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President Election: शरद पवार नहीं तो क्या आजाद होंगे विपक्ष से राष्ट्रपति पद के साझा उम्मीदवार! बुधवार को हो रही है महाबैठक

सार

राजनीतिक जानकार मानते हैं कि गुलाम नबी आजाद की उम्मीदवारी मजबूत हो सकती है। एक वरिष्ठ राजनेता कहते हैं कि कांग्रेस ने इसी वजह से संभवतया गुलाम नबी आजाद को राज्यसभा नहीं भेजा है। अगर सभी दलों की सहमति होगी, तो गुलाम नबी आजाद के नाम पर मुहर लग सकती है...
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राष्ट्रपति भवन - फोटो : Agency (File Photo)
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विस्तार
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राष्ट्रपति पद का विपक्ष से साझा उम्मीदवार कौन होगा, इसे लेकर अगले कुछ दिनों तक दिल्ली की राजनीति में तपिश बनी रहने वाली है। एनसीपी के मुखिया शरद पवार का नाम बीते दो दिनों से सबसे ज्यादा चर्चाओं में तो था, लेकिन मंगलवार आते-आते उनका नाम न सिर्फ उनकी पार्टी बल्कि उनके करीबियों ने भी खारिज कर दिया। अब चर्चा इस बात की हो रही है कि अगर शरद पवार विपक्ष के साझा राष्ट्रपति पद के उम्मीदवार नहीं होंगे, तो आखिर दूसरा बड़ा नाम कौन हो सकता है। चर्चाओं में अब नया नाम गुलाम नबी आजाद का सबसे आगे चल रहा है।

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हालांकि विपक्ष की ओर से साझा राष्ट्रपति पद के उम्मीदवार को लेकर बुधवार देर शाम को कॉन्स्टिट्यूशन क्लब में देश की 22 प्रमुख विपक्षी पार्टियों के बड़े नेताओं की एक बैठक होनी है। जिसकी अगुवाई पश्चिम बंगाल की मुख्यमंत्री ममता बनर्जी कर रही हैं। जिसमें कांग्रेस पार्टी से लेकर देश की तमाम बड़ी विपक्षी पार्टियां शामिल हो रही हैं।

बीते कुछ दिनों से चर्चाओं का बाजार सिर्फ इसी बात के लिए गर्म था कि विपक्ष से राष्ट्रपति पद के उम्मीदवार शरद पवार होंगे। लेकिन शरद पवार विपक्ष से राष्ट्रपति पद के उम्मीदवार नहीं होंगे, यह बात उनकी पार्टी के न सिर्फ वरिष्ठ नेता ने कही, बल्कि वरिष्ठ पार्टी के नेता सीताराम येचुरी ने भी इस बात की पुष्टि की। दरअसल राजनीति के जानकारों का मानना है कि शरद पवार के साझा उम्मीदवार ना होने के कई कारण है।

पवार ने उठाया था सोनिया के विदेशी मूल का मुद्दा

महाराष्ट्र के वरिष्ठ पत्रकार और लंबे समय तक शरद पवार की राजनीति को समझने वाले राघव कदम कहते हैं कि दरअसल पवार आज तक कभी कोई चुनाव नहीं हारे। ऐसे में वह सिर्फ किसी खास मकसद से विपक्ष के साझा उम्मीदवार होकर ऐसा कोई दाग अपने दामन पर लगाना नहीं चाहते हैं। इसके अलावा राघव कहते हैं कि शरद पवार की मंशा कभी भी राष्ट्रपति बनने की रही ही नहीं। शरद पवार राजनीतिक दांवपेच में माहिर माने जाते हैं। इसलिए हमेशा से इस बात के कयास लगाए जाते रहे कि शरद पवार देश के प्रधानमंत्री पद के प्रबल दावेदारों में से एक हैं। हालांकि तमाम परिस्थितियों के चलते ऐसा संभव नहीं हो सका। लेकिन आज भी शरद पवार किंगमेकर की भूमिका में रहना ज्यादा पसंद करते हैं न कि खुद चुनाव लड़कर हारना पसंद करेंगे। इसके अलावा देश की प्रमुख विपक्षी पार्टी कांग्रेस के साथ अब तो शरद पवार के संबंध बेहतर हैं, लेकिन सोनिया गांधी का विदेशी मूल का मुद्दा शरद पवार ही लेकर सबसे पहले राजनीति के मैदान में कूदे थे। इसलिए राजनीतिक नजरिए से इस बात को कांग्रेस के वरिष्ठ पदाधिकारियों से लेकर कांग्रेस आलाकमान शायद ही भूल सके। क्योंकि शरद पवार, पीए संगमा, तारिक अनवर ने सोनिया गांधी के विदेशी मूल का मुद्दा उठाकर उन्हें प्रधानमंत्री की कुर्सी तक नहीं पहुंचने दिया था।

