भिंडरावाले को कांग्रेसियों ने ही बढ़ावा दिया। उनको बढ़ावा देने के पीछे मकसद ये था कि अकालियों के सामने सिखों की मांग उठाने वाले किसी ऐसे शख्स को खड़ा किया जाए जो उनको मिलने वाले समर्थन में सेंध लगा सके। भिंडरावाले विवादास्पद मुद्दों पर भड़काऊ भाषण देने लगे और धीरे-धीरे उन्होंने केंद्र सरकार को भी निशाना बनाना शुरू कर दिया। पंजाब में हिंसा की घटनाएं बढ़ने लगीं। साल 1982 में भिंडरावाले चौक गुरुद्वारा छोड़ पहले स्वर्ण मंदिर में गुरु नानक निवास और उसके कुछ महीनों बाद अकाल तख्त से अपने विचार व्यक्त करने लगे।
खेतों के उस पार पाकिस्तान है
वरिष्ठ पत्रकार और बीबीसी के लिए काम कर चुके पत्रकार सतीश जैकब को भी कई बार भिंडरावाले से मिलने का मौका मिला। जैकब कहते हैं, "मैं जब भी वहां जाता था, भिंडरावाले के रक्षक दूर से कहते थे आओजी आओजी बीबीजी आ गए। कभी उन्होंने बीबीसी नहीं कहा। कहते थे तुसी अंदर जाओ।" "संत जी आपका इंतजार कर रहे हैं। वो मुझसे बहुत आराम से मिलते थे।
मुझे अब भी याद है जब मैंने मार्क टली को उनसे मिलवाया तो उन्होंने उनसे पूछा कि तुम्हारा क्या धर्म है तो उन्होंने कहा कि मैं ईसाई हूं।" "इस पर भिंडरावाले बोले तो आप जीजस क्राइस्ट को मानते हैं। मार्क ने कहा, 'हां'। इस पर भिंडरावाले बोले लेकिन जीजस क्राइस्ट की तो दाढ़ी थी। तुम्हारी दाढ़ी क्यों नही है।" "मार्क बोले, 'ऐसा ही ठीक है'। इस पर भिंडरावाले का कहना था तुम्हें पता है कि बिना दाढ़ी के तुम लड़की जैसे लगते हो। मार्क ने ये बात हंस कर टाल दी।"
भारत-पाकिस्तान सीमा
वे कहते हैं, "भिंडरावाले से एक बार मेरी अकेले में लंबी चौड़ी बात हुई। हम दोनों स्वर्ण मंदिर की छत पर बैठे हुए थे, जहां कोई नहीं जाता था। बंदर ही बंदर घूम रहे थे।" "मैंने बातों ही बातों में उनसे पूछा कि जो कुछ आप कर रहे हैं आपको लगता है कि आप के खिलाफ कुछ एक्शन होगा। उन्होंने कहा क्या खाक एक्शन होगा।" "उन्होंने मुझे छत से इशारा करके दिखाया कि सामने खेत हैं। सात आठ किलोमीटर के बाद भारत-पाकिस्तान सीमा है।"
"हम पीछे से निकल कर सीमा पार चले जाएंगे और वहां से छापामार युद्ध करेंगे। मुझे ये हैरानी थी कि ये शख्स मुझे ये सब कुछ बता रहा है और मुझ पर विश्वास कर रहा है।" "उसने मुझसे ये भी नहीं कहा कि तुम इसे छापोगे नहीं।" 4 जून 1984 को भिंडरावाले के लोगों की पोजीशन का जायजा लेने के लिए एक अधिकारी को सादे कपड़ों में स्वर्ण मंदिर के अंदर भेजा गया। 5 जून की सुबह जनरल बराड़ ने ऑपरेशन में भाग लेने वाले सैनिकों को उनके ऑपरेशन के बारे में ब्रीफ किया।
जनरल बराड़ ने बीबीसी को बताया, "पांच तारीख की सुबह साढ़े चार बजे मैं हर बटालियन के पास गया और उनके जवानों से करीब आधे घंटे बात की।" "मैंने उनसे कहा कि स्वर्ण मंदिर के अंदर जाते हुए हमें ये नहीं सोचना है कि हम किसी पवित्र जगह पर जा कर उसे बर्बाद करने जा रहे हैं, बल्कि हमें ये सोचना चाहिए कि हम उसकी सफाई करने जा रहे हैं। जितनी कैजुएलटी कम हो उतना अच्छा है।"
"मैंने उनसे ये भी कहा कि अगर आप में से कोई अंदर नहीं जाना चाहता तो कोई बात नहीं। मैं आपके कमाडिंग ऑफिसर से कहूंगा कि आपको अंदर जाने की जरूरत नहीं है और आपके खिलाफ कोई एक्शन नहीं लिया जाएगा।" "मैं तीन बटालियंस में गया। कोई नहीं खड़ा हुआ। चौथी बटालियन में एक सिख ऑफिसर खड़ा हो गया। मैंने कहा कोई बात नहीं अगर आपकी फीलिंग्स इतनी स्ट्रांग है तो आपको अंदर जाने की जरूरत नहीं।"
