ग्लोबल साउथ समिट में शनिवार को केंद्रीय शिक्षा मंत्री धर्मेंद्र प्रधान ने दक्षिण देशों के शिक्षा मंत्रियों के साथ नई शिक्षा नीति को लेकर चर्चा की। इस दौरान उन्होंने कहा कि शिक्षा सतत विकास और आम वैश्विक चुनौतियों से निपटने के लिए शक्तिशाली प्रेरक है। इसे सभी उभरती अर्थव्यवस्थाएं अपना सकती हैं।
उन्होंने समिट में शैक्षिक प्राथमिकताओं की जानकारी देने के साथ शिक्षा प्रणाली को बदलने और गुणवत्तापूर्ण शिक्षा के जरिये समृद्ध भविष्य के निर्माण पर जोर दिया। उन्होंने कहा कि शिक्षा न केवल कौशल बल्कि प्रतिभा, नवाचार और लचीले समुदायों के निर्माण के लिए भी महत्वपूर्ण है। भारत की नई राष्ट्रीय शिक्षा नीति (एनईपी) सीखने के परिदृश्य में बदलाव ला रही है।
उन्होंने कहा कि एनईपी भारत के युवाओं को वैश्विक नागरिक के रूप में विकसित करने और भारत को 21वीं सदी की अर्थव्यवस्था के रूप में स्थापित करने की परिकल्पना करती है। एनईपी सिर्फ एक नीति नहीं है, बल्कि एक दार्शनिक खाका है। इसे सभी उभरती अर्थव्यवस्थाएं अपनाएं।
प्रधान ने कहा कि विश्व बंधु के तौर पर भारत मानव संसाधन विकास को आगे बढ़ाने में विश्वसनीय भागीदार बनने के लिए समर्पित है। ग्लोबल साउथ सेंटर ऑफ एक्सीलेंस साउथ देशों के लिए प्रासंगिक अनुसंधान पर केंद्रित है। हम स्टडी इन इंडिया और ग्लोबल साउथ स्कॉलरशिप जैसे कार्यक्रमों से उच्च शिक्षा के लिए अधिक अवसर पैदा करना चाहते हैं।
उन्होंने कहा कि नवाचार को बढ़ावा देने, शैक्षिक अवसरों को बराबर करने, हमारे युवाओं को भविष्य के लिए तैयार करने, विकासात्मक लक्ष्यों को आगे बढ़ाने, संबंधित देशों को ज्ञान-आधारित समाज के रूप में बदलने और किसी को भी पीछे नहीं छोड़ने के लिए हमारा सहयोग और मजबूत होगा।
समिट में 123 देशों ने लिया हिस्सा
विदेश मंत्री एस जयशंकर ने कहा कि ग्लोबल साउथ समिट के तृतीय सत्र का समापन किया गया। इसमें 123 देशों ने हिस्सा लिया। इसके अलावा 21 राष्ट्राध्यक्ष, 118 मंत्री और 34 विदेश मंत्रियों ने इसमें सहभागिता की। इसे अलावा 10 मंत्रिस्तरीय सत्र आयोजित किए गए। जहां टिकाऊ भविष्य के लिए वैश्विक दक्षिण को सशक्त बनाने पर चर्चा की गई।