सुप्रीम कोर्ट ने गुरुवार को केंद्र सरकार को एक और हफ्ते का समय दिया। यह समय हाई कोर्ट के पूर्व जजों के लिए रिटायरमेंट के बाद मिलने वाली सुविधाओं के बारे में एक समान राष्ट्रीय नीति बनाने के लिए एक पैनल गठित करने के लिए दिया गया है।
बेंच ने क्या कहा?
भारत के मुख्य न्यायाधीश सूर्य कांत और जस्टिस जॉयमाल्य बागची और वी. मोहना की बेंच ने सुनवाई की। बेंच ने कहा, 'एडिशनल सॉलिसिटर जनरल ने कमेटी बनाने के लिए एक हफ्ते का समय मांगा है। इसके साथ ही, बेंच ने कहा कि अब इस मामले को 10 दिन बाद लिस्ट किया जाएगा। सुनवाई के दौरान, जब बेंच को बताया गया कि केंद्र ने अभी तक पैनल नहीं बनाया है, तो बेंच ने कहा कि अगर ऐसा नहीं किया गया, तो कोर्ट खुद कमेटी बना देगा।
इससे पहले 20 जुलाई को, बेंच ने केंद्र सरकार से कहा था कि वह दो हफ्ते के अंदर एक पैनल बनाए। यह पैनल हाई कोर्ट के रिटायर्ड जजों के लिए रिटायरमेंट के बाद मिलने वाली सुविधाओं जैसे ड्राइवर, सुरक्षा और यात्रा के दौरान सरकारी आवास में रहने की व्यवस्था के बारे में एक समान राष्ट्रीय नीति बनाने के लिए होगा।
बेंच ने क्या निर्देश दिए थे?
बेंच ने यह भी निर्देश दिया था कि पैनल को इस मुद्दे पर अपनी रिपोर्ट तीन महीने के भीतर देनी होगी। बेंच, सुप्रीम कोर्ट और हाई कोर्ट के रिटायर्ड जजों के एसोसिएशन के प्रेसिडेंट जस्टिस वी.एस. दवे की ओर से दायर अवमानना याचिकापर सुनवाई कर रही थी। इस याचिका में रिटायर्ड जजों के लिए सुरक्षा और अन्य सुविधाओं का मुद्दा उठाया गया था।
सीजेआई ने क्या सवाल पूछा?
सुनवाई के दौरान, सीजेआई ने सुरक्षा कर्मियों और ड्राइवरों को रखने के लिए कुछ राज्यों की ओर से दी जा रही मौजूदा आर्थिक मदद की पर्याप्तता पर सवाल उठाया। सीजेआई ने पूछा, 'क्या 45,000-50,000 रुपये में ड्राइवर और सुरक्षा अधिकारी मिल सकते हैं?'
सीजेआई ने सॉलिसिटर जनरल से कहा, 'राज्यों के बीच एकरूपता की कमी है। एक तरीका यह है कि भारत सरकार एक कमेटी बनाए और नियम तय करे। केंद्र सरकार ग्रांट (अनुदान) भी दे सकती है। अगर आप ऐसा नहीं करते हैं, तो मुझे एक कमेटी बनानी होगी।' लॉ ऑफिसर ने कहा कि सरकार को ऐसी कमेटी बनाने में कोई दिक्कत नहीं है।
बेंच ने अपने आदेश में कहा कि ये कार्यवाही हाई कोर्ट के रिटायर हो चुके चीफ जस्टिस और जजों को रिटायरमेंट के बाद मिलने वाले अलग-अलग फायदों और सुविधाओं से जुड़ी है। आदेश में कहा गया है कि घरेलू मदद, ड्राइवर, टेलीफोन सुविधा, मेडिकल रीइंबर्समेंट और सरकारी आवास अपने पास रखने जैसी बुनियादी सुविधाएं एक राज्य से दूसरे राज्य में काफी अलग-अलग होती हैं।