"उसने कहा आप मुझे गलत समझ रहे हैं। मैं हूं सेकेंड लेफ्टिनेंट रैना। मैं अंदर जाना चाहता हूं और सबसे आगे जाना चाहता हूं। ताकि मैं अकाल तख्त में सबसे पहले पहुंच कर भिंडरावाले को पकड़ सकूं।" मेजर जनरल कुलदीप बराड़ बताते हैं कि उन्हें अंदाजा नहीं था कि अलगाववादियों के पास रॉकेट लॉन्चर थे। बराड़ ने बताया, "मैंने उनके कमांडिंग ऑफिसर से कहा कि इनकी प्लाटून सबसे पहले सबसे आगे अंदर जाएगी।
उनकी प्लाटून सबसे पहले अंदर गई, लेकिन उनको मशीन गन के इतने फायर लगे कि उनकी दोनों टांगें टूट गईं। खून बह रहा था। उनका कमांडिंग ऑफिसर कह रहा था कि मैं इन्हें रोकने की कोशिश कर रहा हूं लेकिन वो रुक नहीं रहे हैं। वो अकाल तख्त की तरफ रेंगते हुए बढ़ रहे हैं। मैंने आदेश दिया कि उन्हें जबरदस्ती उठा कर एंबुलेंस में लादा जाए। बाद में उनके दोनों पैर काटे गए। उनकी बहादुरी के लिए बाद में मैंने उन्हें अशोक चक्र दिलवाया।"
पैराशूट रेजिमेंट
ऑपरेशन का नेतृत्व कर रहे जनरल सुंदरजी, जनरल दयाल और जनरल बराड़ की रणनीति थी कि इस पूरी मुहिम को रात के अंधेरे में अंजाम दिया जाए। दस बजे के आसपास सामने से हमला बोला गया। काली वर्दी पहने पहली बटालियन और पैराशूट रेजिमेंट के कमांडोज को निर्देश दिया गया कि वो परिक्रमा की तरफ बढ़ें, दाहिने मुड़ें और जितनी जल्दी संभव हो अकाल तख्त की ओर कदम बढ़ाएं। लेकिन जैसे ही कमांडो आगे बढ़े उन पर दोनों तरफ से ऑटोमैटिक हथियारों से जबरदस्त गोलीबारी की गई। कुछ ही कमांडो इस जवाबी हमले में बच पाए।
उनकी मदद करने आए लेफ्टिनेंट कर्नल इसरार रहीम खां के नेतृत्व में दसवीं बटालियन के गार्ड्स ने सीढ़ियों के दोनों तरफ मशीन गन ठिकानों को निष्क्रिय किया, लेकिन उनके ऊपर सरोवर की दूसरी ओर से जबरदस्त गोलीबारी होने लगी। कर्नल इसरार खां ने सरोवर के उस पार भवन पर गोली चलाने की अनुमति मांगी, लेकिन उसे अस्वीकार कर दिया गया। कहने का मतलब ये कि सेना को जिस विरोध का सामना करना पड़ा उसकी उन्होंने कल्पना भी नहीं की थी।
बराड़ कहते हैं, "वो तो पहले पैंतालिस मिनट में पता चल गया कि इनकी प्लानिंग, इनके हथियार और इनकी किलाबंदी इतनी मजबूत है कि इनसे पार पाना आसान नहीं होगा। हम चाहते थे कि हमारे कमांडो अकाल तख्त के अंदर स्टन ग्रेनेड फेंकें। स्टन ग्रेनेड की जो गैस होती है उससे आदमी मरता नहीं है। उसको सिर दर्द हो जाता है। उसकी आंखों में पानी आ जाता है। वो ठीक से देख नहीं सकता है और इस बीच हमारे जवान अंदर चले जाएं।
लेकिन इन ग्रेनेडों को अंदर फेंकने का कोई रास्ता नहीं था। हर खिड़की और हर दरवाजे पर सैंड बैग लगे हुए थे। ग्रेनेड दीवारों से टकरा कर परिक्रमा पर वापस आ रहे थे और हमारे जवानों पर उनका असर होने लगा था।" सिर्फ उत्तरी और पश्चिमी छोर से ही सैनिकों पर फायरिंग नहीं हो रही थी बल्कि अलगाववादी जमीन के नीचे मेन होल से निकल कर मशीन गन से फायर कर अंदर ही गायब हो जा रहे थे।
जनरल शाहबेग सिंह ने इन लोगों को घुटने के आसपास फायर करने की ट्रेनिंग दी थी क्योंकि उनका अंदाजा था कि भारतीय सैनिक रेंगते हुए अपने लक्ष्य की ओर बढ़ेंगे, लेकिन कमांडोज बाकायदा चल कर आगे बढ़ रहे थे। यही कारण है कि ज्यादातर सैनिकों को पैरों में गोली लगी। जब सैनिकों का बढ़ना रुक गया तो जनरल बराड़ ने आर्मर्ड पर्सनल कैरियर के इस्तेमाल का फैसला किया, लेकिन जैसे ही एपीसी अकाल तख्त की ओर बढ़ा, उसे चीन निर्मित रॉकेट लांचर से उड़ा दिया गया।
