गांधी जी जब साबरमती आश्रम आए तो यहां मगनलाल गांधी उनके सबसे बड़े शुभचिन्तक और बुजुर्ग थे। 1928 में मगनलाल गांधी के निधन के बाद गांधी जी ने कहा कि लगता है वो ‘विधवा’ हो गए। मगनलाल गांधी के इसी निवास को अब चरखों के लिए जाना जाता है। वैसे तो आप आश्रम में जिधर से भी गुजरेंगे, आपको अलग अलग जगहों पर तरह तरह के चरखे मिलेंगे। लेकिन मगन निवास में आपको चरखों की पूरी विकास यात्रा दिखेगी। कैसे पुराने चरखे होते थे और कैसे कैसे उनमें बदलाव आते गए।
सूत कातने के तरीके कैसे बदले और कैसे हैंडलूम से पावरलूम तक का सफर तय कर लिया गया। यहां आपको कपास से बुने हुए धागों से लेकर कपड़ा बनने की पूरी प्रक्रिया समझ में आ जाएगी और आप देखेंगे कि कैसे खादी के लंबे चौड़े थान वाले कपड़े तैयार होते हैं और कैसे उसमें अलग अलग डिजाइन बनाई जाती है।
चरखों का ये शानदार संग्रहालय बेशक किसी भी विदेशी मेहमान को दांतों तले उंगली दबाने को मजबूर करता है। उन्हें यहीं आकर महसूस होता है कि गांधी जी जिस स्वदेशी की बात करते थे, जिस स्वराज का नारा देते थे और जिस तरह खुद अपनी जीवन संगिनी कस्तूरबा और अपने साथ के तमाम अनुयायियों को आत्मनिर्भरता का मंत्र देते थे, उसकी ज़मीनी हकीकत क्या है।
नरेंद्र मोदी- बेंजामिन नेतान्याहू
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बेशक नेतन्याहू और उनकी पत्नी के लिए मोदी के साथ गुजरात घूमना, चरखे चलाना और पतंग उड़ाना एक दिलचस्प राजकीय यात्रा का हिस्सा हो और तमाम विदेशी मेहमानों की तरह गांधी के इस चर्चित आश्रम में वक्त गुज़ारना एक अनुभव, लेकिन इसके इतिहास और गहराई में जाने के अपने मायने हैं।
साबरमती आश्रम को सियासत का केन्द्र भी हमारे चुनावी महारथियों ने ही बनाया और मोदी से लेकर मीरा कुमार तक यहीं आकर खुद को सबसे बड़ा गांधीवादी साबित भी करते हैं और चुनावी यात्रा पर निकलते हैं, लेकिन सोमनाथ से सियासी बिगुल फूंकने और साबरमती आश्रम में चरखा चलाकर देश को संदेश देने के अपने अपने मायने हैं। शायद यही गुजरात है और यही गुजरात का सच है। पंडित दीनदयाल उपाध्याय अगर एकात्म मानववाद की बात करते रहे और ये दर्शन देते रहे तो भला साबरमती आश्रम और चरखे से बड़ा एकात्म मानववाद आपको और कहां मिलेगा।