संसद की एक स्थायी समिति ने सुप्रीम कोर्ट व हाईकोर्टों में समाज के विभिन्न वर्गों का प्रतिनिधित्व बढ़ाने की सिफारिश की है। समिति का कहना है कि न्यायापालिका के प्रति भरोसा, विश्वसनीयता और स्वीकार्यता बढ़ाने के लिए जरूरी है कि इसमें हाशिये पर रहने वाले विभिन्न तबकों की भागीदारी बढ़ाई जाए। समिति ने सुप्रीम कोर्ट व हाईकोर्ट में न्यायाधीशों की सेवानिवृत्ति आयु बढ़ाने की भी सिफारिश की है। साथ ही कहा है कि सेवानिवृत्ति की आयु बढ़ाते समय, जजों के प्रदर्शन का उनकी सेहत, निर्णयों की गुणवत्ता और उनकी तरफ से सुनाए गए फैसलों के आधार पर मूल्यांकन किया जा सकता है।
राज्यसभा सांसद सुशील कुमार मोदी की अध्यक्षता वाली कार्मिक, लोक शिकायत, कानून और न्याय विभाग की स्थायी संसदीय समिति ने सोमवार को संसद के दोनों सदनों में न्यायिक प्रक्रियाएं और उनमें सुधार विषय पर अपनी 133वीं रिपोर्ट पेश की। रिपोर्ट के पैरा 12 में समिति ने इस बात पर चिंता जताई कि हाल के वर्षों में समाज के वंचित तबकों के प्रतिनिधित्व में कमी आई है। महिलाओं के अलावा एससी, एसटी, ओबीसी का प्रतिनिधित्व कम होने ने उच्च न्यायपालिका देश की सामाजिक विविधता को प्रतिबिंबित नहीं करती। सुप्रीम कोर्ट व हाईकोर्ट में नियुक्तियों में आरक्षण का कोई प्रावधान नहीं है। पर विभिन्न तबकों को पर्याप्त प्रतिनिधित्व पर विचार किया जाना। इससे न्यायपालिका के प्रति लोगों का भरोसा और ज्यादा बढ़ेगा। नियुक्तियों के लिए सिफारिशें करते समय कॉलेजियम को इस तथ्य पर भी ध्यान देना चाहिए। रिपोर्ट में कहा गया है कि हाईकोर्ट के न्यायाधीशों की सामाजिक स्थिति से संबंधित डेटा 2018 से उपलब्ध है। साथ ही पैरा 17 में न्याय विभाग से सभी मौजूदा न्यायाधीशों के संबंध में ऐसे डेटा एकत्र करने के तरीके और साधन खोजने की सिफारिश की गई है।
और भी बहुत कुछ कहती है रिपोर्ट
- रिपोर्ट कहती है कि कुछ माह अदालतों के सामूहिक अवकाश के मामले में संवेदनशीलता के साथ विचार होना चाहिए। बड़ी संख्या में मामले लंबित होने कारण अक्सर मांग उठती है कि लंबी छुट्टियां खत्म होनी चाहिए।
- इस दौरान सिर्फ गिनी-चुनी अवकाश अदालतों या पीठों के ही काम करने से वादियों को खासी परेशानी उठानी पड़ती है।
- रिपोर्ट के मुताबिक, फिलहाल सुप्रीम कोर्ट में लंबित मुकदमों की संख्या स्थिर है। शीर्ष कोर्ट ने 2022 में कुल दर्ज नए मामलों की तुलना में ज्यादा संख्या में मामले निपटाए। लेकिन पहले से लंबित 35,000 मामले समस्या बने हैं।
- रिपोर्ट हाईकोर्ट में लंबित मामलों की संख्या काफी ज्यादा होने पर जरूर चिंता जताती है।
समिति ने रिपोर्ट के पैरा 13 में कहा, हालांकि उच्च न्यायालयों और सर्वोच्च न्यायालय स्तर पर न्यायिक नियुक्तियों में आरक्षण का कोई प्रावधान नहीं है, लेकिन समिति का मानना है कि भारतीय समाज के विभिन्न वर्गों का पर्याप्त प्रतिनिधित्व नागरिकों के बीच न्यायपालिका के विश्वास, विश्वसनीयता और स्वीकार्यता को और मजबूत करेगा।
रिपोर्ट के पैरा 16 में, समिति ने यह भी उल्लेख किया है कि उच्च न्यायपालिका में नियुक्तियों के लिए सिफारिशें करते समय सर्वोच्च न्यायालय और उच्च न्यायालय के कॉलेजियम दोनों को अल्पसंख्यकों सहित समाज के हाशिए पर रहने वाले वर्गों से पर्याप्त संख्या में महिलाओं और उम्मीदवारों की सिफारिश करनी चाहिए। इस प्रावधान का प्रक्रिया ज्ञापन (एमओपी) में स्पष्ट रूप से उल्लेख किया जाना चाहिए, जिसे वर्तमान में अंतिम रूप दिया जा रहा है।
इसके अलावा समिति ने कहा कि अब तक उच्च न्यायालय के न्यायाधीशों की सामाजिक स्थिति से संबंधित डाटा 2018 से उपलब्ध है। समिति ने रिपोर्ट के पैरा 17 में न्याय विभाग से सिफारिश की है कि वर्तमान में सर्वोच्च न्यायालय और उच्च न्यायालयों में सेवारत सभी न्यायाधीशों के संबंध में इस तरह के डाटा को इकट्ठा करने के तरीके और साधन खोजें। समिति ने रिपोर्ट में कहा, ऐसा करने के लिए यदि आवश्यक हो, तो संबंधित अधिनियमों और न्यायाधीशों के सेवा नियमों में आवश्यक संशोधन किए जा सकते हैं।
यह रिपोर्ट उच्चतम न्यायालय और उच्च न्यायालयों जैसी देश की उच्च न्यायपालिका से संबंधित है जिसमें समिति ने मुद्दों की जांच की और छह सुधारों का सुझाव दिया जिसमें उच्च न्यायालय और उच्चतम न्यायालय में न्यायाधीशों की नियुक्ति में सामाजिक विविधता, सुप्रीम कोर्ट की क्षेत्रीय पीठों की व्यवहार्यता, सर्वोच्च न्यायालय और उच्च न्यायालयों के जजों की रिटायरमेंट उम्र बढ़ाने की संभावना, सर्वोच्च न्यायालय और उच्च न्यायालयों में छुट्टियां, सर्वोच्च न्यायालय और उच्च न्यायालयों के न्यायाधीशों द्वारा संपत्ति की अनिवार्य घोषणा और सर्वोच्च न्यायालय एवं उच्च न्यायालयों द्वारा वार्षिक रिपोर्ट तैयार करना और उसे प्रकाशित करना शामिल है।