उत्तर प्रदेश में सियासी पारा काफी समय से चढ़ा हुआ था, लेकिन असल चोट तब लगी, जब राष्ट्रीय स्वयंसेवक संघ यानी आरएसएस ने साल 2022 में होने वाला उत्तर प्रदेश विधानसभा चुनाव मुख्यमंत्री योगी आदित्यनाथ के नेतृत्व में लड़ने का फैसला किया। साथ ही, तय कर दिया कि यूपी समेत अन्य पांच राज्यों में होने वाले चुनावों में पीएम मोदी चेहरा नहीं होंगे। इस फैसले के पीछे आरएसएस के सूत्रों ने भले ही मोदी की छवि को बचाने का हवाला दिया। संघ ने कहा कि क्षेत्रीय नेताओं के मुकाबले पीएम मोदी को चेहरा बनाने से उनकी छवि खराब होती है। विरोधियों का निशाना पीएम मोदी बने रहते हैं। हालांकि, राजनीतिक जानकारों ने इसे पीएम मोदी के वर्चस्व पर गहरा घाव माना। उनका कहना था कि आरएसएस ने पीएम मोदी का कद घटाने के लिए कमर कस ली है।
आरएसएस के दांव से पहले ही उत्तर प्रदेश की सियासत में हलचल मची हुई थी। अरविंद शर्मा को कैबिनेट में शामिल न करने से ब्राह्मण बनाम ठाकुरवाद एक बार फिर उभरकर सामने आ गया। इसके अलावा मोदी के सामने योगी हठ भी साफ-साफ नजर आने लगा। ऐसे में कांग्रेस के दिग्गज नेता जितिन प्रसाद ने भगवा रंग का चोला ओढ़ा तो भाजपा के केंद्रीय रणनीतिकारों को 'मरहम' मिल गया। गौर करने वाली बात यह है कि जब कानपुर के विकास दुबे का एनकाउंटर हुआ था तो जितिन प्रसाद ने मारे जाने वाले ब्राह्मणों की सूची बनाने की बात कही थी, जिससे उनके और सीएम योगी के बीच नाराजगी में खासा इजाफा हुआ था। अब जितिन के भाजपाई होते ही योगी खेमा भी बैकफुट पर आ गया।
राजनीतिक जानकारों का कहना है कि जितिन प्रसाद की एंट्री ने मुख्यमंत्री योगी आदित्यनाथ को बुरी तरह बेचैन कर दिया। इसका असर इतना तेज दिखा कि उन्होंने सबसे पहले अपने बगावती तेवरों को एक किनारे छोड़ दिया। साथ ही, आरएसएस की उलट धारा में चलकर अचानक दिल्ली आने और गृहमंत्री अमित शाह व भाजपा अध्यक्ष जेपी नड्डा के अलावा पीएम मोदी से भी मिलने का फैसला कर लिया। राजनीतिक जानकार तो यह भी कहते हैं कि ऑपरेशन जितिन के बाद ब्रांड मोदी पर एक बार फिर भरोसा करना योगी की मजबूरी हो गई है। उन्हें समझ आ गया है कि 'ब्रांड मोदी' के प्रभावी रहने पर सत्ता बच सकेगी। साथ ही, पार्टी, संगठन और नेताओं भविष्य भी सुरक्षित रहेगा। यही वजह है कि योगी अपनी हठ छोड़कर कैबिनेट में बदलाव के लिए भी लगभग राजी हो गए।