मुंबई पुलिस कमिश्नर संजय पांडेय
- फोटो : सोशल मीडिया
मुंबई पुलिस आयुक्त संजय पांडेय ने अधिकारियों को निर्देश दिया है कि यौन अपराधों से बच्चों का संरक्षण (पॉक्सो) अधिनियम के तहत छेड़छाड़ और अपराधों के मामले केवल एक एसीपी की सिफारिश पर और जोनल डीसीपी की अनुमति से दर्ज किए जाने चाहिए।
एक अधिकारी ने बताया कि आयुक्त ने उन मामलों के मद्देनजर आदेश जारी किया जहां व्यक्तिगत प्रतिद्वंद्विता या संपत्ति, धन के मामलों और व्यक्तिगत मुद्दों पर विवाद के कारण झूठे मामले दर्ज किए जाते हैं।
सोमवार को जारी निर्देश में कहा गया है कि ऐसे मामलों में बिना तथ्यों की जांच के आरोपी को तुरंत गिरफ्तार कर लिया जाता है और बाद में शिकायत फर्जी पायी जाती है।
आयुक्त ने आदेश में कहा है कि आरोपी व्यक्ति की प्रतिष्ठा बिना किसी कारण के धूमिल हो जाती है, भले ही वह आखिर में बरी हो जाए।
इससे बचने के लिए पुलिस अधिकारियों को संभागीय सहायक पुलिस आयुक्त की सिफारिश और जोनल डिप्टी कमिश्नर की अनुमति से ही छेड़छाड़ या पॉक्सो एक्ट के तहत प्राथमिकी दर्ज करने का निर्देश दिया गया है।
इसमें कहा गया है कि अनुमति देते समय डीसीपी को ललिला कुमारी केस में सुप्रीम कोर्ट के फैसले का पालन करना चाहिए।
2003 में 'ललिता कुमार बनाम यूपी सरकार और अन्य' केस में सुप्रीम कोर्ट की तीन सदस्यीय बेंच ने दिशानिर्देश जारी किए थे कि प्राथमिकी का पंजीकरण कब अनिवार्य है।
बाल आयोग ने जताई नाराजगी
मामले में बाल आयोग ने नाराजगी जाहिर की है। एनसीपीसीआर के अध्यक्ष प्रियांक कानूनगो ने महाराष्ट्र के डीजीपी को लिखा कि यह आदेश यौन शोषण के शिकार लोगों के अधिकार का गंभीर उल्लंघन करेगा और पीड़ितों को न्याय तक पहुंचने में अनुचित देरी का कारण बनेगा। आयोग अनुशंसा और अनुरोध करता है कि आपके कार्यालय द्वारा इस आदेश की समीक्षा की जाए और उसके बाद इसे वापस ले लिया जाए। मामले में की गई कार्रवाई की रिपोर्ट अगले 7 दिनों में आयोग को भेजी जा सकती है।