जारी सुस्ती का असर रोजगार क्षेत्र पर भी गहरा असर डालने वाला है। एसबीआई ने सोमवार को अर्थव्यवस्था पर जारी रिपोर्ट इकोरैप में अनुमान जताया है कि आर्थिक सुस्ती की वजह से चालू वित्त वर्ष में करीब 16 लाख रोजगार कम आएंगे। इस दौरान यूपी, बिहार जैसे राज्यों पर रोजगार की कमी का ज्यादा असर दिखेगा।
सरकारी नौकरियों में भी कमी
ईपीएफओ किसी भी तरह की सरकारी और निजी नौकरियों का आंकड़ा नहीं जुटाता है, बल्कि इन आंकड़ों को रखने का काम 2004 से नेशनल पेंशन स्कीम को सौंप दिया गया है। एसबीआई ने कहा, एनपीएस श्रेणी के रोजगार सृजन में भी बड़ी गिरावट दिखाई दे रही है। अभी तक के प्रदर्शन के आधार पर अनुमान है कि केंद्र और राज्य सरकारें 2019-20 में नई नौकरियों की संख्या 39,000 की कटौती कर सकती हैं।
उद्योगों में घटी श्रमिकों की मांग
रिपोर्ट के अनुसार, उद्योग जगत में छाई सुस्ती की वजह से नए श्रमिकों की मांग लगातार घट रही है। कई कंपनियां दिवालिया प्रक्रिया का सामना कर रही हैं, जिनके समाधान में देरी की वजह से ठेके पर श्रमिकों की भर्ती में बड़ी गिरावट आई है। कंपनियों की ओर से श्रमिकों के वेतन में कम बढ़ोतरी भी चिंता का विषय है। इस कदम से अधिक कर्ज लेने की दर बढ़ने का खतरा है, जो अर्थव्यवस्था और वित्तीय तंत्र के लिए जोखिम पैदा कर सकता है।