तेज रोशनी का फायदा
जनरल बुलबुल बराड़ याद करते हैं, "एपीसी में अंदर बैठे कमांडोज को प्रोटेक्शन मिल जाता है। हमारी कोशिश थी कि हम अपने जवानों को अकाल तख्त के नजदीक से नजदीक पहुंचा सकें, लेकिन हमें पता नहीं था कि उनके पास रॉकेट लॉन्चर्स हैं। उन्होंने रॉकेट लॉन्चर फायर कर एपीसी को उड़ा दिया।" जिस तरह से चारों तरफ चल रही गोलियों से भारतीय जवान धराशायी हो रहे थे, जनरल बराड़ को मजबूर होकर टैंकों की मांग करनी पड़ी।
मैंने जनरल बराड़ से पूछा कि क्या टैंकों का इस्तेमाल पहले से आपकी योजना में था? बराड़ का जवाब था, "बिल्कुल नहीं। टैंकों को तब बुलाया गया जब हमने देखा कि हम अकाल तख्त के नजदीक तक भी नहीं पहुंच पा रहे हैं। हमें डर था कि सुबह होते ही हजारों लोग आ जाएंगे चारों तरफ से फौज को घेर लेंगे। टैंकों का इस्तेमाल हम इसलिए करना चाहते थे कि उनके जिनॉन बल्ब या हेलोजन बल्ब बहुत शक्तिशाली बल्ब होते हैं।
हम उनके जरिए उनकी आंखों को चौंधियाना चाहते थे ताकि वो कुछ क्षणों के लिए कुछ न देख पाएं और हम उसका फायदा उठा कर उन पर हमला बोल दें।" वे कहते हैं, "लेकिन ये बल्ब ज्यादा से ज्यादा बीस, तीस या चालीस सैकेंड रहते हैं और फिर फ्यूज हो जाते हैं। बल्ब फ्यूज होने के बाद हम टैंक को वापस ले गए। फिर दूसरा टैंक लाए, लेकिन जब कुछ भी सफल नहीं हो पाया और सुबह होने लगी और अकाल तख्त में मौजूद लोगों ने हार नहीं मानी तो हुक्म दिया गया कि टैंक के सेकेंड्री आर्मामेंट से अकाल तख्त के ऊपर वाले हिस्से पर फायर किया जाए, ताकि ऊपर से गिरने वाले पत्थरों से लोग डर जाएं और बाहर निकल आएं।"
इसके बाद तो अकाल तख्त के लक्ष्य को किसी और सैनिक लक्ष्य की तरह ही माना गया। बाद में जब रिटायर्ड जनरल जगजीत सिंह अरोड़ा ने स्वर्ण मंदिर का दौरा किया तो उन्होंने पाया कि भारतीय टैंकों ने अकाल तख्त पर कम से कम 80 गोले बरसाए थे।
मैंने जनरल बराड़ से पूछा कि आपको कब अंदाजा हुआ कि जरनैल सिंह भिंडरावाले और जनरल शाहबेग सिंह मारे गए। बराड़ ने जवाब दिया, "करीब तीस चालीस लोगों ने दौड़ लगाई बाहर निकलने के लिए। हमें लगा कि लगता है ऐसी कुछ बात हो गई है और फिर फायरिंग भी बंद हो गई। फिर हमने अपने जवानों से कहा कि अंदर जा कर तलाशी लो। तब जा कर उनकी मौत का पता चला, लेकिन अगले दिन कहानियां शुरू हो गईं कि वो रात को बच कर पाकिस्तान पहुंच गए।
पाकिस्तानी टीवी अनाउंस कर रहा है कि भिंडरावाले उनके पास हैं और 30 जून को वो उन्हें टीवी पर दिखाएंगे।" वे कहते हैं, "मेरे पास सूचना और प्रसारण मंत्री एचकेएल भगत और विदेश सचिव रसगोत्रा का फोन आया कि आप तो बोल रहे हैं कि वो मर चुके हैं जबकि पाकिस्तान कह रहा है कि वो जिंदा हैं। मैंने कहा उनकी पहचान हो गई है। उनका शव उनके परिवार को दे दिया गया है और उनके अनुयायियों ने उनके पैर छुए हैं। उनकी मौत हो गई है। अब पाकिस्तान जो चाहे वो बोलता रहे उनके बारे में।" इस पूरे ऑपरेशन में भारतीय सेना के 83 सैनिक मारे गए और 248 अन्य सैनिक घायल हुए।
इसके अलावा 492 अन्य लोगों की मौत की पुष्टि हुई और 1,592 लोगों को हिरासत में लिया गया। इस घटना से भारत क्या पूरे विश्व में सिख समुदाय की भावनाएं आहत हुईं। ये भारतीय सेना की सैनिक जीत जरूर थी, लेकिन इसे बहुत बड़ी राजनीतिक हार माना गया। इसकी टाइमिंग, रणनीति और क्रियान्वयन पर कई सवाल उठाए गए और अंतत: इंदिरा गांधी को इसकी कीमत अपनी जान देकर चुकानी पड़ी।