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स्मृति शेष : ठहरना तो नहीं था बिरजू महाराज! गुरु के रूप में हमेशा साथ रहेंगे

अमर उजाला नेटवर्क, नई दिल्ली। Published by: योगेश साहू Updated Tue, 18 Jan 2022 07:57 AM IST

सार

उनके जन्म पर सबने कहा, गोपियों के बीच कान्हा आया। नाम रखा गया बृजमोहन नाथ मिश्र। फिर बृजमोहन नाथ मिश्र सबके लिए बिरजू हो गया। जब कथक की दुनिया से बिरजू का परिचय हुआ तो वंश की परंपरा को आगे बढ़ाने के लिए नाम के आगे महाराज जोड़ दिया गया। तब से बृजमोहन नाथ मिश्र गुम ही रहा...और बिरजू महाराज पांच साल के उस लड़के को ढूंढने में बेताब रहे। यह बेताबी तब और बढ़ जाती...जब फुर्सत होती थी।
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पंडित बिरजू महाराज। (फाइल फोटो) - फोटो : PTI

बिरजू महाराज जी हमारे पिता थे, लेकिन बचपन से हमने उनको गुरु की नजर से देखा। कथक का आज जो स्वरूप है, उसमें जो सुंदरता है, जो खूबियां भरी गई हैं, वो सब महाराज जी की देन हैं। हाथ की उंगलियां कहां हों, अंगूठा कहां हो, कलाश कहां घूमेगा, कलाश के साथ शरीर का अंग संचालन कैसे होगा वगैरह महाराज जी की अपनी पद्धति थी। हस्तक में पहले एक झपट थी, यानी जितने बोल, हाथ से उतने निकास। महाराज जी ने उसकी दिशाओं को बदला, उसमें खूबसूरती पैदा की। 

पिता जी के चाचा शंभू महाराज जी पॉवर यानी ताकत के साथ नाचते थे, लेकिन उनके ठीक विपरीत पिता जी के दूसरे चाचा लच्छू महाराज जी के नृत्य में बहुत नजाकत थी। हमारे दादा अच्छन महाराज जी के नृत्य में लयकारी और अंग संचालन वगैरह, यानी तीसरा अंग था। तीनों भाइयों के नृत्य को पिता जी ने बहुत बारीकी से देखा और फिर तीनों चीजों का मिश्रण करके चौथी चीज तैयार की, जिससे आज कथक का स्वरूप इतना सुंदर हो पाया।



एक कलाकार के भीतर जो संपूर्णता होनी चाहिए, वह महाराज जी में थी। श्रीकृष्ण हमारे आराध्य देव हैं। महाराज जी ने श्रीकृष्ण पर दादरा, ठुमरी, भजन, वंदना, कवित्त आदि अनगिनत रचनाएं लिखीं। मसलन, श्रीकृष्ण पर ‘वरण छवि श्याम सुंदर’ और शिवजी पर ‘अर्धांग भस्म भभूत सोहे’। मैं जब पढ़ता था, तब मेरा रुझान क्रिकेट की तरफ अधिक था। मैं क्रिकेटर बनना चाहता था। लेकिन एक दिन पिता जी मुस्कराकर एक बात बोले- ‘कब तक पैंट-शर्ट पहनोगे? जरा पाजामे-कुर्ते के बारे में भी सोचो।’ 

उनके उस इशारे, यानी खानदान की परंपरा को देखो, ने मुझे नर्तक बना दिया। महाराज जी अक्सर कहते थे कि समुद्र के तट पर खड़े होकर दूर तक देखो, तो समुद्र का छोर नजर आएगा, लेकिन वह छोर क्या छोर है? आप जब वहां तक जाते हैं, तो वह छोर और आगे बढ़ जाता है। इसी तरह कला में इतनी गहराई, इतना फैलाव है कि उसके अंदर डूबते जाओ, मगर उसका कहीं अंत नहीं है। महाराज जी जैसा नरम दिल इंसान और गुरु शायद ही कोई देखने को मिले। कोई गलत नृत्य भी करे, तो उसे डांटते भी समझाने के लहजे में थे। उनकी पदचाप हमेशा हमें सुनाई देती रहेगी। (बिरजू महाराज के पुत्र जयकिशन महाराज से रघुवीर सिंह की बातचीत पर आधारित)

