अगर 91 साल की उम्र में किसी बुजुर्ग की आखिरी इच्छा पूरी हो जाए तो वाकई उसे कितना संतोष मिलेगा। ऐसा ही एक मामला मेरठ में सामने आया है, जहां रहने वाले कृष्णा खन्ना की जैसे मन की मुराद ही पूरी हो गई हो। मामला पाकिस्तान से जुड़ा हुआ है, जहां कृष्णा खन्ना के बचपन की यादें जुड़ी हुई थी।
पूरी कहानी आजादी के पहले की है जब 1930 में कृष्णा खन्ना पाकिस्तान स्थित उढोक में अपने भाईयों के साथ बचपन के दिन गुजार रहे थे। यहीं पर उन्होंने अपने दादा के साथ रहकर अपना बचपन बिताया, खेले-कूदे। हालांकि आजादी के समय यानी 1947 का दौर याद करते हुए कृष्णा खन्ना कहते हैं कि वह समय उनकी जिंदगी का सबसे कठिन दौर था, जिसे वह भूलना चाहते हैं। उस समय हुए दंगों में उन्हें उढ़ोक में अपना घर छोड़कर शेखपुरा आना पड़ा। जहां उन्होंने एक गुरुद्वारे में शरण लेकर अपनी जान बचाई। इस समय भी हमलावर गुरुद्वारे को घेरे हुए थे लेकिन सेना की टीम ने पहुंचकर किसी तरह से उन्हें और गुरुद्वारे में रुके हुए दूसरे लोगों को सुरक्षित जगह पर ले गए।
उस दौर को याद करके कृष्णा खन्ना बेहद भावुक हो जाते हैं। उन्होंने कहा कि इस घटना में दोनों देशों को भारी नुकसान उठाना पड़ा। हालांकि अब मैं एक बार फिर से अपनी यादों को संजोना चाहता हूं। मैं एक बार फिर से उस जमीन को देखना चाहता हूं जहां मैंने अपना बचपन बिताया है।