शीर्ष कोर्ट ने इको-सेंसिटिव जोन पर 2022 के आदेश में किया संशोधन
सुप्रीम कोर्ट ने बुधवार को संरक्षित वनों, राष्ट्रीय उद्यानों और वन्यजीव अभयारण्यों के आसपास कम से कम एक किलोमीटर के इको-सेंसिटिव जोन (ईएसजेड) के भीतर विकास कार्य पर लगा पूर्ण प्रतिबंध हटा दिया है। अदालत ने पिछले साल जून में पर्यावरण के लिहाज से संवेदनशील क्षेत्रों के भीतर विकास या निर्माण कार्य पर पूर्ण प्रतिबंध लगा दिया था। हालांकि, अब उस आदेश में संशोधन किया गया है।
सुप्रीम कोर्ट ने यह संशोधन केंद्र सरकार द्वारा दायर एक याचिका पर सुनवाई करते हुए किया। इस याचिका में तर्क दिया गया था कि यदि निर्देशों को संशोधित नहीं किया गया तो ESZ में रहने वाले लाखों लोगों को भारी कठिनाई होगी। सरकार ने तर्क दिया था कि उसने 9 फरवरी, 2011 को राष्ट्रीय उद्यानों और वन्यजीव अभ्यारण्यों के आसपास इको-सेंसिटिव जोन (ईएसजेड) की घोषणा के लिए पहले ही दिशानिर्देश जारी कर दिए हैं, जिन्हें राष्ट्रीय वन्यजीव बोर्ड से परामर्श करने के बाद तैयार किया गया था।
इस महीने की शुरुआत में मामले की सुनवाई के दौरान शीर्ष अदालत ने कहा था कि वन्यजीव अभयारण्यों और राष्ट्रीय उद्यानों के आसपास पर्यावरण के प्रति संवेदनशील क्षेत्रों के भीतर विकास पर पूर्ण प्रतिबंध नहीं लगाया जा सकता है। अदालत ने कहा कि वह आदेश में संशोधन करना चाहती है। कोर्ट ने कहा, "अगर इस फैसले को लागू किया जाता है, तो हर राज्य में प्रधान मुख्य वन संरक्षक (पीसीसीएफ) के पास स्थायी संरचनाओं के निर्माण के लिए व्यक्तिगत ग्रामीणों के अनुरोधों पर विचार करने के अलावा कोई अन्य काम नहीं बचेगा।"
आरोपी को स्वत: जमानत से वंचित करने के लिए जांच पूरी किए बिना आरोप पत्र दायर न करे जांच एजेंसी: सुप्रीम कोर्ट
सुप्रीम कोर्ट ने बुधवार को कहा कि किसी आरोपी को स्वत: जमानत से वंचित करने के लिए जांच एजेंसी को बिना जांच पूरी किए अदालत में आरोप पत्र दायर नहीं करना चाहिए। जस्टिस कृष्ण मुरारी और जस्टिस संजय कुमार की पीठ ने कहा, अगर कोई जांच एजेंसी जांच पूरी किए बिना चार्जशीट दाखिल करती है, तो इससे अभियुक्त के स्वत: जमानत पाने का अधिकार खत्म नहीं हो जाएगा।
शीर्ष अदालत का यह फैसला एक आपराधिक मामले के आरोपी को जमानत देते हुए आया। बता दें कि सीआरपीसी की धारा 167 के अनुसार, अगर जांच एजेंसी रिमांड की तारीख से 60 दिन के भीतर आरोप पत्र दायर नहीं करती है तो आरोपी स्वत: जमानत का हकदार होता है। कुछ श्रेणी के अपराधों के लिए, निर्धारित अवधि को 90 दिनों तक बढ़ाया जा सकता है।
छत्तीसगढ़ के सीएम भूपेश बघेल
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PMLA को चुनौती देने के लिए सुप्रीम कोर्ट पहुंचा छत्तीसगढ़
धन शोधन निवारण अधिनियम (पीएमएलए) की संवैधानिक वैधता को छत्तीसगढ़ ने सुप्रीम कोर्ट में चुनौती दी है। इसके बाद छत्तीसगढ़ ऐसा करने वाला वाला पहला राज्य बन गया। भूपेश बघेल के नेतृत्व वाली कांग्रेस सरकार ने संविधान के अनुच्छेद 131 के तहत इस कानून को चुनौती दी है। बता दें कि संविधान का अनुच्छेद 131 किसी राज्य को केंद्र या किसी अन्य राज्य के साथ विवाद के मामलों में सीधे सर्वोच्च न्यायालय जाने का अधिकार देता है।
इससे पहले, निजी व्यक्तियों और पक्षों द्वारा विभिन्न आधारों पर मनी लॉन्ड्रिंग अधिनियम और इसके प्रावधानों को चुनौती दी गई थी, लेकिन कानून की वैधता को पिछले साल शीर्ष अदालत की तीन-न्यायाधीशों की पीठ ने बरकरार रखा था। अब पहली बार किसी राज्य सरकार द्वारा मनी लॉन्ड्रिंग अधिनियम और इसके प्रावधानों को चुनौती दी गई है।
