प्रभु की रेल वायदों की पटरी पर तो खूब दौड़ रही हे लेकिन जमीनी ट्रैक पर दौडने वाली ट्रेन बार-बार पटरियों से उतर रही है। कानपुर के समीप लगातार दूसरी बार ट्रेन की पटरी से उतरना इस बात की गवाही देता है कि रेल की सफर में यात्री राम भरोसे ही यात्रा कर रहे है। जबकि हाई स्पीड व बुलेट ट्रेन का सपना उन्हें दिखाया जा रहा है।
रेलवे मंत्रालय बुलेट ट्रेन चलाने, हाई स्पीड ट्रेन चलाने, कोहरे में भी रफ्तार में ब्रेक नहीं लगे इसके लिए त्रिनेत्र तकनीक का विकास करने समेत कई सब्जबाग दिखा रहा है। दो सौ किलोमीटर की रफ्तार से चलने वाली एलएचबी कोच के निर्माण का दावा किया जा रहा है, तेजस, गतिमान जैसी हाई स्पीड ट्रेन चलाने की बात की जा रही है लेकिन आज भी वर्षों पुरानी पटरी पर ही ट्रेनें दौड़ रही है।
सात हजार के करीब कोच 20 साल से अधिक पुराने है। जो यात्रियों को ढो रहे है। कोच मेंटेंनेंस, पुराने व जर्जर पुल, मानवरहित क्रॉसिंग, संरक्षा कर्मियों की कमी समेत कई संरक्षा के उपायों पर गति से अभी भी योजना नहीं दौड़ पा रही है।
अभी भी रेलपथ पर कार्य कर रही पटरी/वेल्डिंग की विफलता का पता लगाने के लिए अल्ट्रासोनिक ब्रोकन रेल डिटेक्श्श्न सिस्टम के परीक्षण की बात की जा रही है, इसका नतीजा दुर्घटना में लोगों की मौत हो रही है, बड़ी संख्या में लोगे घायल हो रहे है। दिल्ली के लोहे के पुल के साथ नये पुल का निर्माण होने में ही दशक गुजरब गए, लेकिन योजना अभी भी अधर में ही है।
पुराने व जर्जर पुल की बात करें तो पुरानी दिल्ली स्थित लोहे का पुल डेढ़ सौ साल से भी अधिक पुराना हो गया है, 2006 में ही इस पुल को खत्म कर नया पुल यमुना पर बनाने का वादा किया गया था, लेकिन रयह योजना भी खटाई में ही है। देशभर में करीब 1 लाख 33 हजार 612 के करीब छोटे-बड़े पुल है। इनमें ज्यादातर पुल अंग्रेजों के बनाए हुए है। रेलवे मंत्रालय भले ही मरम्मत की बात करके अपना पल्ला झाड़ ले, लेकिन सच्चाई यह है कि वैकल्पिक मार्ग बेहद ही आवश्यक है।