प्रमुख विपक्षी दलों के एकजुट होने पर कांग्रेस ने पटना में शिरकत तो की है लेकिन वावजूद इसके कांग्रेस के लिए एक बड़ा "प्लान बी" भी तैयार है। हालांकि यह "प्लान बी" कांग्रेस के लिए कुछ अलग अलग राजनीतिक दलों ने बनाया है। जानकारों का मानना है कि पटना की बैठक के बाद अगर सब कुछ एक राह पर आगे बढ़ता हुआ दिखे या न दिखे लेकिन कांग्रेस के प्लान बी को आगे बढ़ाकर नई राहें तैयार करके रखी जाएंगी।सियासी जानकारों का मानना है कि विपक्षी दलों की एकता लोकसभा चुनावों से पहले होने वाले विधानसभा के चुनावों में अगर बेपटरी हुई तो कांग्रेस के "प्लान बी" को एक्टिव होने में जरा भी देरी नहीं लगेगी। जिसमें एक की अगुवाई कांग्रेस के नेताओं की लीडरशिप में हो सकती है। दूसरे धड़े में कुछ अन्य प्रमुख दल भी शामिल हो सकते हैं।
बैठक सफल हो या असफल कांग्रेस के लिए यह है प्लान बी
दरअसल विपक्षी दलों की एकजुटता में कांग्रेस को लेकर सबसे ज्यादा चर्चा होती रही है क्या कांग्रेस शामिल होगी या नहीं। अब जब कांग्रेस विपक्ष को एकजुट करने के लिए एक फोरम पर आ गई है तो यह सवाल उठ रहा है कि कांग्रेस का प्लान बी भी कुछ है। सियासी जानकारों का कहना है कि कांग्रेस के लिए प्लान बी की तैयारी कांग्रेस ने नहीं बल्कि उन राजनीतिक दलों ने की है जो कि आज की बैठक में शामिल नहीं हुए हैं। राजनीतिक जानकार कहते हैं कि इनमें कांग्रेस के लिए प्लान बनाने वालों में केसीआर और अकाली दल शामिल नहीं है। सियासी गलियारों में जो चर्चाएं चल रही हैं वह यही है कि कांग्रेस के लिए प्लान बी में बहुजन समाज पार्टी और राष्ट्रीय लोक दल की बड़ी भूमिका हो सकती है। यह दोनों पार्टियां उत्तर प्रदेश तक ही सीमित है लेकिन इनके बनाए गए प्लान में फिर अन्य दूसरे दल भी नई सियासी रणनीति के मुताबिक शामिल हो सकेंगे।
बसपा के इशारे यही बता रहे कि कांग्रेस के प्रति रवैया सॉफ्ट
सियासी जानकार जटाशंकर सिंह कहते हैं कि बहुजन समाज पार्टी के नेताओं की बैठकों में इस बात के इशारे भी देखने को मिल रहे हैं। अमूमन मायावती की बैठकों में कांग्रेस हमेशा निशाने पर हुआ करती थी। लेकिन बीती कुछ बैठकों में कांग्रेस के प्रति जिस तरीके से बहुजन समाज पार्टी ने अपना लचीला रवैया अपनाया है वह बहुत कुछ सियासी संकेत दे रहा है। इसी तरह अचानक राष्ट्रीय लोकदल ने भी इस बैठक में न जाकर सियासी गलियारों में हलचल तो पैदा ही कर दी है। सूत्रों का कहना है कि अंदरूनी तौर पर राष्ट्रीय लोक दल और समाजवादी पार्टी के नेताओं के बीच में सब कुछ सामान्य जैसा चलता हुआ नहीं दिख रहा है। अगर जरूरत पड़ती है तो बड़े विकल्प की तलाश में राष्ट्रीय लोक दल सीधे तौर पर कांग्रेस से ही संपर्क कर सकता है। जटाशंकर सिंह कहते हैं कि अगर इस तरीके की सियासी परिस्थितियां बनती हैं तो 2024 के लोकसभा चुनावों में गठबंधन की सियासी कहानी कुछ और हो सकती है।
कई सियासी दलों में अभी भी बना हुआ है गतिरोध
