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Naxal: कर्रेगुट्टा में बॉर्डर की तर्ज पर बिछा था बारूद, 250 गुफाओं का राज और ऑपरेशन 'ब्लैक फॉरेस्ट' की कहानी

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ऑपरेशन ब्लैक फॉरेस्ट - फोटो : Amar Ujala
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छत्तीसगढ़-तेलंगाना बॉर्डर पर स्थित कर्रेगुट्टा पहाड़ी, करीब साठ किलोमीटर लंबी है। तापमान भी 40-45 डिग्री से ज्यादा ही रहता है। जवानों को हर कदम पर इम्प्रोवाइज्ड एक्सप्लोसिव डिवाइस (आईईडी) के जोखिम का सामना करना था। पत्थर, पत्तों और नीचे पड़ी टहनियों पर गलत पांव पड़ते ही न जाने कब विस्फोट हो जाए, कोई नहीं जानता था। लिहाजा, केंद्रीय गृह मंत्री अमित शाह ने 31 मार्च 2026 तक नक्सलवाद के पूर्ण खात्मे की घोषणा की है, इसलिए देश के सबसे बड़े केंद्रीय अर्धसैनिक बल 'सीआरपीएफ' और इसकी विशेष इकाई 'कोबरा', जिसे जंगल वॉरफेयर में खासी महारत हासिल है, सभी तरह के खतरों के बीच नक्सलियों के ठिकानों की तरफ बढ़ चली। कर्रेगुट्टा पहाड़ी पर तीन-चार सौ नक्सली मौजूद थे। 

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'सीआरपीएफ' के साथ छत्तीसगढ़ पुलिस की विशेष इकाई 'डीआरजी' भी थी। ऑपरेशन 'ब्लैक फॉरेस्ट' के तहत पहाड़ी की जबरदस्त घेराबंदी की गई। सीआरपीएफ डीजी ज्ञानेंद्र प्रताप सिंह कहते हैं, कर्रेगुट्टा में अंतरराष्ट्रीय बॉर्डर की तर्ज पर बारूद बिछा था। वहां हर कदम पर माइनिंग लगाई गई थी। लगभग तीन सप्ताह के इस ऑपरेशन में जब सुरक्षा बल पहाड़ी के टॉप पर पहुंचे तो सभी की आंखें खुली रह गई। छोटी बड़ी लगभग 250 गुफाओं का राज खुलते देर नहीं लगी। हथियार और बारूद तैयार करने के चार-चार कारखाने, पहाड़ी पर नक्सलियों के तगड़े होल्ड की कहानी बयां कर रहे थे। 

ऑपरेशन 'ब्लैक फॉरेस्ट' को करीब से जानने समझने के लिए अमर उजाला डॉट कॉम बीजापुर के नक्सल प्रभावित इलाके 'कर्रेगुट्टा', जिसे 'केजीएच' भी कहते हैं, के सबसे निकटवर्ती एफओबी, 'फॉरवर्ड ऑपरेटिंग बेस' 'गलगम' पर पहुंचा। 'कर्रेगुट्टा' के आसपास सीआरपीएफ ने कई एफओबी स्थापित की हैं। यहीं से सभी तरह के सर्च एवं दूसरे ऑपरेशन लांच होते हैं। एफओबी को देखने पर मालूम चलता है कि सीआरपीएफ कितनी मुश्किलों का सामना करते हुए एफओबी स्थापित करती है। सीआरपीएफ डीजी जीपी सिंह कहते हैं, केंद्रीय गृह मंत्री अमित शाह के नक्सलवाद को 31 मार्च 2026 तक खत्म करने के संकल्प को पूरा करने के लिए हम प्रतिबद्ध हैं। 
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'ऑपरेशन ब्लैक फॉरेस्ट' में 31 नक्सलियों के शव बरामद किए गए हैं। ऐसा सभी संभव है कि इस संख्या से परे कई नक्सली घायल हुए हों या मारे गए हों। यह ऑपरेशन 1200 वर्ग किलोमीटर के क्षेत्र में चलाया गया, इसलिए यह अभी तक का सबसे बड़ा अभियान रहा है। हजारों जवानों को इस अभियान में शामिल किया गया। बतौर जीपी सिंह, एक साथ इतनी बड़ी संख्या में नक्सलियों का खात्मा इससे पहले कभी नहीं हुआ। 



पहाड़ी को घेरने की यह कार्रवाई कोई एक दो सप्ताह की तैयारी का परिणाम नहीं थी, बल्कि इस पर महीनों से काम चल रहा था। ऑपरेशन में शामिल एक अधिकारी ने बताया, पहाड़ी पर जाने से पहले हर तरह के नुकसान को ध्यान में रखकर रणनीति तैयार की गई थी। इस ऑपरेशन में शामिल जवानों की सटीक संख्या बताना ठीक नहीं होगा, लेकिन ये कह सकते हैं कि इसके लिए हजारों जवानों को तैयार किया गया था। 

