स्वतंत्रता दिवस की पूर्व संध्या पर राष्ट्रपति प्रणब मुखर्जी ने राष्ट्र के नाम अपने संबोधन में दलितों पर होने वाले हमलों के परिप्रेक्ष्य में कहा कि इससे सख्ती से निपटा जाना चाहिए। कमजोर वर्ग पर हिंसा को उन्होंने देश की सद्भावना के प्रतिकूल और पथभ्रष्टता करार दिया। असहिष्णु ताकतों की निंदा करते हुए राष्ट्रपति ने विभाजनकारी राजनीतिक एजेंडे की विकृत मानसिकता से सतर्क रहने की अपील की। उन्होंने कहा कि समूहों और व्यक्तियों की ध्रुवीकरण की बहस से हमारे संस्थानों का मजाक और संविधान का नुकसान होता है।
राष्ट्रपति ने यह भी स्पष्ट किया कि लोकतंत्र एक निश्चित अवधि के लिए सरकार चुनने की प्रक्रिया मात्र नहीं है। भारत के 70वें स्वतंत्रता दिवस की पूर्व संध्या पर दिए अपने संबोधन में उन्होंने कहा कि राष्ट्र के प्राधिकरणों और संस्थानों को अपने कर्तव्यों का पालन करते समय प्राचीन भारतीय परंपरा के अनुकूल मर्यादा का पालन करना चाहिए। राष्ट्रपति बनने के बाद स्वतंत्रता दिवस की पूर्व संध्या पर मुखर्जी का यह पांचवां अभिभाषण था।
वैश्विक आतंकवाद पर चिंता
राष्ट्रपति प्रणब मुखर्जी
उन्होंने कहा, ‘इन चार वर्षों में, मैंने कुछ अशांत, विघटनकारी और असहिष्णु शक्तियों को सिर उठाते हुए देखा है। कमजोर वर्गों पर हमले हमारे राष्ट्रीय चरित्र के प्रतिकूल और हमारी पथभ्रष्टता को दर्शाते हैं, हमें इनसे सख्ती से निपटने की आवश्यकता है। हमारे समाज और शासनतंत्र की सामूहिक समझ से मुझे पूरा विश्वास है कि ऐसे तत्वों को निष्क्रिय कर दिया जाएगा और भारत की शानदार विकास गाथा निर्बाध जारी रहेगी। विकास की प्रक्रिया से जो अभी बाहर हैं उन्हें शामिल करना होगा। जो आहत हैं और भटके हुए हैं उन्हें मुख्यधारा में लाना होगा।’
धर्म के नाम पर दुनिया भर में चल रही आतंकी गतिविधियों और कट्टरता पर चिंता जताते हुए राष्ट्रपति ने कहा, ‘ये ताकतें धर्म के नाम पर निर्दोष लोगों की हत्या के अलावा भौगोलिक सीमाओं को बदलने की भी धमकी दे रही हैं जो विश्व शांति के लिए विनाशकारी सिद्ध हो सकता है।’ ऐसे समूहों की अमानवीय, मूर्खतापूर्ण और बर्बरतापूर्ण करतूतें हाल ही में फ्रांस, बेल्जियम, अमेरिका, नाइजीरिया, केन्या और हमारे पड़ोसी अफगानिस्तान तथा बांग्लादेश में दिखाई दी हैं। ये ताकतें अब संपूर्ण राष्ट्र समूह के प्रति एक खतरा पैदा कर रही हैं। विश्व को बिना शर्त और एक स्वर में इनका मुकाबला करना होगा।