गोरखपुर
गोरखपुर की सीट भाजपा का अभेद्य किला बन चुकी थी। महंत अवैद्यनाथ के जमाने से गोरखनाथ मंदिर के उम्मीदवार के आगे कोई टिका नहीं। 1998 में अवैद्यनाथ के वारिस के तौर पर योगी आदित्यनाथ प्रत्याशी बने। वह 1998,1999, 2004, 2009, 2014 का चुनाव जीतने में सफल रहे। मुख्यमंत्री बनने के बाद उन्हें लोकसभा सीट छोडऩी पड़ी। 2018 में उपचुनाव हुआ और भाजपा ने लगातार उनके आदित्यनाथ के कोप का भाजन रहे उपेन्द्र शुक्ला को उम्मीदवार बनाया।
योगी आदित्यनाथ और उनकी राजनीति को करीब से जानने वालों का मानना है कि उपेन्द्र शुक्ला की उम्मीदवारी योगी के लिए गले के नीचे उतरने वाली बात नहीं थी। इसके लिए दशक भर से अधिक समय पहले सहजनवां में योगी द्वारा उपेन्द्र के साथ किए गए व्यवहार को याद किया जाता है। हालांकि मुख्यमंत्री योगी आदित्यनाथ ने जमकर उपेन्द्र शुक्ला के पक्ष में प्रचार किया। प्रधानमंत्री नरेन्द्र मोदी ने उपचुनाव में प्रचार से दूरी बनाए रखी और अंतत: उपेन्द्र शुक्ला चुनाव हार गए। राजनीति का संक्षेप यह कि योगी ने जमकर मेहनत की लेकिन वह मंदिर के बाहर के उम्मीदवार को लोकसभा उपचुनाव में नहीं जितवा पाए।
फूलपुर
आजादी के बाद से पहली यह सीट 2014 में भाजपा के खाते में गई थी। इसके दो बड़े कारण बताए जा रहे थे। पहला मोदी लहर और दूसरा बड़ा कारण केशव प्रसाद मोर्य का उम्मीदवार होना। अपना दल का भाजपा के साथ आना। फूलपुर लोकसभा उपचुनाव में 22 प्रत्याशी मैदान में थे। भाजपा के कौशलेन्द्र पटेल, समाजवादी पार्टी के नागेन्द्र पटेल और कांग्रेस के मनीष मिश्रा प्रमुख थे।
उ.प्र. सरकार के उपमुख्यमंत्री केशव प्रसाद मौर्य ने इस सीट को प्रतिष्ठा का प्रश्न बना लिया था। उ.प्र. सरकार के कैबिनेट मंत्रियों, भाजपा कार्यकर्ताओं ने जमकर मेहनत की। यहां भी प्रधानमंत्री मोदी ने चुनाव प्रचार नहीं किया और भाजपा का प्रत्याशी चुनाव हार गया। केशव प्रसाद मौर्य सदमे में है। उन्होंने प्रतिक्रिया दी है कि इतनी बड़ी तादाद में बसपा का वोट सपा प्रत्याशी के पक्ष में पड़ने का उन्हें अंदाजा ही नहीं था।
अररिया
बिहार की अररिया सीट पर पूर्व केन्द्रीय मंत्री तस्लीमुद्दीन के बेटे सरफराज आलम राष्ट्रीय जनता दल के टिकट पर उम्मीदवार थे। सबसे बड़े स्टार प्रचारक तेजस्वी यादव ही थे। राजद प्रमुख लालू यादव जेल में हैं। यह नीतिश कुमार के भाजपा के साथ फिर से एनडीए में शामिल होने के बाद होने वाला पहला उपचुनाव था। भाजपा ने पूरा जोर लगा दिया, लेकिन सीट पर राष्ट्रीय जनता दल का पारंपरिक कब्जा बना रहा है।
जहानाबाद विधानसभा सीट से जद(यू)-भाजपा का हारना चौंकाता है। यह जद(यू) की सीट थी और राजद के साथ गठबंधन के बाद उसे इसपर सफलता मिली थी। लेकिन नीतिश के भाजपा के साथ जाने के बाद यह सीट राजद के पाले में चली गई। हालांकि भाजपा भागलपुर विधानसभा सीट का उपचुनाव जीत गई है।