राष्ट्रपति प्रणब मुखर्जी ने कहा सभी के प्रति सहिष्णुता, दया और मातृभूमि से प्रेम ही भारतीय सभ्यता के वास्तविक मूल्य हैं। उन्होंने कहा कि भारत की यही विशेषता है कि यहां सैकड़ों भाषाएं और सभी प्रमुख धर्म एक व्यवस्था के अंदर रहते हैं।
राष्ट्रीय स्वयंसेवक संघ और इग्नू द्वारा बृहस्पतिवार को आयोजित एक कार्यक्रम में राष्ट्रपति ने कहा कि भारत का विचार सनातन ज्ञान की हमारी महान परंपरा से प्रवाहित होता आया है। मातृभूमि से प्रेम, अपना कर्म करना, सभी के प्रति दयाभाव, सबके प्रति सहिष्णुता और अपने काम और अनुशासन के प्रति जवाबदेह की सीख देते हुए उन्होंने कहा कि ये हमारी सभ्यता के मूल्य आज भी प्रासंगिक हैं। राष्ट्रपति ने कहा कि ‘कभी-कभी मुझे आश्चर्य होता है कि कैसे 200 भाषाओं, 1800 बोलियों और दुनिया के सात प्रमुख धर्मों की विविधता को समेटे हुए हम एक व्यवस्था, एक झंडा और एक संविधान के अंतर्गत रहते हैं।’
प्रणब मुखर्जी ने कहा कि आंख के बदले आंख और दांत के बदले दांत के सिद्धांत के विपरीत भारतीय सभ्यता ‘सर्वे भवंतु सुखिना’ का संदेश देती है। उन्होंने कहा कि तीन दिन के सम्मेलन में जो विचार मंथन होगा वह देश के लिए लाभदायक होगा। इस मौके पर मानव संसाधन मंत्री प्रकाश जावड़ेकर और राष्ट्रीय स्वयं सेवक संघ के केई शीर्ष नेता मौजूद थे। अपने संबोधन में जावड़ेकर ने भारतीय मूल्यों के प्रचार पसार पर जोर दिया और कहा कि अनेकता में एकता भारत क महानता है।