कीटनाशक उत्पादक कंपनियों के जाल में फंसकर किसान अपनी फसलों पर गलत रसायनों का इस्तेमाल कर रहे हैं। इसका सीधा असर लोगों के स्वास्थ्य पर पड़ रहा है। साथ ही इसके कारण भारत से विदेशों को होने वाले फल-सब्जी के निर्यात पर भी असर पड़ रहा है। एक गैर सरकारी संगठन ने दावा किया है कि दिल्ली के बाजारों में बिकने वाले फल-सब्जियों में अंतरराष्ट्रीय मानकों की तुलना में 750 गुना तक ज्यादा खतरनाक रसायनों का उपयोग किया जा रहा है, जो लोगों में गंभीर बीमारियां पैदा कर रहा है। कृषि विशेषज्ञों की राय है कि यदि किसानों को इसके प्रति जागरूक नहीं किया गया तो इसका बड़ा नुकसान उठाना पड़ सकता है।
जैसे कोराजेन नामक कीटनाशक गन्ने की फसल को कीड़ों से बचाता है। एक बार छिड़काव के बाद इसका चार से पांच महीने तक असर रहता है। इस दौरान गन्ने को लाल सुंडी से खराब करने वाले कीड़े फसल को नुकसान नहीं पहुंचा पाते। चूंकि गन्ना लगभग एक वर्षीय फसल है, पूरे फसल चक्र में इसका दो बार से ज्यादा छिड़काव करने की आवश्यकता नहीं होती।
लेकिन देखने में आ रहा है कि किसान इस कोराजेन का इस्तेमाल उन सब्जियों की फसलों पर भी कर दे रहे हैं जो दो, तीन या चार महीने के अंदर ही पैदा हो जाती हैं। इससे कीटनाशकों का कुछ अंश इनके अंदर रह जाता है, जो लोगों के पेट तक पहुंच जाता है। यह लोगों में कैंसर जैसे घातक रोग पैदा करता है, जिससे बचना असंभव हो जाता है।
मुजफ्फरनगर के फलों के निर्यातक तारिक मुस्तफा अंतरराष्ट्रीय बाजार में आम की फसल का निर्यात करते हैं। उन्होंने कहा कि हमारे देश के किसान इन रसायनों के खतरनाक असर के प्रति पूरी तरह अनजान होते हैं। कितने खेत में किस रसायन की कितनी मात्रा उचित है, इसका भी उन्हें सही तरीके से प्रशिक्षण नहीं दिया जाता, जिससे वे इसका अंधाधुंध इस्तेमाल करते हैं और इससे फलों-सब्जियों की गुणवत्ता प्रभावित होती है। उन्होंने कहा कि सरकार को किसानों को प्रशिक्षित करने और बाजार से फलों के रैंडम सैंपल लेकर चेकिंग किए जाने की उचित व्यवस्था बनानी चाहिए।
एग्रीकल्चर एंड प्रोसेस्ड फूड प्रॉडक्ट्स एक्सपोर्ट डेवलपमेंट अथॉरिटी (APEDA) के अनुसार, भारत, चीन के बाद दुनिया का दूसरा सबसे बड़ा फल-सब्जियों का उत्पादन करने वाला देश है। फल-सब्जी प्रोसेसिंग बाजार 7.6 फीसदी की दर से बढ़ रहा है और वित्त वर्ष 2023 में इसका व्यापार 256.4 बिलियन रुपये तक पहुंचने का अनुमान है। पिछले कुछ वर्षों में यह व्यापार तेज गति से बढ़ रहा है। 2018 में वैश्विक एक्सपोर्ट 138 बिलियन डॉलर तक पहुंच चुका है। लेकिन इसके बाद भी सच्चाई यह है कि भारत का फल-सब्जी का बाजार बहुत पिछड़ा हुआ है और यह कुल वैश्विक उत्पादन मूल्य की दृष्टि से केवल एक फीसदी के करीब हिस्सेदारी रखता है।