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सुप्रीम कोर्ट ने कहा: पुलिस अधिकारियों को मोरल पुलिसिंग का अधिकार नहीं, HC का आदेश कानून की दृष्टि से दोषपूर्ण

Sun, 18 Dec 2022 09:08 PM IST
निर्मल कांत न्यूज डेस्क, अमर उजाला, नई दिल्ली

सार

जस्टिस संजीव खन्ना और जेके माहेश्वरी की पीठ ने गुजरात हाईकोर्ट के 16 दिसंबर 2014 के उस फैसले को रद्द कर दिया, जिसमें सीआईएसएफ कांस्टेबल संतोष कुमार पांडे की याचिका को स्वीकार किया गया था।
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सुप्रीम कोर्ट - फोटो : सोशल मीडिया
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विस्तार
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सुप्रीम कोर्ट ने  सीआईएसएफ के एक कांस्टेबल को सेवा से हटाने के लिए अनुशासनात्मक कार्रवाई के आदेश को बरकरार रखा। कोर्ट ने कहा कि पुलिस अधिकारियों को मोरल पुलिसिंग करने की आवश्यकता नहीं है। 

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जस्टिस संजीव खन्ना और जेके माहेश्वरी की पीठ ने गुजरात हाईकोर्ट के 16 दिसंबर 2014 के उस फैसले को रद्द कर दिया, जिसमें सीआईएसएफ कांस्टेबल संतोष कुमार पांडे की याचिका को स्वीकार किया गया था और पचास फीसदी पिछले वेतन के साथ सेवा में उनकी बहाली का निर्देश दिया था। 

पांडे सीआईएसएफ में एक कांस्टेबल के रूप में काम कर रहे थे। उन्हें गुजरात के वडोदरा में आईपीसीएल टाउनशिप के ग्रीनबेल्ट क्षेत्र में नाइट ड्यूटी पर तैनात किया गया था, जहां उन्हें कदाचार के आरोपों पर 28 अक्तूबर, 2001 को ज्ञापन के जरिए चार्जशीट किया गया था। 
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चार्जशीट के अनुसार, पांडे 26 और 27 अक्तूबर 2001 की दरमियानी रात को वडोदरा के आईपीसीएल टाउनशिप के ग्रीनबेल्ट एरिया में एक बजे रात को ड्यूटी पर तैनात थे, मोटरसाइकिल पर एक व्यक्ति महेश बी. चौधरी और उनकी मंगेतर इलाके से गुजर रहे थे और कोने में रुक गए थे, तभी पांडे आगे आए थे और उनसे पूछताछ की थी। 

आरोपों के अनुसार, पांडे ने स्थिति का फायदा उठाया और चौधरी से कहा कि वह उनकी मंगेतर के साथ कुछ समय बिताना चाहते हैं। चार्जशीट में कहा गया है कि जब चौधरी ने इसका विरोध किया और नहीं माने तो पांडे ने उन्हें कुछ देने के लिए कहा और चौधरी ने उस समय पहनी हुई एक घड़ी दी।  

चौधरी ने अगले दिन शिकायत दर्ज कराई। जिसके बाद पांडे के खिलाफ जांच शुरू की गई, जिसके परिणामस्वरूप उनकी सेवा को समाप्त करने का आदेश दिया गया। खंडपीठ ने कहा कि उसकी राय में हाईकोर्ट द्वारा दिया गया तर्क तथ्य और कानून दोनों ही दृष्टि से दोषपूर्ण है। 

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