कांग्रेस पार्टी के रणदीप सुरजेवाला, महासचिव(संगठन) केसी वेणुगोपाल, खुद पूर्व अध्यक्ष राहुल गांधी का कहना है कि संकट की घड़ी में दलगत भावना से ऊपर उठकर विपक्ष सरकार को रचनात्मक सहयोग, सुझाव देता रहा है। कांग्रेस की नीति यही है।
कोविड-19 के संक्रमण के मामले में चाहे सरकार सुझाव माने या न माने, पार्टी इस पर कायम रहेगी। लेकिन दूसरी तरफ, कांग्रेस के नेताओं को केंद्र सरकार के कामकाज, प्रधानमंत्री के लगातार चर्चा में बने रहने के प्रयासों और भाजपा की सक्रियता ने परेशान करना शुरू कर दिया है।
बताते हैं, जब प्रधानमंत्री लोगों से कोविड-19 के बाबत ताली, थाली, शंख बजवा रहे थे या फिर दीया जलवा रहे थे तो सबसे ज्यादा छटपटाहट कांग्रेस के नेताओं में ही थी।
कांग्रेस शासित राज्यों के मुख्यमंत्रियों ने कांग्रेस कार्यसमिति की बैठक में केंद्र सरकार के साथ संवाद की जानकारी दी। अपनी समस्या भी बताई। प्रधानमंत्री से पिछली दोनों बैठक के बाद मुख्यमंत्रियों ने पार्टी के शीर्ष नेताओं से सबकुछ साझा किया था, लेकिन इसके बाद भी पार्टी अभी अपना रुख तय कर पाने में कसमसा रही है।
पार्टी के एक बड़े धड़े का मत है कि केंद्र सरकार की खामियों, कमियों पर अब खुलकर बोलना चाहिए। एक ऐसा भी धड़ा है, जो अभी भी सरकार को सुझाव देने के बहाने ही पार्टी की राय रखने के पक्ष में है। गुलाम नबी आजाद समेत तमाम नेता इसी राय के हैं।
संभल कर विरोध जता रहे हैं दल
पश्चिम बंगाल की मुख्यमंत्री ममता बनर्जी अपने आक्रामक अंदाज के लिए जानी जाती हैं। ममता बनर्जी भी इस समय केंद्र सरकार और भाजपा पर खुलकर हमले करने को लेकर सावधानी से आगे बढ़ रही हैं। इसके लिए वह केवल राज्यपाल जगदीप धनखड़ के ही खिलाफ बोल रही हैं। उन्होंने प्रधानंमत्री के साथ पिछली बैठक में भी राज्यपाल के राजनीतिक भावना के साथ काम करने की शिकायत की थी।
आम आदमी पार्टी की राजनीतिक लाइन भी चर्चा का विषय बनी है। कोविड-19 को लेकर केंद्र द्वारा सहायता को निशाना बनाते हुए उप मुख्यमंत्री मनीष सिसोदिया ने निशाना साधा। उसी दिन शाम को मुख्यमंत्री अरविंद केजरीवाल ने टकराव से बचते हुए केंद्र सरकार से सहयोग मिलने का बयान दे दिया।
दरअसल अरविंद केजरीवाल जानते हैं कि देश में स्वास्थ्य आपातकाल चल रहा है। ऐसे में केंद्र और राज्य के बीच में इस तरह का व्यवहार ठीक नहीं है। यही हाल समाजवादी पार्टी, बसपा, राजद, वाम दलों का भी है। एनसीपी भी चुप है।
प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी भी किसी को कोई अवसर नहीं दे रहे हैं। वह लगातार विश्व के राष्ट्राध्यक्षों से संवाद करने, कोविड-19 का संक्रमण रोकने में सहयोग करने, मदद लेने की कोशिश कर रहे हैं।
केंद्र सरकार के सचिवों, उच्च स्तरीय समितियों से चर्चा करने, मंत्रियों के समूह की रिपोर्ट लेने, दुनिया भर में फैले भारतीय दूतावासों, मिशनों से संवाद करते रहने के साथ राज्यों के मुख्यमंत्रियों से एक निश्चित अंतराल पर चर्चा करके राय लेते हैं।
वह संसद में राजनीतिक दलों के नेताओं की राय लेने, कांग्रेस अध्यक्ष सोनिया गांधी, पूर्व प्रधानमंत्री मनमोहन सिंह, एचडी देवगौड़ा से कोविड-19 संक्रमण रोकने में सहयोग मांगने में नहीं चूके, सांसदों के वेतन में कटौती, सांसद निधि को कोविड-19 के मद में दो साल के लिए डायवर्ट करने पर सहयोग मांगने के लिए आगे आए।
प्रधानमंत्री यहीं नहीं रुके। वह देश के खेल जगत, बालीवुड, अन्य कलाकारों, प्रोफेशनलों के भी संपर्क में हैं। वह देश की जनता के साथ दु:ख दर्द साझा करते हुए जुड़ते हैं और देश की पंचायतों से भी संवाद कर रहे हैं। कुल मिलाकर प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी, उनकी छवि और प्रधानमंत्री की राजनीतिक प्रक्रिया शीर्ष पर बनी है।
भाजपा और उसके सहयोगी दलों को छोड़कर अधिकतर राजनीतिक दलों को अपनी गुमनामी-सी दशा खल रही है। कांग्रेस समेत अन्य को लग रहा है कि देश में कोविड-19 का संक्रमण रोकने की खास पहल नहीं हो पा रही है।
फिर भी केंद्र सरकार ने लॉकडाऊन की रणनीति को आगे करके सबको शांत कर रखा है। केंद्र सरकार ने राज्यों की इच्छा के अनुरुप जीएसटी का बकाया देने, आर्थिक सहायता, स्टीमुलस राहत पैकेज की घोषणा भी नहीं की।
कांग्रेस अध्यक्ष के सुझाव पर कोई गंभीरता नहीं दिखी। इसके सामनांतर कोविड-19 के संक्रमण और अर्थव्यवस्था कमजोर होने का खतरा बढ़ रहा है। इसको लेकर कांग्रेस में छटपटाहट है।
बृहस्पतिवार को पार्टी की कार्यसमिति की बैठक में अंतरिम अध्यक्ष सोनिया गांधी का वक्तव्य इसी तरह का संदेश दे रहा है। कांग्रेस के पूर्व अध्यक्ष राहुल गांधी अब धीरे-धीरे ट्वीट करके, मुद्दे उठाकर पार्टी की उपस्थिति दर्ज करा रहे हैं। माना जा रहा है कि सोमवार को इसका असर राज्यों के मुख्यमंत्रियों के साथ प्रधानमंत्री की वीडियो कांफ्रेसिंग में दिखाई दे सकता है।