दिल्ली एम्स के डॉ. संजय राय का कहना है कि अध्ययनाें से एंटीबॉडी कम समय तक टिकने की पुष्टि हो रही है, लेकिन प्लाज्मा थैरेपी के प्रभावों पर भारत में परीक्षण के परिणाम सामने नहीं आए हैं। एम्स में ही कई मरीजों पर इसके सकारात्मक परिणाम मिले हैं। उन्होंने माना, संक्रमण से ठीक लोगों में कुछ समय तक ही एंटीबॉडी मिल रही हैं।
केंद्र सरकार के ही लेडी हार्डिंग मेडिकल कॉलेज के निदेशक डॉ. एनएन माथुर का कहना है कि एंटीबॉडी पर भारत में विस्तृत अध्ययन की आवश्यकता है। इसकी बड़ी वजह दूसरे देशों की तुलना में भारत में संक्रमण का अलग रूप और असर मिलना है। हालांकि वह भी मानते हैं कि कोरोना के एंटीबॉडी बहुत कम समय के लिए ही दिखाई दे रहे हैं। प्लाज्मा दान के वक्त एंटीबॉडी जांच होनी ही चाहिए।
50 दिन बाद ही गायब हो रही एंटीबॉडी...
लंदन के एनएचएस ब्लड एंड ट्रासंप्लांट विभाग के माइक्रोबॉयोलाजी विशेषज्ञ प्रो हेली हारवला का कहना है कि इसी वर्ष 22 अप्रैल से 12 मई के बीच पहले 436 प्लाज्मा दाताओं पर यह अध्ययन किया गया है। अध्ययन के दौरान 30 से 40, 40 से 50 और 50 से अधिक दिन में तीन बार अलग अलग परीक्षण करते हुए एंटीबॉडी का पता लगाया जिसका परिणाम है कि 50 दिन बाद 88 से 91 फीसदी तक में एंटीबॉडी बेअसर दिखाई दिए हैं।