पहाड़ी साठ किलोमीटर लंबी थी। नक्सलियों ने लंबे समय से वहां ठिकाने बने रखे थे, ये बात सुरक्षा बलों को मालूम थी। तकनीकी उपकरण और मैनुअल इंटेलिजेंस के जरिए यह जानकारी मिली कि वहां पर तीन सौ से चार सौ की संख्या में नक्सली मौजूद हैं। इसलिए ऑपरेशन में हेलीकॉप्टर, ड्रोन और दूसरे तरह के मॉडर्न गजट का इस्तेमाल किया गया। डॉग स्कवॉयड, आईईडी डिटेक्टर टीम और दूसरे एक्सपर्ट साथ थे। शरीर को झुलसा देने वाली गर्मी में पहाड़ पर चढ़ना आसान नहीं था। हर जगह पर आईईडी का खतरा था। इस ऑपरेशन में सीआरपीएफ व दूसरे बलों के 18 जवान भी घायल हुए हैं। 



अधिकारी के मुताबिक, जवानों को एक साथ आगे नहीं बढ़ाया गया। उन्हें रिप्लेस किया जाता रहा। जैसे ही एक पार्टी वापस आती, दूसरी पार्टी मोर्चे पर पहुंच जाती। उस पहाड़ी पर लंबे समय से आम लोगों का आना जाना बंद था। लोकल पुलिस भी वहां नहीं पहुंच सकी थी। नक्सलियों ने इसी बात का फायदा उठाया। उन्होंने वहां पर अपना एक मजबूत बेस तैयार कर लिया। दो टन बारूद का मिलना, यह कोई छोटी मोटी बात नहीं है। 150 से अधिक बंकर मिले हैं। ढाई सौ गुफाओं में हथियार बनाने से लेकर उनके सुरक्षित भंडारण की व्यवस्था की गई थी। पहाड़ी पर हथियार बारूद तैयार होता था। ऐसी चार फैक्ट्री मिली थी, जिनमें बीजीएल जैसे घातक हथियार तैयार किए जाते थे। नक्सलियों का ट्रेनिंग सेंटर भी था। अस्पताल भी बनाया गया था। नक्सलियों ने इस पहाड़ी को एक किले का रूप दे दिया था। 
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सुरक्षा बलों ने ऑपरेशन 'ब्लैक फॉरेस्ट' शुरु करने से पहले पहाड़ी के हर हिस्से की जानकारी जुटाई थी। नक्सलियों ने पहाड़ी पर सैंकड़ों आईईडी लगा रखी थी। यह इसलिए किया गया था ताकि कोई भी सुरक्षा बल उन तक नहीं पहुंच सके। सुरक्षा बलों ने साढ़े चार सौ आईईडी तो बरामद की हैं, जबकि अभी वहां पर अनेक आईईडी ऐसी हैं, जिनका पता लगाया जा रहा है। पहाड़ी पर चार टेक्नीकल यूनिटों में आईईडी और बीजीएल बनाए जाते थे। ये काम मैनुअल तरीके से होता था। लोहे को हाथ से काटा जाता था। नक्सलियों का अभेद्य गढ़ समझे जाने वाले इस पहाड़ पर 21 दिन तक मुठभेड़ चली थी। मारे गए जिन 28 नक्सलियों की शिनाख्त हुई है, उन पर कुल 1 करोड़ 72 लाख रूपए के इनाम घोषित थे। नक्सलियों के सबसे मजबूत सशस्त्र संगठन पीएलजीए बटालियन, सीआरसी कंपनी एवं तेलंगाना स्टेट कमेटी के काडर के कई शीर्ष नेताओं की वहां मौजूदगी रही थी। 



इस पहाड़ी पर संचालित अभियान में विभिन्न आसूचना एजेंसियों से लगातार इनपुट लिए जाते रहे। सीआरपीएफ के शीर्ष अफसरों के अलावा, आईबी के अधिकारी भी इस अभियान पर नजर रख रहे थे। हर तरह की सूचना जुटाकर इस अभियान को शुरु किया गया था। इस अभियान में अब तक कुल 214 नक्सली ठिकाने और बंकर नष्ट किए जा चुके हैं। तलाशी के दौरान कुल 450 आईईडी, 818 बीजीएल शेल, 899 बंडल कॉडेक्स, डेटोनेटर और भारी मात्रा में विस्फोटक सामग्री बरामद की गई। लगभग 12 हजार किलोग्राम खाने-पीने का सामान भी बरामद किया गया।

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