छत्तीसगढ़ की कांग्रेस सरकार द्वारा लाए गए मामले में कहा गया है कि राज्य सरकार को उसके अधिकारियों और राज्य के निवासियों की ओर से कई शिकायतें मिल रही हैं कि ईडी जांच की आड़ में उनके साथ यातना, गाली और मारपीट की जा रही है।
मुख्य न्यायाधीश डी वाई चंद्रचूड़ और न्यायमूर्ति पीएस नरसिम्हा की पीठ को छत्तीसगढ़ सरकार की ओर से पेश वरिष्ठ अधिवक्ता मुकुल रोहतगी और अधिवक्ता सुमीर सोढ़ी ने कहा कि यह मुद्दा संवैधानिक महत्व का है और इस पर तत्काल सुनवाई की आवश्यकता है। इस पर पीठ ने कहा कि मामले की सुनवाई चार मई को होगी।
दुष्कर्मी पिता को बिना किसी छूट के 20 साल की सजा
सुप्रीम कोर्ट ने नौ साल की बेटी से दुष्कर्म के दोषी एक व्यक्ति को बिना किसी छूट के 20 साल की कैद काटने का आदेश है। शीर्ष अदालत ने अपने आदेश में कहा कि उसके अय्याश और भयानक कृत्यों से रिश्ते की पवित्रता नष्ट हो गई।
एक विशेष फास्ट ट्रैक अदालत ने 2013 में व्यक्ति को दोषी ठहराया था। उसे भारतीय दंड संहिता की धारा 376 (बलात्कार), 377 (अप्राकृतिक अपराध) और 506 (आपराधिक धमकी) के तहत दोषी ठहराते हुए जुर्माने के साथ 20 की न्यूनतम अवधि के आजीवन कारावास की सजा सुनाई थी। दिल्ली हाईकोर्ट ने 2017 में व्यक्ति की दोषसिद्धि और सजा को बरकरार रखा था। हाईकोर्ट के फैसले के खिलाफ दोषी ने संविधान के अनुच्छेद 136 का हवाला देते हुए सुप्रीम कोर्ट का दरवाजा खटखटाया था। अनुच्छेद 136 विशेष अनुमति याचिकाओं की अनुमति देने के लिए शीर्ष अदालत को विवेकाधीन शक्तियां प्रदान करता है।
जस्टिस अभय एस ओका और जस्टिस संजय कुमार की पीठ ने कहा कि व्यक्ति को अपनी ही बेटी के साथ सबसे ‘भयानक और भयावह’ अपराधों में से एक का दोषी पाया गया। वारदात के वक्त बहुत ही कम उम्र की थी। इस मामले में यदि वह सिर्फ 14 साल जेल में गुजारने के बाद रिहाई हासिल कर लेता है तो 20 या इसके कुछ अधिक उम्र की बेटी के जीवन में उसका फिर से दखल हो जाएगा जोकि उसे और आघात पहुंचा सकता है तथा उसके जीवन को मुश्किल बना सकता है। पीठ ने कहा कि पर्याप्त रूप से लंबी अवधि के लिए उसकी कैद न केवल यह सुनिश्चित करेगी कि उसे उसका न्यायोचित अधिकार मिले, बल्कि उसकी बेटी को अधिक समय और परिपक्वता भी मिले और वह अपने जीवन के साथ आगे बढ़े, भले ही उसके खलनायक पिता को रिहा कर दिया गया हो।
SC ने गुजरात HC के आदेश को खारिज किया
सुप्रीम कोर्ट ने बुधवार को आयुर्वेद चिकित्सकों को एलोपैथी डॉक्टरों के बराबर मानने के गुजरात उच्च न्यायालय के आदेश को खारिज कर दिया। अपने आदेश में गुजरात उच्च न्यायालय ने कहा था कि सरकारी अस्पतालों में कार्यरत आयुर्वेद चिकित्सकों के साथ एलोपैथी डॉक्टरों के बराबर व्यवहार किया जाना चाहिए। साथ ही हाईकोर्ट ने उन्हें समान वेतन का हकदार भी बताया था।
शीर्ष अदालत 2012 के गुजरात उच्च न्यायालय के आदेश को चुनौती देने वाली अपीलों की एक बैच की सुनवाई कर रही थी। इसमें कहा गया था कि आयुर्वेद चिकित्सक एमबीबीएस डिग्री वाले डॉक्टरों के बराबर व्यवहार करने के हकदार हैं।
धर्म आधारित आरक्षण जारी नहीं रखने का विवेकपूर्ण फैसला किया: कर्नाटक सरकार
कर्नाटक सरकार ने सुप्रीम कोर्ट से कहा है कि उसने केवल धर्म के आधार पर आरक्षण जारी नहीं रखने का विवेकपूर्ण निर्णय लिया है। यह असंवैधानिक है। इसलिए मुस्लिम समुदाय के लिए चार प्रतिशत आरक्षण के प्रावधान को समाप्त किया गया। राज्य सरकार ने 27 मार्च के उसके दो आदेशों को चुनौती देने वाली याचिकाओं पर अपना जवाब दायर किया। याचिकाओं में अन्य पिछड़ी जातियों की 2बी श्रेणी में मुसलमानों के लिए चार प्रतिशत आरक्षण को निरस्त करने को चुनौती दी गई है। सरकार ने इस चार फीसदी को सरकारी शिक्षण संस्थानों में दाखिले और नौकरियों में वोक्कालिगा और लिंगायत समुदाय के लोगों के बीच बराबर-बराबर बांट दिया था।