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पहले तो ग्रामीणों ने की आवभगत फिर दे दी बलि, आज भी जारी है कुप्रथा

Tue, 19 Jul 2016 03:31 AM IST
ब्यूरो/ अमर उजाला, मैनपुरी
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सदियों से चली आ रही है बलि की प्रथा - फोटो : Reuters
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देवी-देवताओं के प्रसन्न करने के नाम पर निरीह जानवरों की बलि देने की कुप्रथा के खिलाफ देशभर में आवाज उठ रही है। उत्तराखंड, हिमाचल प्रदेश और नेपाल के कई मंदिरों में इसे बंद भी कर दिया गया है, लेकिन यूपी के मैनपुरी जिले के गांव जरा नगला पचैना में सोमवार देरशाम को पशु बलि दे दी गई।
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मुख्यालय से 25 किलोमीटर दूर स्थित गांव जरा नगला पचैना में यह कुप्रथा सालों से जारी है। अंधविश्वास के मारे ग्रामीणों को लगता है कि यदि इसे बंद किया गया तो गांव में अनिष्ट हो जाएगा। हर साल की तरह इस बार भी आषाढ़ी पूर्णमासी पर पशु बलि देने की तैयारी कई दिनों से चल रही थी।
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भेंड़ - फोटो : Getty
ग्रामीण हर वर्ष आषाढ़ी पूर्णमासी के दो दिन पहले पूरे गांव से चंदा जुटाकर भेड़ खरीदते हैं। इस बार भी एक भेड़ खरीदी गई। उसे महिलाएं कई दिनों से घास, दाना, रोटी खिला रही थीं। आषाढ़ी पूर्णिमा मंगलवार को थी, लेकिन एक दिन पहले ही ग्रामीणों ने पशु बलि दे दी। बैंडबाजे के साथ उसे गमा देवी मठ में ले जाया गया और हवन पूजन के बाद उसकी बलि दे दी गई। इस दौरान घरों में पकवान बनाए गए हैं। 

गांवों में आषाढ़ी पूर्णिमा पर हवन करने के बाद देवी का खप्पर निकालने की प्रथा है। उनकी मान्यता है कि ऐसा करने से गांव में संक्रामक रोग नहीं फैलेंगे। लेकिन किसी भी बेजुबान पशु की बलि देना उचित नहीं है। गांव के लोगों को भी यह प्रथा छोड़कर हवन के बाद देवी का खप्पर निकाला जाना चाहिए। 
-डाक्टर गयाप्रसाद दुबे, प्रधानाचार्य, एकरसानंद संस्कृत विद्यालय
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