पश्चिम एशिया संकट के बीच अंतरराष्ट्रीय बाजार में कच्चे तेल की कीमतों में भारी उछाल आया है। इसके बावजूद देश में आम लोगों को राहत देने के लिए सरकारी तेल कंपनियां रोजाना करीब 550 करोड़ रुपये का नुकसान उठा रही हैं। पेट्रोलियम मंत्रालय ने साफ कहा है कि सरकार नहीं चाहती कि वैश्विक संकट का पूरा बोझ सीधे आम जनता पर पड़े। इसी वजह से पेट्रोल, डीजल और एलपीजी की कीमतों में पूरी बढ़ोतरी अभी उपभोक्ताओं तक नहीं पहुंचाई गई है। सरकार का कहना है कि यह राहत खास तौर पर परिवारों, किसानों और दोपहिया वाहन चलाने वालों के लिए दी जा रही है।
तेल कंपनियों को इतना बड़ा नुकसान क्यों उठाना पड़ रहा है?
पेट्रोलियम और प्राकृतिक गैस मंत्रालय के मुताबिक, पश्चिम एशिया में जारी तनाव के कारण अंतरराष्ट्रीय बाजार में तेल महंगा हो गया है। लेकिन सरकारी तेल कंपनियों ने खुद नुकसान सहकर घरेलू बाजार में कीमतों को नियंत्रित रखा है। मंत्रालय ने बताया कि यह राहत सिर्फ खुदरा उपभोक्ताओं के लिए है। औद्योगिक खरीद में अंतरराष्ट्रीय बाजार के हिसाब से कीमतें तय की जा रही हैं। सरकार को डर है कि अगर पूरा बोझ जनता पर डाला गया, तो महंगाई और बढ़ सकती है।
क्या कुछ कंपनियां इस राहत का गलत फायदा उठा रही हैं?
मंत्रालय ने कहा कि कुछ औद्योगिक उपभोक्ता सस्ते खुदरा पंपों से ईंधन खरीदकर फायदा उठाने की कोशिश कर रहे हैं। इससे आम लोगों के लिए बनाई गई राहत योजना प्रभावित हो रही है। सरकार के अनुसार, निजी तेल कंपनियों के यहां डीजल की बिक्री में करीब 38 फीसदी गिरावट आई है, क्योंकि उनकी कीमतें ज्यादा हैं। इसके चलते मांग सरकारी पेट्रोल पंपों की तरफ बढ़ गई है। वहीं सरकारी कंपनियों के बल्क ग्राहकों में भी करीब 29 फीसदी की कमी दर्ज की गई है।
सरकार ने राज्यों को क्या निर्देश दिए हैं?
केंद्र सरकार ने राज्यों और केंद्र शासित प्रदेशों से विशेष निगरानी दल बनाने को कहा है। इन टीमों को कालाबाजारी, अवैध भंडारण और खुदरा ईंधन के गलत इस्तेमाल पर कार्रवाई करने का निर्देश दिया गया है। सरकार ने उद्योग संगठनों से भी कहा है कि वे अपने सदस्यों को नियमों का पालन करने के लिए जागरूक करें। आवश्यक वस्तु अधिनियम के तहत सख्त कार्रवाई की चेतावनी भी दी गई है।
क्या देश में पेट्रोल-डीजल की कमी है?
पेट्रोलियम मंत्रालय ने साफ किया है कि देश में पेट्रोल और डीजल की कोई कमी नहीं है। भारत दुनिया का चौथा सबसे बड़ा रिफाइनिंग देश है। देश में 22 रिफाइनरियां काम कर रही हैं और कुल क्षमता 258.1 मिलियन टन सालाना है। वित्त वर्ष 2025-26 में देश की खपत 243.2 मिलियन टन रही, जबकि 61.5 मिलियन टन पेट्रोलियम उत्पादों का निर्यात भी किया गया। मंत्रालय ने कहा कि अफवाहों पर ध्यान देने की जरूरत नहीं है।
माना जा रहा है कि अगर पश्चिम एशिया संकट लंबा चला, तो सरकार और तेल कंपनियों पर दबाव बढ़ सकता है। फिलहाल सरकार कीमतों को नियंत्रित रखकर जनता को राहत देने की कोशिश कर रही है। लेकिन अंतरराष्ट्रीय बाजार में लगातार तेजी बनी रही, तो आने वाले समय में पेट्रोल और डीजल की कीमतों पर असर पड़ सकता है। सरकार ने कहा है कि वह हालात पर लगातार नजर बनाए हुए है और ऊर्जा सुरक्षा सुनिश्चित करने के लिए सभी जरूरी कदम उठाए जा रहे हैं।