उत्तराखंड में जारी सियासी संकट के बीच शनिवार को राज्यपाल केके पॉल के फैसले से भाजपा असहज है। पार्टी को उम्मीद थी कि मुख्यमंत्री हरीश रावत को बहुमत के लिए 28 मार्च तक का वक्त देने से पहले राज्यपाल विधानसभा में स्पीकर के खिलाफ पेश अविश्वास प्रस्ताव पर कानूनी राय लेंगे।
इसके उलट एक ओर राज्यपाल ने जहां रावत को बहुमत साबित करने का लंबा वक्त दे दिया, वहीं राष्ट्रपति प्रणब मुखर्जी ने दिल्ली में डेरा डाले कांग्रेस के बागी और भाजपा के विधायकों को अब तक मिलने का वक्त नहीं दिया है। ऐसे में पार्टी नेतृत्व की योजना किसी भी सूरत में पहले हरीश रावत सरकार को शक्तिपरीक्षण के दौरान सियासी मात देने और बाद में भावी रणनीति तय करने की है। इसी रणनीति के तहत नेतृत्व ने बहुमत साबित करने के लिए तिथि निर्धारित न होने तक विधायकों को यहीं रोके रखने का फैसला किया है।
दरअसल पार्टी नहीं चाहती कि कांग्रेस बागी विधायकों के साथ साथ उसके किसी विधायक से संपर्क साध सके। राज्य की कांग्रेस सरकार को गिराने की मुहिम से जुड़े पार्टी के एक वरिष्ठ नेता ने स्वीकार किया कि राज्यपाल के फैसले उम्मीदों के अनुरूप नहीं था। पार्टी की उम्मीद थी कि राज्यपाल मुख्यमंत्री को बहुमत के लिए समय दिए जाने से पहले इस बात का फैसला करेंगे कि स्पीकर को अपने पद पर बने रहने का अधिकार है या नहीं। क्योंकि कार्यवाही शुरू होते ही स्पीकर के खिलाफ अविश्वास प्रस्ताव पेश किया गया था।
ऐसे में नियमानुसार आगे की सभी कार्रवाई को रोक कर पहले अविश्वास प्रस्ताव पर फैसला होना चाहिए था। भाजपा चाहती थी कि दबाव बनाने के लिए वह राष्ट्रपति के समक्ष कांग्रेस के बागी और अपने विधायकों की परेड करा कर रावत सरकार के अल्पमत में होने का सीधा संदेश दे। इसके लिए शनिवार को ही राष्ट्रपति से समय मांगा गया, मगर रविवार को खबर लिखे जाने तक राष्ट्रपति भवन से बुलावा नहीं आया था।