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पंडित बिरजू महाराज। (फाइल फोटो) - फोटो : PTI
बिरजू महाराज जी हमारे पिता थे, लेकिन बचपन से हमने उनको गुरु की नजर से देखा। कथक का आज जो स्वरूप है, उसमें जो सुंदरता है, जो खूबियां भरी गई हैं, वो सब महाराज जी की देन हैं। हाथ की उंगलियां कहां हों, अंगूठा कहां हो, कलाश कहां घूमेगा, कलाश के साथ शरीर का अंग संचालन कैसे होगा वगैरह महाराज जी की अपनी पद्धति थी। हस्तक में पहले एक झपट थी, यानी जितने बोल, हाथ से उतने निकास। महाराज जी ने उसकी दिशाओं को बदला, उसमें खूबसूरती पैदा की। 

पिता जी के चाचा शंभू महाराज जी पॉवर यानी ताकत के साथ नाचते थे, लेकिन उनके ठीक विपरीत पिता जी के दूसरे चाचा लच्छू महाराज जी के नृत्य में बहुत नजाकत थी। हमारे दादा अच्छन महाराज जी के नृत्य में लयकारी और अंग संचालन वगैरह, यानी तीसरा अंग था। तीनों भाइयों के नृत्य को पिता जी ने बहुत बारीकी से देखा और फिर तीनों चीजों का मिश्रण करके चौथी चीज तैयार की, जिससे आज कथक का स्वरूप इतना सुंदर हो पाया।

एक कलाकार के भीतर जो संपूर्णता होनी चाहिए, वह महाराज जी में थी। श्रीकृष्ण हमारे आराध्य देव हैं। महाराज जी ने श्रीकृष्ण पर दादरा, ठुमरी, भजन, वंदना, कवित्त आदि अनगिनत रचनाएं लिखीं। मसलन, श्रीकृष्ण पर ‘वरण छवि श्याम सुंदर’ और शिवजी पर ‘अर्धांग भस्म भभूत सोहे’। मैं जब पढ़ता था, तब मेरा रुझान क्रिकेट की तरफ अधिक था। मैं क्रिकेटर बनना चाहता था। लेकिन एक दिन पिता जी मुस्कराकर एक बात बोले- ‘कब तक पैंट-शर्ट पहनोगे? जरा पाजामे-कुर्ते के बारे में भी सोचो।’ 

उनके उस इशारे, यानी खानदान की परंपरा को देखो, ने मुझे नर्तक बना दिया। महाराज जी अक्सर कहते थे कि समुद्र के तट पर खड़े होकर दूर तक देखो, तो समुद्र का छोर नजर आएगा, लेकिन वह छोर क्या छोर है? आप जब वहां तक जाते हैं, तो वह छोर और आगे बढ़ जाता है। इसी तरह कला में इतनी गहराई, इतना फैलाव है कि उसके अंदर डूबते जाओ, मगर उसका कहीं अंत नहीं है। महाराज जी जैसा नरम दिल इंसान और गुरु शायद ही कोई देखने को मिले। कोई गलत नृत्य भी करे, तो उसे डांटते भी समझाने के लहजे में थे। उनकी पदचाप हमेशा हमें सुनाई देती रहेगी। (बिरजू महाराज के पुत्र जयकिशन महाराज से रघुवीर सिंह की बातचीत पर आधारित)

