राष्ट्रपति पद का विपक्ष से साझा उम्मीदवार कौन होगा, इसे लेकर अगले कुछ दिनों तक दिल्ली की राजनीति में तपिश बनी रहने वाली है। एनसीपी के मुखिया शरद पवार का नाम बीते दो दिनों से सबसे ज्यादा चर्चाओं में तो था, लेकिन मंगलवार आते-आते उनका नाम न सिर्फ उनकी पार्टी बल्कि उनके करीबियों ने भी खारिज कर दिया। अब चर्चा इस बात की हो रही है कि अगर शरद पवार विपक्ष के साझा राष्ट्रपति पद के उम्मीदवार नहीं होंगे, तो आखिर दूसरा बड़ा नाम कौन हो सकता है। चर्चाओं में अब नया नाम गुलाम नबी आजाद का सबसे आगे चल रहा है।
महाराष्ट्र के वरिष्ठ पत्रकार और लंबे समय तक शरद पवार की राजनीति को समझने वाले राघव कदम कहते हैं कि दरअसल पवार आज तक कभी कोई चुनाव नहीं हारे। ऐसे में वह सिर्फ किसी खास मकसद से विपक्ष के साझा उम्मीदवार होकर ऐसा कोई दाग अपने दामन पर लगाना नहीं चाहते हैं। इसके अलावा राघव कहते हैं कि शरद पवार की मंशा कभी भी राष्ट्रपति बनने की रही ही नहीं। शरद पवार राजनीतिक दांवपेच में माहिर माने जाते हैं। इसलिए हमेशा से इस बात के कयास लगाए जाते रहे कि शरद पवार देश के प्रधानमंत्री पद के प्रबल दावेदारों में से एक हैं। हालांकि तमाम परिस्थितियों के चलते ऐसा संभव नहीं हो सका। लेकिन आज भी शरद पवार किंगमेकर की भूमिका में रहना ज्यादा पसंद करते हैं न कि खुद चुनाव लड़कर हारना पसंद करेंगे। इसके अलावा देश की प्रमुख विपक्षी पार्टी कांग्रेस के साथ अब तो शरद पवार के संबंध बेहतर हैं, लेकिन सोनिया गांधी का विदेशी मूल का मुद्दा शरद पवार ही लेकर सबसे पहले राजनीति के मैदान में कूदे थे। इसलिए राजनीतिक नजरिए से इस बात को कांग्रेस के वरिष्ठ पदाधिकारियों से लेकर कांग्रेस आलाकमान शायद ही भूल सके। क्योंकि शरद पवार, पीए संगमा, तारिक अनवर ने सोनिया गांधी के विदेशी मूल का मुद्दा उठाकर उन्हें प्रधानमंत्री की कुर्सी तक नहीं पहुंचने दिया था।
हालांकि विपक्ष की ओर से राष्ट्रपति पद का साझा उम्मीदवार कौन होगा, इसे लेकर ममता बनर्जी सभी विपक्षी दलों को जोड़ने की पुरजोर कोशिश कर रही हैं। इसी संबंध में बुधवार को एक महाबैठक का आयोजन भी किया जा रहा है। ममता बनर्जी और तमाम अन्य दलों की कोशिश यही है कि विपक्ष की तरफ से एक ऐसा साझा और मजबूत उम्मीदवार राष्ट्रपति पद के लिए उतारा जाए जो सत्ता पक्ष को पटखनी दे सके। बुधवार को देश के तकरीबन 22 बड़े राजनीतिक दलों के नेताओं को इसी के चलते आमंत्रित किया गया है। हालांकि बुधवार की बैठक से पहले ही कई और बड़े नेताओं के नाम भी विपक्ष की ओर से राष्ट्रपति पद के साझा उम्मीदवार के तौर पर सामने आ रहे हैं। इसमें बड़ा नाम गुलाम नबी आजाद का भी चल रहा है।
गुलाम नबी आजाद के अलावा चर्चाओं में पूर्व प्रधानमंत्री एचडी देवगौड़ा का नाम भी सामने आ रहा है। राजनीतिक विश्लेषण अशोक राव कहते हैं कि अभी तक जितने भी नाम चर्चा में हैं वह सभी बड़ी पार्टियों के नेताओं के ही चल रहे हैं। जबकि विपक्ष को एकजुट करने के लिए कांग्रेस के अलावा तमाम छोटे-छटे राजनैतिक दलों ने भी मुहिम आगे बढ़ाई है। खासतौर से पश्चिम बंगाल की मुख्यमंत्री ममता बनर्जी ने सभी विपक्षी दलों को एकजुट करने के लिए सिर्फ राष्ट्रपति चुनाव में ही नहीं, बल्कि इससे पहले कई मौकों पर एक साथ सभी को खड़ा करने की कोशिशें की हैं। राव कहते हैं, ऐसे में राष्ट्रीय दलों के अलावा दूसरे दलों के कई प्रमुख नेताओं का नाम भी सामने आ सकते हैं। हालांकि उनका कहना है बुधवार को होने वाली विपक्षी दलों की बैठक बड़ी महत्वपूर्ण बैठक मानी जा रही है लेकिन उनका कहना है कि इस बैठक में ज्यादातर वह दल शामिल हो रहे हैं, जिनकी महत्वाकांक्षा भी बहुत ज्यादा है। इसलिए यह कहना कि बुधवार को होने वाली बैठक में सब कुछ वैसा ही होगा जैसा चर्चाओं में बना हुआ है, थोड़ा कठिन होगा।