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Standing Committees Tenure: संसद की स्थायी समितियों का कार्यकाल दो साल करने पर विचार, सांसदों ने की थी मांग

Sat, 27 Sep 2025 04:05 PM IST
हिमांशु चंदेल न्यूज डेस्क, अमर उजाला, नई दिल्ली

सार

केंद्र सरकार संसद की स्थायी समितियों का कार्यकाल एक साल से बढ़ाकर दो साल करने पर विचार कर रही है। सांसदों का कहना है कि एक साल की अवधि में किसी विषय पर गहन अध्ययन और सार्थक काम संभव नहीं हो पाता। सरकार जल्द ही लोकसभा अध्यक्ष ओम बिरला और राज्यसभा सभापति सी. पी. राधाकृष्णन से चर्चा के बाद फैसला ले सकती है।
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लोकसभा। - फोटो : ANI
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विस्तार
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केंद्र सरकार संसद की स्थायी समितियों का कार्यकाल बढ़ाकर दो साल करने पर विचार कर रही है। वर्तमान में इन समितियों का कार्यकाल केवल एक साल का होता है। सांसदों ने सरकार से शिकायत की थी कि इतने कम समय में किसी विषय पर ठोस और सार्थक काम करना संभव नहीं है। सरकार इस पर जल्द ही लोकसभा अध्यक्ष ओम बिरला और राज्यसभा के सभापति सी. पी. राधाकृष्णन से चर्चा करने के बाद फैसला ले सकती है।
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जानकारी के मुताबिक, कुछ सांसदों का कहना है कि एक साल की अवधि में समितियां चुने गए विषयों पर पूरी तरह काम नहीं कर पातीं। ऐसे में कार्यकाल दो साल होने से वे गहराई से अध्ययन कर सिफारिशें दे सकेंगी। इस मांग के बाद सरकार ने गंभीरता से विचार शुरू किया है।

सितंबर-अक्तूबर में होती है नई शुरुआत
आमतौर पर स्थायी समितियों का नया कार्यकाल सितंबर के अंत या अक्तूबर की शुरुआत में तय होता है। इन्हें अक्सर ‘मिनी संसद’ भी कहा जाता है। समितियों का गठन हर साल होता है और इसमें विभिन्न दलों के सांसदों को उनकी ताकत के अनुपात में जगह मिलती है।
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अध्यक्षता और बदलाव की प्रक्रिया
किसी समिति का अध्यक्ष आमतौर पर लोकसभा के नए कार्यकाल के साथ ही तय कर दिया जाता है और वह सालभर पद पर बने रहते हैं। हालांकि अगर कोई राजनीतिक दल बदलाव चाहता है तो अध्यक्ष बदला जा सकता है। इसके अलावा सांसद भी अपनी इच्छा से किसी दूसरी समिति में शामिल होने का अनुरोध कर सकते हैं।

विभागीय समितियां और अलग-अलग जिम्मेदारियां
फिलहाल संसद में 24 विभागीय स्थायी समितियां हैं। इनमें से आठ की अध्यक्षता राज्यसभा के सदस्य करते हैं जबकि 16 समितियों का नेतृत्व लोकसभा सदस्य करते हैं। इनके अलावा संसद में वित्तीय समितियां, अस्थायी समितियां और कई अन्य समितियां भी बनती हैं जो विधेयकों और विभिन्न मुद्दों पर काम करती हैं।
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सरकार का मकसद और आगे का रास्ता
सरकार का मानना है कि कार्यकाल बढ़ने से समितियों की सिफारिशें ज्यादा प्रभावी होंगी और संसद में प्रस्तुत किए जाने वाले विधेयकों और नीतियों पर गहराई से विमर्श हो सकेगा। अब देखना होगा कि सरकार सांसदों की इस मांग को कब और कैसे अमल में लाती है।


 
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