पिता के रूप में रास्ते पर खड़े दिखे
जब मैं छोटा था, हम लोग श्रीराम भारतीय कला केंद्र में रहते थे। महाराज जी कथक केंद्र में नौकरी करते थे। महाराज जी की पूरी जिंदगी संघर्ष में गुजरी। जब वे नौ साल के थे, तब उनके सिर से पिता का साया उठ गया। उसके बाद जो गरीबी का दौर महाराज जी ने देखा और फिर वे जिस तेजी से अपने पैरों पर खड़े हुए, परिवार को संभाला, वह काबिले-तारीफ है। उन्होंने अपना बचपन खो दिया, क्योंकि बचपन में ही परिवार की जिम्मेदारी नाजुक कंधों पर आ गई थी। उनकी शादी हुई, हम पांच भाई-बहन हुए। हमें पाला-पढ़ाया, अच्छी शिक्षा दी।

जिस माहौल में हमारी परवरिश हुई, वह बहुत संगीतमय रहा। वे मेरे पिता थे, लेकिन मैं उन्हें पिता से ज्यादा अपना गुरु मानता था। हम उन्हें बाबू बोलते थे। पिता के रूप में जो उनकी भूमिका थी, उसे उन्होंने अपनी तमाम व्यस्तताओं के बावजूद पूरी तरह निभाया। बेशक उनका ज्यादातर समय अपने काम में ही गुजरता रहा हो, लेकिन जब भी परिवार या बच्चों को उनकी जरूरत महसूस हुई, वे उनके साथ होते थे। जब मैं खुद इस क्षेत्र में ज्यादा सक्रिय हुआ, तब जाकर और अच्छी तरह समझ आया कि सच में महाराज जी ऐसे व्यक्तित्व हैं कि वे बहुत ज्यादा पारिवारिक नहीं हो सकते। अगर हो जाते तो कथक के विकास में जो काम उन्होंने देश और दुनियाभर में किया, वह न कर पाते।

महाराज जी बहुत भावुक इंसान थे। बिना भावों के कलाकार बन भी नहीं सकता। भावों पर उन्होंने इतना ज्यादा शोध किया है कि राधा कैसे दिखेंगी, उनकी दृष्टि कैसे उठेगी, कृष्ण की बांसुरी किस प्रकार बजेगी, दोनों में किस प्रकार प्रेम-रास हुआ करता था। महाराज जी बहुत नाजुक दिल के थे। जब हमारी माता जी का देहांत हुआ, वह उनके जीवन का बहुत भावुक पल रहा, जो हमने देखा। महाराज जी की इच्छाशक्ति बहुत मजबूत थी। वे सबका ध्यान रखते थे। उनका कोई शार्गिद दूर भी रहता हो, तो उससे फोन पर हाल-चाल पूछते रहते थे।

मुझे कई बार महाराज जी के साथ मंच पर प्रस्तुति देने का सौभाग्य मिला। जो रूप मैंने महाराज जी का स्टेज पर देखा, उसको मैंने अपने काम में ज्यादा ग्रहण किया, क्योंकि उस समय उनका रूप ही कुछ अलग होता था। महाराज जी अपने सभी शिष्यों को यही कहते थे कि अपने कर्म से खुद को साबित करो। मैं तुम सबके पीछे खड़ा हूं। महाराज जी एक बहुत ही साधारण इंसान और एक बहुत ही कामयाब कलाकार रहे, जिन्होंने पूरा जीवन अपनी कला को समर्पित किया। 

उनके अंदर केवल एक ही धुन चलती रहती थी और वह धुन थी छंदों की, लय की, भावों की, ताल की। कुछ न कुछ नई बातों की। महाराज जी हमेशा एक बात समझाते थे कि बोलो उतना, जितनी जरूरत हो। देखो भी उतना, जितनी जरूरत। सुनो भी उतना, जितना सुन सकते हो। इसलिए बाकी चीजों से खुद को दूर रखो, अपनी शक्ति को पैदा करो और उसे तब इस्तेमाल करो, जब मंच पर जाना हो। 