बुधवार को दिल्ली में होगी महाबैठक

हालांकि विपक्ष की ओर से राष्ट्रपति पद का साझा उम्मीदवार कौन होगा, इसे लेकर ममता बनर्जी सभी विपक्षी दलों को जोड़ने की पुरजोर कोशिश कर रही हैं। इसी संबंध में बुधवार को एक महाबैठक का आयोजन भी किया जा रहा है। ममता बनर्जी और तमाम अन्य दलों की कोशिश यही है कि विपक्ष की तरफ से एक ऐसा साझा और मजबूत उम्मीदवार राष्ट्रपति पद के लिए उतारा जाए जो सत्ता पक्ष को पटखनी दे सके। बुधवार को देश के तकरीबन 22 बड़े राजनीतिक दलों के नेताओं को इसी के चलते आमंत्रित किया गया है। हालांकि बुधवार की बैठक से पहले ही कई और बड़े नेताओं के नाम भी विपक्ष की ओर से राष्ट्रपति पद के साझा उम्मीदवार के तौर पर सामने आ रहे हैं। इसमें बड़ा नाम गुलाम नबी आजाद का भी चल रहा है।

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राजनीतिक जानकार मानते हैं कि गुलाम नबी आजाद की उम्मीदवारी मजबूत हो सकती है। एक वरिष्ठ राजनेता कहते हैं कि कांग्रेस ने इसी वजह से संभवतया गुलाम नबी आजाद को राज्यसभा नहीं भेजा है। अगर सभी दलों की सहमति होगी, तो गुलाम नबी आजाद के नाम पर मुहर लग सकती है। हालांकि तृणमूल कांग्रेस से जुड़े कुछ नेता कहते हैं कि जब तक बुधवार की बैठक में आम सहमति न बने या आगे के लिए इस पर कोई चर्चा का विषय न हो, तब तक किसी भी नाम को अंतिम नाम नहीं माना जा सकता है।

पूर्व प्रधानमंत्री देवगौड़ा का नाम भी चर्चा में

गुलाम नबी आजाद के अलावा चर्चाओं में पूर्व प्रधानमंत्री एचडी देवगौड़ा का नाम भी सामने आ रहा है। राजनीतिक विश्लेषण अशोक राव कहते हैं कि अभी तक जितने भी नाम चर्चा में हैं वह सभी बड़ी पार्टियों के नेताओं के ही चल रहे हैं। जबकि विपक्ष को एकजुट करने के लिए कांग्रेस के अलावा तमाम छोटे-छटे राजनैतिक दलों ने भी मुहिम आगे बढ़ाई है। खासतौर से पश्चिम बंगाल की मुख्यमंत्री ममता बनर्जी ने सभी विपक्षी दलों को एकजुट करने के लिए सिर्फ राष्ट्रपति चुनाव में ही नहीं, बल्कि इससे पहले कई मौकों पर एक साथ सभी को खड़ा करने की कोशिशें की हैं। राव कहते हैं, ऐसे में राष्ट्रीय दलों के अलावा दूसरे दलों के कई प्रमुख नेताओं का नाम भी सामने आ सकते हैं। हालांकि उनका कहना है बुधवार को होने वाली विपक्षी दलों की बैठक बड़ी महत्वपूर्ण बैठक मानी जा रही है लेकिन उनका कहना है कि इस बैठक में ज्यादातर वह दल शामिल हो रहे हैं, जिनकी महत्वाकांक्षा भी बहुत ज्यादा है। इसलिए यह कहना कि बुधवार को होने वाली बैठक में सब कुछ वैसा ही होगा जैसा चर्चाओं में बना हुआ है, थोड़ा कठिन होगा।

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