हिमाचल प्रदेश के बिलासपुर में बना अखिल भारतीय आयुर्विज्ञान संस्थान 'एम्स', पहाड़ के मुश्किल जीवन में मील का पत्थर साबित होगा। पहाड़, जंगल, बर्फ और नदी नालों से भरपूर इस प्रदेश के लोगों के लिए यह एम्स किसी देवदूत से कम नहीं होगा। प्रधानमंत्री मोदी ने बुधवार को एम्स का उद्घाटन किया है। अभी तक हिमाचल प्रदेश के लोगों को गंभीर बीमारियों के इलाज के लिए दिल्ली और चंडीगढ़ के चिकित्सा संस्थानों में जाना पड़ता था। वहां तक पहुंचने में समय भी लगता था और पैसे भी खर्च होते थे। खासतौर पर, प्रदेश के रिमोट क्षेत्र जैसे केलांग, किन्नौर, चंबा व लाहौल स्पीति आदि इलाकों के लोगों के लिए बिलासपुर एम्स किसी वरदान से कम नहीं होगा। बिलासपुर एम्स में 'ड्रोन' और 'हेलीकॉप्टर' जैसी सुविधा, दूरवर्ती क्षेत्रों के मरीजों की राह आसान करेगी।
पिछले दिनों एम्स के कार्यकारी निदेशक डॉ. वीर सिंह नेगी ने अमर उजाला डॉट कॉम के साथ एक खास बातचीत में विस्तार से चिकित्सा संस्थान की खूबियों का जिक्र किया था। उनका कहना था, पहाड़ के लोगों का जीवन, बहुत कठिन होता है। बरसात और लैंड स्लाइड होना आम बात है। ऐसे में सभी मरीजों के लिए समय पर चंडीगढ़ या दिल्ली पहुंचना आसान नहीं होता। जो मरीज वहां पहुंचते हैं तो खर्च उन्हें परेशान करता है। बिलासपुर एम्स, अब इन सभी दिक्कतों से लोगों को छुटकारा प्रदान करेगा। चूंकि यह एक पहाड़ी राज्य है, इसलिए केवल सड़कों के जरिए मरीज यहां तक पहुंच जाएंगे, ये सोचना भी ठीक नहीं है। इसके लिए एम्स प्रशासन और सरकार को दो कदम आगे चलना होगा। देश में ड्रोन तकनीक विकसित हो रही है। स्वदेशी कंपनियां, बड़े यानी हैवी ड्रोन बनाने लगी हैं। इनके जरिए केवल सामान ही नहीं, बल्कि मरीजों को भी ट्रांसपोर्ट किया जा सकता है। दुर्गम पहाड़ों पर रहने वाले लोगों के ब्लड सेंपल, रिपोर्ट, दवा पहुंचाना और चिकित्सा से जुड़े कार्य, ड्रोन की मदद से आसान हो जाएंगे।
डॉ. वीर सिंह के मुताबिक, एम्स परिसर में ही स्थायी हेलीपैड तैयार किया गया है। आपात स्थिति में इसकी मदद से मरीजों को एम्स तक लाया जाएगा। इसके लिए केंद्र एवं राज्य सरकार ने विशेष योजना तैयार की है। जिला प्रशासन के अनुरोध पर गंभीर स्थिति वाले मरीजों को एम्स लाने के लिए हेली की मदद लेंगे। एयर एंबुलेंस से उन लोगों की राह आसान हो जाएगी, जो दूर दराज के इलाकों में रहते हैं। खासतौर से ऐसे इलाके, जहां बर्फ पड़ने की वजह से हर समय यातायात के साधन मिलना संभव नहीं हो पाता।
डॉ. वीर सिंह ने बताया, कोरोना महामारी के दौरान मरीजों को ऑक्सीजन की कमी का सामना करना पड़ा था। एम्स में मरीजों को ऑक्सीजन कम होने जैसी किसी समस्या से न जूझना पड़े, इसके लिए पुख्ता व्यवस्था की गई है। बिलासपुर एम्स में हर समय 40 हजार लीटर लिक्विड ऑक्सीजन का इंतजाम रहेगा। इसके लिए दो टैंक बनाए गए हैं। इनकी मदद से एम्स में ऑक्सीजन की किल्लत नहीं रहेगी। कुछ समय बाद एम्स का अपना ऑक्सीजन प्लांट भी चालू हो जाएगा। देश के एक्सपर्ट चिकित्सक, बिलासपुर एम्स में अपनी सेवाएं दें, ऐसा प्रयास किया जा रहा है।
फैकल्टी के सदस्यों को वे सभी सुविधाएं मुहैया कराई जाएंगी, जो उन्हें दूसरे राज्यों के एम्स या अन्य संस्थानों में मिलती हैं। सेंट्रल स्कूल की मंजूरी मिल चुकी है। सामान्य बीमारियों के लिए लोगों को एम्स में न आना पड़े, इसके लिए टेलीमेडिशन की सुविधा शुरु की गई है। अपने घर बैठकर ही लोग, एम्स के डॉक्टरों से बातचीत कर सकेंगे। एम्स परिसर में सेटेलाइट सेंटर शुरू होने के बाद टेलीमेडिशन की सुविधा का विस्तार किया जाएगा। आईसीएमआर सेंटर की मदद से दूर दराज के क्षेत्रों में विशेष 'आउटरीच स्टेशन' तैयार करने की योजना पर काम शुरू किया गया है। जल्द ही इसके सार्थक नतीजे देखने को मिलेंगे।
बिलासपुर एम्स में सभी ऑपरेशन थियेटर अत्याधुनिक तकनीक से लैस हैं। ऑपरेशन के दौरान देश-विदेश के किसी भी प्रमुख चिकित्सा संस्थान से जुड़ा जा सकता है। गंभीर स्थिति में बाहर के विशेषज्ञों से ऑपरेशन के वक्त सलाह लेने के लिए अत्याधुनिक तकनीक इस्तेमाल में लाई जा रही है। सभी ऑपरेशन थियेटर में कहीं से भी लाइव जुड़ने की व्यवस्था रहेगी। ट्रांसपोर्टर वेंटिलेटर सुविधा भी शुरू की गई है। खास बात ये है कि बिलासपुर एम्स में पचास फीसदी से ज्यादा तकनीकी उपकरण भारत में निर्मित हैं। संस्थान में एमबीबीएस के पहले बैच का शैक्षणिक सत्र जनवरी 2021 में शुरू हुआ था और दूसरा बैच 2022 में शामिल हुआ है। पहले एवं दूसरे बैच में छात्रों की संख्या 50 थी। इस साल अक्तूबर से एमबीबीएस के तीसरे बैच में सौ छात्र आएंगे। एमडी एवं दूसरे संकायों में भी नए कोर्स शुरू किए जा रहे हैं। पहले ही वर्ष में संकाय द्वारा 84 रिसर्च रिपोर्ट प्रकाशित हुई हैं। आईसीएमआर द्वारा फंडिंग के लिए अनुसंधान परियोजनाओं को तकनीकी रूप से अनुमोदित किया गया है। इसमें से अधिकांश परियोजना आदिवासी स्वास्थ्य और अत्यधिक ऊंचाई वाले रोगों पर अनुसंधान से सम्बंधित हैं।