वे कहते थे कि किसी बात को लेकर कभी भ्रमित मत रहना। जहां भ्रम हो, उसे तुरंत दूर करो। कलाकार के चेहरे पर कभी शिकन नहीं होनी चाहिए। उसे कभी दुविधा में नहीं फंसे रहना चाहिए, क्योंकि जो होना है, वह तो होकर रहेगा। (बिरजू महाराज के पुत्र दीपक महाराज से रेणु खंतवाल की बातचीत पर आधारित)

जीवन-यात्रा
  • पंडित बृजमोहन नाथ मिश्र (बिरजू महाराज)
  • जन्म : 4 फरवरी 1938, लखनऊ
  • मृत्यु : 17 जनवरी 2022, नई दिल्ली
  • पिता : अच्छन महाराज (जगन्नाथ महाराज)
  • घराना : कालका-बिंदादीन घराना, लखनऊ
उपलब्धियां
  • 6 साल की उम्र में पहली प्रस्तुति।
  • 13 वर्ष की आयु में नई दिल्ली स्थित 'संगीत भारती' में डांस टीचर।
  • 1998 तक कथक केंद्र के डायरेक्टर।
  • दिल्ली में 'कलाश्रम' की स्थापना।
पुरस्कार
  • 1964 : संगीत नाटक अकादमी पुरस्कार
  • 1986 : पद्म विभूषण
  • 1987 : कालिदास सम्मान
  • इंदिरा कला संगीत विश्वविद्यालय से मानद डॉक्टरेट
  • बनारस हिंदू विश्वविद्यालय से मानद डॉक्टरेट
  • सोवियत भूमि नेहरू पुरस्कार
  • राष्ट्रीय नृत्य शिरोमणि पुरस्कार
  • 2012 : विश्वरूपम (उन्नाई कानाथु) के लिए सर्वश्रेष्ठ कोरियोग्राफी का राष्ट्रीय फिल्म पुरस्कार
  • 2016 : मोहे रंग दो लाल (बाजीराव मस्तानी) के लिए सर्वश्रेष्ठ कोरियोग्राफी का फिल्मफेयर पुरस्कार
  • नवीन प्रयोग : बिंदादीन घराने में कथक की नई पद्धति का ईजाद।

एक युग का अंत
पंडित बिरजू महाराज का निधन एक युग का अंत है। उनके जाने से भारतीय संगीत और सांस्कृतिक जगत में एक गहरा खालीपन आ गया है। कथक को पूरी दुनिया में लोकप्रिय बनाने में उन्होंने अतुल्य योगदान दिया और इसके कारण वह एक आइकन बन गए थे। मेरी संवेदनाएं उनके परिवार और प्रशंसकों के साथ हैं। -रामनाथ कोविंद, राष्ट्रपति

कला जगत को भारी क्षति
भारतीय नृत्य कला को विश्वभर में विशेष पहचान दिलाने वाले पंडित बिरजू महाराज जी के निधन से अत्यंत दुख हुआ है। उनका जाना संपूर्ण कला जगत के लिए अपूरणीय क्षति है। मेरी संवदेनाएं उनके परिजनों और प्रशंसकों के साथ हैं। -नरेंद्र मोदी, प्रधानमंत्री

दोस्त भी, गुरु भी
वह मेरे गुरु थे, लेकिन दोस्त भी थे। उन्होंने मुझे नृत्य और अभिनय की बारीकियां सिखाईं। वे अपनी मजेदार कहानियों से हंसाने का कोई मौका नहीं चूकते थे। वे अपने पीछे शोकाकुल प्रशंसक और शिष्य छोड़ गए हैं। लेकिन साथ ही ऐसी विरासत भी छोड़ी है, जिसे हम सबको आगे ले जाना है। मुझे नम्रता, सौम्यता और लालित्य के साथ नृत्य सिखाने के लिए धन्यवाद महाराज जी। -माधुरी दीक्षित नेने, अभिनेत्री
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