जिस आपाधापी में आरोग्य सेतु एप का पहला संस्करण लांच किया गया था, उसमें मानकीकरण और निजता के अधिकार संबंधी अनेक बातें शामिल होने से रह गई थीं, ऐसा विशेषज्ञों का कहना है। दूसरे, इसका असली लाभ तभी होगा जब इसमें संक्रमितो, क्वारंटीन हुए लोगों के बारे में सही जानकारी बड़ी संख्या में मौजूद हो। ऐसा कितना हो पाया है, अभी किसी को पता नहीं है। राज्यों के स्वास्थ्य विभाग से जुड़ा महकमा और जिला प्रशासन भी एप के वर्तमान संस्करण में सीधे कोई जानकारी फीड कर नहीं सकता और संक्रमितों तथा क्वारंटीन में रह रहे लोगों की जानकारी इसके मुख्य डाटा सर्वर में कैसे फीड हो रही है, इसके बारे में स्पष्टता का अभाव है।
अंतरराष्ट्रीय स्तर के साइबर विशेषज्ञ और सुप्रीम कोर्ट के वकील पवन दुग्गल कहते हैं कि इस एप के प्रयोग से जुड़े कई बुनियादी कानूनी सवाल उठ रहे हैं। पहला मसला है मॉनिटरिंग सर्विलांस का। अभी तो आपात हालात हैं इसलिए आपके आने-जाने-घूमने की जानकारी को इसके द्वारा ट्रैक किया जाना स्वीकार किया भी जा सकता है लेकिन आम स्थितियों में तो यह आपकी निजता का उल्लंघन है। आपकी जियो-लोकेशन की जानकारी इससे बाहर जाती है। दूसरा अहम पहलू यह है कि इसकी उपयोगिता क्वारंटीन में रह रहे लोगों और संक्रमितों की जानकारी से आपको वाकिफ कराने की तो है लेकिन इसे डाउनलोड करना स्वैच्छिक है। क्वारंटीन में रह रहा कोई भी व्यक्ति अपने समाज में क्या खुशी से यह एप डाउनलोड करके अपने संक्रमित होने की संभावित स्थिति को जाहिर करेगा-पवन दुग्गल के इस सवाल का जवाब न ही है।
विशेषज्ञ यह भी सवाल कर रहे हैं कि एप के वर्तमान संस्करण का कोई स्पष्ट लीगल फ्रेमवर्क नहीं है, यह साफ नहीं है कि इससे मिलने वाली जानकारी को किस मंत्रालय या अधिकारी की जिम्मेदारी में सुरक्षित रखा जाएगा। अभी तक यही पता है कि सरकार द्वारा बनाई गई विशेषज्ञों की एक उच्च स्तरीय समिति इस एप से आ रही जानकारी की मॉनिटरिंग कर रही है।
डाटा सर्विलांस जैसे मुद्दे बेबुनियादः के विजय राघवन
हालांकि भारत सरकार के मुख्य वैज्ञानिक सलाहकार डॉ. के विजय राघवन ने शनिवार को ही यह कहा था कि इसके लिए डाटा सर्विलांस जैसे मुद्दे उठाए जा रहे हैं जो कि बेबुनियाद हैं। उनका कहना है कि सिंगापुर, अमेरिका, ब्रिटेन और दक्षिण कोरिया जैसे देशों में और एपल-गूगल जैसी कंपिनयों ने इस तरह के सिस्टमों को लोगों के व्यापक सुरक्षा हितों के मद्देनजर लागू किया है। इसके बावजूद, यह सवाल तो है ही कि स्वीकृत अंतरराष्ट्रीय मानकों (स्टैंडर्ड) पर कितना कम खरा उतरता है।
साइबर सुरक्षा के ही एक और जाने-माने विशेषज्ञ रक्षित टंडन भी मानते हैं कि यह भी पता नहीं है कि साइबर अपराधियों से यह एप कितना सुरक्षित है। पवन दुग्गल एक और सवाल उठाते हैं कि यह डाटा कहां जा रहा है, कौन इसे परख रहा है, इसकी स्पष्ट जानकारी नहीं देता है यह एप। स्वास्थ्य मंत्रालय इस डाटा को रखे यहां तक तो ठीक है लेकिन अगर कानून लागू कराने वाली एजेंसियां इसे एक्सेस करने लग गईं तो यह लोगों के निजता के अधिकारों का गंभीर हनन होगा। ऐसा नहीं होगा, इसकी फिलहाल कोई गारंटी नहीं है। पवन कहते हैं, इसे स्पष्ट करना जरूरी है।