बिरजू महाराज जी हमारे पिता थे, लेकिन बचपन से हमने उनको गुरु की नजर से देखा। कथक का आज जो स्वरूप है, उसमें जो सुंदरता है, जो खूबियां भरी गई हैं, वो सब महाराज जी की देन हैं। हाथ की उंगलियां कहां हों, अंगूठा कहां हो, कलाश कहां घूमेगा, कलाश के साथ शरीर का अंग संचालन कैसे होगा वगैरह महाराज जी की अपनी पद्धति थी। हस्तक में पहले एक झपट थी, यानी जितने बोल, हाथ से उतने निकास। महाराज जी ने उसकी दिशाओं को बदला, उसमें खूबसूरती पैदा की।
पिता जी के चाचा शंभू महाराज जी पॉवर यानी ताकत के साथ नाचते थे, लेकिन उनके ठीक विपरीत पिता जी के दूसरे चाचा लच्छू महाराज जी के नृत्य में बहुत नजाकत थी। हमारे दादा अच्छन महाराज जी के नृत्य में लयकारी और अंग संचालन वगैरह, यानी तीसरा अंग था। तीनों भाइयों के नृत्य को पिता जी ने बहुत बारीकी से देखा और फिर तीनों चीजों का मिश्रण करके चौथी चीज तैयार की, जिससे आज कथक का स्वरूप इतना सुंदर हो पाया।