अमरीका के वॉशिंगटन में पेसिफिक नॉर्थवेस्ट नेशनल लेबोरेटरी में माइक्रोबियल इकोलॉजिस्ट डॉ जेनट जेनसन उस टीम का हिस्सा थीं जो ये साबित करने की कोशिश कर रही थीं कि मल ट्रांसप्लंट काम कर सकता है। उनकी 61 साल की मरीज लगातार आठ महीनों तक पेट की समस्या और दस्त से परेशान रहीं और इस कारण उनका 27 किलो वजन कम हो गया।
डॉ जेनसन कहती हैं, "वो सी। डिफिसाइल के संक्रमण से परेशान हो चुकी थीं और वो मौत की कगार पर पहुंच गई थीं। उन पर कोई एंटीबायटिक असर नहीं कर रहा था।" उनके शरीर में उनके पति से लिया गय स्वस्थ मल ट्रांसप्लांट किया गया। डॉ जेनसन ने बीबीसी को बताया कि उन्हें अपनी सफलता पर हैरानी हुई। वे कहती हैं, "आश्चर्यजनक तौर पर दो दिन के बाद वे सामान्य हो गई और उनका पेट भी सही हो गया। वे ठीक हो गई थीं।"
परीक्षणों में पता चला है कि ये प्रक्रिया लगभग 90 फ़ीसदी तक असरदार हो सकती है। इस तकनीक में सकारात्मक नतीजे आने से कुछ लोगों को ख़ुद से अपने शरीर पर ये प्रक्रिया आजमाने का उत्साह मिला है। अमरीका में ओपनबायोम जैसे समूहों का गठन किया गया है जो मल रखने और ट्रांसप्लांट के लिए बांटने का एक सार्वजनिक बैंक है।
लेकिन क्या सी। डिफिसाइल के इलाज के अलावा मल ट्रांसप्लांट का कोई और मेडिकल उपयोग भी है? लगभग सभी बीमारियों में हमारे इंसानी शरीर और शरीर में मौजूद जीवाणु के बीच के संबंध को जांचा जाता है। सी। डिफिसाइल के कारण आंत में सूजन, पेट की बीमारी, मधुमेह और पार्किन्संस की बीमारी हो सकती है। इस कारण कैंसर की दवा का असर भी कम हो सकता है और व्यक्ति को डिप्रेशन और ऑटिज्म हो सकता है। लेकिन इसका मतलब ये भी है कि मल के ट्रांसप्लांट के नतीजे हमेशा सकारात्मक ही होंगे।
साल 2015 में आई एक रिपोर्ट के अनुसार एक महिला में उनकी बेटी के मल का ट्रांसप्लांट किया गया जिसके बाद उनका वजन 16 किलो तक बढ़ गया और उन्हें मोटा करार दिया गया। एक मोटे इंसान का मल किसी चूहे में ट्रंसप्लांट करके उसे मोटा या पतला बनाया जा सकता है। हालांकि अभी भी इस बात को लेकर सहमति नहीं बन पाई है कि ऐसा ही नतीजा इंसानों में आएगा या नहीं।
साथ ही इस ट्रांसप्लांट के साथ खतरनाक बीमारी पैदा करने वाले जीवाणु के ट्रांसप्लांट होने का अधिक जोखिम भी होता है। यही कारण है कि वैज्ञानिकों की कोशिश है कि सीधे मल ट्रांसप्लांट करने की बजाय बैक्टीरिया का कॉम्बिनेशन ट्रांसप्लांट किया जा सके।
वेलकम सेंगर इंस्टीट्यूट के डॉ ट्रेवोर लॉली कहते हैं आने वाले समय के लिए ऐसे इलाज को और अधिक परिष्कृत किया जाना चाहिए। वो कहते हैं, "मल का ट्रांसप्लांट किया जाना एक नए तरह की प्रक्रिया है और जब आप पहली बार कोई दवा तैयार करते हैं तो ये जरूरी है कि मरीज की सुरक्षा को पहली प्राथमिकता दी जाए।"
"हमें अब पता है कि इसके जरिए किस तरह के जीवाणु शरीर में डाले जाते हैं और इसलिए यदि आपके पास कोई ऐसा मिश्रण है जो सुरक्षित साबित हो चुका है तो इस समस्या से निपटा जा सकता है।"
हो सकता है कि ये जीवाणुओं के लिए दवाओं का भविष्य हो यानी इंसान के शरीर में जीवाणु के कारण होने वाली समस्या पहचानना और फिर उसका इलाज करना।