सियासी जानकारों का कहना है कि इस पूरे गठबंधन में महत्वपूर्ण भूमिका नीतीश कुमार निभा रहे। नितीश कुमार की ह ख्वाहिश रही है कि कांग्रेस उनके साथ मिलकर विपक्षी धड़े को मजबूत करें और भारतीय जनता पार्टी के विरोध में एकजुट होकर चुनाव लड़े। लेकिन इस सियासी बैठक से पहले कांग्रेस को लेकर आम आदमी पार्टी तृणमूल कांग्रेस में गतिरोध बना हुआ था। राजनीतिक जानकार अनुज माथुर कहते हैं कि इसी वजह से विपक्षी दलों के प्रमुख नेताओं की बैठकों में न सिर्फ देरी हो रही थी बल्कि एजेंडा तय करने में भी दिक्कत आ रही थी। उनका मानना है कि किसी भी मुद्दे पर कांग्रेस और इन नेताओं के बीच में मनमुटाव बना रहा तो गठबंधन की राह में दिक्कत अभी भले ना आए लेकिन आगे दिख सकती है। उनका मानना है कि ऐसी दशा में कांग्रेस अपने उन सभी विकल्पों को जरूर खुला रखना चाहेगी जिससे कि उसका प्लान बी एक्टिवेट हो सके। इसीलिए देश के अलग अलग राज्यों की कुछ ऐसी स्थानीय पार्टियां कांग्रेस को लेकर लचीला रवैया अपना रही हैं। ताकि आगे के सियासी गठबंधन की राहें भी खुली रहें। राजनीतिक जानकार बताते हैं कि अगर ऐसा होता है तो और भी कई सियासी दल पाला बदल कर गठबंधन के नए विकल्पों में जा सकेंगे।
गठबंधन की एकजुटता लोकसभा से पहले विधानसभा में दिखना जरूरी
राजनीति जानकारों का मानना है कि पटना में चल रही विपक्षी दलों की एकजुटता लोकसभा चुनाव से पहले विधानसभा के चुनावों में देखना बेहद जरूरी है। राजनीतिक विश्लेषक और वरिष्ठ पत्रकार अनुज माथुर कहते हैं कि लोकसभा चुनावों से पहले कई राज्यों में विधानसभा चुनाव होने हैं। इन राज्यों में कई सियासी दल ऐसे हैं जो कि कांग्रेस के विरोध में मजबूती से चुनाव लड़ते हैं। अब अगर वह यहां पर विपक्षी दलों की एकजुटता का धर्म निभाएंगे तो उनके लिए सियासी संकट खड़ा हो सकता है। ऐसे में सियासी गलियारों में चर्चाएं इसी बात की सबसे ज्यादा हो रही है कि विपक्षी दलों की एकजुटता लोकसभा चुनावों से पहले विधानसभा के चुनावों में मजबूती के साथ सियासी पटल पर सामने रखी जाए। ताकि पब्लिक में इस मजबूती का एक बड़ा संदेश पहुंच सके और 2024 में विपक्षी दलों की एकता और मजबूत हो सके।
अपने एजेंडों को साधा तो मुश्किल होगी राह
पटना में प्रमुख विपक्षी दलों की बैठक को लेकर सियासत और राजनैतिक गलियारों में लगातार तपिश बनी हुई। ज्यादातर प्रमुख राजनीतिक दलों के बड़े नेताओं ने इस बैठक में शिरकत की है। राजनीतिक विश्लेषक शैलेश चंद्र कहते हैं कि बैठक का मुख्य एजेंडा 2024 में होने वाले लोकसभा चुनाव में भारतीय जनता पार्टी को घेरने को लेकर बना हुआ है। शैलेश कहते हैं कि निश्चित तौर पर आज की बैठक सभी विपक्षी दलों के नेताओं की ओर से फिलहाल तो सकारात्मक ही नजर आ रही है। लेकिन वह कहते हैं कि किसी भी राजनीतिक दल की ओर से अगर अपने निजी एजेंडे को आगे बढ़ाने की कोशिश हुई तो इस गठबंधन की गांठे खुलने में ज्यादा वक्त नहीं लगेगा। ऐसी दशा में कांग्रेस के बी प्लान को एक्टिवेट होने में भी देरी नहीं होगी।