इन दिनों दुर्लभ रोगों से पीड़ित मरीज मर्ज के साथ-साथ दूसरी पीड़ाओं से भी गुजर रहे हैं। सरकार ने इनकी मदद के लिए राष्ट्रीय दुर्लभ रोग नीति 2021 लागू की है जिसके तहत रोगी को इलाज के लिए 50 लाख तक की मदद मिल सकती है, लेकिन अधिकांश मरीज और तीमारदारों का कहना है कि पहले महीनों तक नियमों के बारे में अस्पतालों को पर्याप्त जानकारी नहीं थी और अब सरकारी फाइल आगे बढ़ानी है तो दोबारा जांच कराने के लिए कह रहे हैं। इसमें कम से कम 30 से 40 हजार रुपये तक का खर्च आ रहा है।
मरीजों के अनुसार, अब तक हजारों रुपये इलाज में खर्च हो चुके हैं। ऐसे में फिर से जांच के लिए कहां से रुपये जमा करें? जानकारी के अनुसार, बीते साल 19 मई को केंद्रीय स्वास्थ्य मंत्रालय ने सूचना जारी करते हुए बताया कि राष्ट्रीय दुर्लभ रोग नीति के तहत मरीजों की आर्थिक सहायता राशि 20 से बढ़ाकर 50 लाख रुपये तक की गई है।
इसके लिए देश में 10 बड़े अस्पतालों को सेंटर ऑफ एक्सीलेंस भी बनाया गया लेकिन महीनों बाद भी नए नियम पर गौर नहीं किया गया। इसके चलते संसद में महाराष्ट्र में एनसीपी नेता डॉ. फौजिया खान ने सवाल उठाते हुए बताया कि दुर्लभ रोगियों की उपचार न मिलने की वजह से मौतें हो रही हैं। उन्होंने तमिलनाडु से लेकर महाराष्ट्र में हुईं मरीजों की मौत के बारे में भी बताया।
स्वास्थ्य मंत्रालय के ही अनुसार, भारत में दुर्लभ आनुवंशिक स्थितियां मुख्य रूप से लाइसोसोमल स्टोरेज डिसऑर्डर जैसे पोम्पे रोग, गौचर रोग, फैब्री रोग और एमपीएस1 पीड़ित रोगी आर्थिक सहायता ले सकते हैं। रेयर डिजीज इंडिया फाउंडेशन के अध्यक्ष सौरभ सिंह का कहना है कि नियमों में संशोधन के बाद से एक भी मरीज या परिवार ऐसा नहीं है जिन्होंने मदद से उपचार शुरू किया हो।कई युवा रोगी मुख्य रूप से बच्चों का जीवन जोखिम में है।
अब तक 10 बच्चों की मौत
सांसद वरूण गांधी ने डॉ मनसुख मंडाविया को पत्र लिख दुर्लभ रोगियों की मदद करने की अपील की है। उन्होंने लिखा था है कि सरकार से अब तक दुर्लभ रोगियों को मदद नहीं मिल पा रही है जबकि इलाज के अभाव में अब तक 10 बच्चों की मौत हुई है। अभी भी 208 बच्चे बीमारी का सामना कर रहे हैं व इलाज कराने के लिए मदद मांग रहे हैं।
तीमारदार बोले, बार-बार लगाने पड़ते हैं अस्पताल के चक्कर, ठीक से कोई जानकारी भी नहीं देता
क्या कहते हैं मरीज
2.5 साल का नवाजुद्दीन अंसारी गौचर रोग से पीड़ित है। नौ महीने तक परिवार उसका इलाज कराता रहा लेकिन दिसंबर 2021 में अचानक मदद मिलना बंद हुई। राज्य सरकार ने यह कहते हुए परिजनों को वापस लौटा दिया कि उनके पास अब फंड नहीं है। तब से लेकर नवंबर 2022 तक मरीज को उपचार नहीं मिला। इसी तरह सात साल नौ माह की आद्रीजा मुडी भी गौचर रोगी हैं। कलकत्ता उच्च न्यायालय के आदेश पर जाकर पिछले वर्ष फरवरी में उनका इलाज शुरू हो पाया लेकिन दवा महंगी होने और समय पर मदद न मिलने के कारण बीच बीच में इलाज रोकना पड़ा।
पहले जांच कराने में 45 हजार खर्च
दिल्ली के जहांगीरपुर स्थित झुग्गी निवासी मो. हिसामुद्दीन ने बताया कि उनका बेटा नीमन पिक टाइप बी नामक बीमारी से ग्रस्त है। वे लंबे समय से दिल्ली एम्स में इलाज करा रहे हैं। इलाज पर लगभग 65 लाख का खर्च होना है। उन्होंने पिछले वर्ष राष्ट्रीय दुर्लभ रोग नीति के तहत आर्थिक मदद लेने की अपील की थी लेकिन अभी तक उनकी कोई सुनवाई नहीं हुई। कुछ दिन पहले उन्हें पता चला कि दोबारा से बच्चे की सभी जांच करानी है। पहले जांच कराने में करीब 45 हजार रुपये तक खर्च हो गया था। अब फिर से वही सब जांच कराने के लिए कह रहे हैं।