न्योमा में 12 महीने डटी रहती है भारतीय सेना
लेह से लगभग 180 किमी की दूरी पर पूर्वी लद्दाख में स्थित है न्योमा। यहां से चीन की सीमा यानी वास्तविक नियंत्रण रेखा (LAC) लगभग 30 किमी ही दूर है। जिसके चलते इसके रणनीतिक महत्व का आप अंदाजा लगा सकते हैं। चीन की गतिविधियों को देखते हुए न्योमा में ही दुनिया का सबसे ऊंचा एडवांस लैंडिंग ग्राउंड भी बन रहा है, जिसके अगले साल तक पूरा हो जाने की उम्मीद है। वहीं न्योमा में भारतीय सेना की आर्मर्ड ब्रिगेड भी तैनात है, जो साल के 12 महीने वहीं रहती है। सिंधु नदी से सटे न्योमा में जिंदगी आसान नहीं है। हरियाली का दूर-दूर तक कोई नामोनिशान नहीं है। न्योमा में तेज ठंडी हवाएं चलती हैं और वहां ऑक्सीजन का स्तर भी काफी कम होता है औऱ सांस लेने के लिए जद्दोजहद करनी पड़ती है। थोड़ा सा चलने पर ही सांस फूलने लगती है और सिर दर्द होने लगता है। वहां सर्दियों में टैंपरेचर -40 डिग्री सेल्सियस तक नीचे गिर जाता है। ऐसे हालात में भी हमारी भारतीय सेना वहां 12 महीने डटी रहती है। बता दें कि वास्तविक नियंत्रण रेखा पूर्वी लद्दाख से 832 किलोमीटर तक फैली हुई है।
न्योमा में भारतीय टैंकों की टैक्टिकल ड्रिल
भारतीय सेना की 14वीं कोर यानी फायर एंड फ्यूरी कॉर्प्स के तहत सुपर हाई एल्टीट्यूड एरिया में तैनात भारतीय जवानों का हालचाल जानने के लिए अमर उजाला न्योमा पहुंचा, जहां भारतीय टैंकों की टैक्टिकल ड्रिल चल रही थी। पूर्वी लद्दाख की बर्फीली चोटियों पर हुई इस ड्रिल में भारत के मुख्य युद्धक टैंक टी-90 भीष्म, यु्द्धक टैंक टी-72 और बीएमपी-2 हिस्सा ले रहे थे। इस ड्रिल का उद्देश्य था कि किसी भी युद्ध के हालात में कैसे भारतीय टैंक जरूरत पड़ने पर न केवल पहाड़ों पर चढ़ सकते हैं, बल्कि सिंधु नदी को भी पार कर सकते हैं। बता दें, कि सिंधु नदी तिब्बत में कैलाश पर्वत से निकलती है, और लद्दाख से होकर बहते हुए पाकिस्तान में प्रवेश करती है। इस ड्रिल में भीष्म टैंक ने बता दिया कि 48 टन वजनी यह टैंक 14 हजार फीट की ऊंचाई पर भी अपनी जबरदस्त फायरपावर के चलते दुश्मन के पसीने छुड़ा सकता है। साथ ही, ज्यादा वजन होने के बावजूद यह नदी को भी बेहद आसानी से पार कर सकता है। खास बात यह है कि यहां जो भी आर्मर्ड व्हीकल तैनात हैं, वे सभी आत्मनिर्भर भारत पहल के तहत स्वदेश में ही बनाए जा रहे हैं।
नदी को पार कर सकता है भीष्म
ट्रेडमैन मनोज कुमार ने अमर उजाला से खास बातचीत में बताया कि उन्हें इस मशीन और दुश्मन को मार गिराने की इसकी काबिलियत पर पूरा भरोसा है। उन्होंने कहा कि हम इस ऊंचाई पर भी अपने दुश्मन पर हमला करने और उसे नष्ट करने के लिए पूरी तरह से तैयार हैं। उन्होंने आगे बताया कि टी-90 भीष्म को कहीं भी तैनात किया जा सकता है और पहाड़ी इलाकों को भी यह बेहद आसानी से पार कर सकता है। यह डीप-फोर्डिंग (नदी के तल, झील के तल या समुद्र तल पर वाहन चलाकर गहरे पानी को पार करने की तकनीक) में सक्षम है। भीष्म की डीप-फोर्डिंग क्षमता का नजारा खुद अमर उजाला ने अपनी आंखों से भी देखा। ट्रेड्समैन मनोज के मुताबिक टी-90 भीष्म दुनिया के सबसे बेहतरीन टैंकों में से एक है और उन्हें इस बात पर गर्व है कि इस टैंक का निर्माण भारत में ही किया जा रहा है। वहीं, टी-90 टैंक दिन हो या रात, हर मौसम में कारगर है। टैंक में थर्मल इमेज की क्षमता भी है। भीष्म की ऑपरेशनल रेंज 550 किलोमीटर तक है और इसमें बुलेट प्रूफ जैकेट यानी एक्सप्लोसिव रिएक्टिव आर्मर भी लगा है। इसकी ताक़त और क्षमता देखते हुए ही इसे भीष्म का नाम दिया गया है- यानी ऐसी दीवार, जिसे कोई नहीं भेद सकता।
'हंटर किलर' की थ्योरी पर काम करता है टी-90
उन्होंने आगे बताया कि इस टैंक में कुल तीन लोग सवार हो सकते हैं, इनमें ड्राइवर, गनर और कमांडर शामिल हैं। गनर का काम दुश्मन पर नजर रखने और उस पर गोली चलाने का जिम्मा होता है। इस टैंक में दो हथियार लगाए गए हैं। मुख्य हथियार के तौर पर इसमें 125 मिलीमीटर की मोटाई वाला स्मूथबोर टैंक गनर लगा हुआ है, जो चार तरह के गोला-बारूद दाग सकता है। इस टैंक पर 43 गोले स्टोर किए जा सकते हैं। जबकि इसमें दूसरी हथियार प्रणाली 7.62-एमएम मशीन गन पीकेटीएम है, जो पैदल सेना को निशाना बनाती है और और हवा में मौजूद किसी भी लक्ष्य को बरबाद करने के लिए इसमें 12.7-एमएम एनएसबीटी गन लगी है। ट्रेड्समैन मनोज ने बताया कि चालक दल का तीसरा सदस्य कमांडर होता है, जो टैंक को संभालता है और कमांड देता है। यह टैंक 'हंटर किलर' की थ्योरी पर काम करता है। वहीं कमांडर दुश्मन पर गोली चलाकर उन्हें नष्ट भी कर सकता है। इस टैंक में 1000 एचपी का इंजन लगा है और इसे रेगिस्तान, दलदली भूमि या कहीं भी तैनात किया जा सकता है। बता दें कि इस टैंक की लंबाई 9.6 मीटर, चौड़ाई 2.78 मीटर है। ये ज़मीन से 2.22 मीटर ऊंचा चलता है। आकार में छोटा होने के चलते यह जंगल, पहाड़ दलदल वाले इलाकों तक में तेजी से चल सकता है। वहीं, करीब 60 किलोमीटर तक इसकी रफ्तार है।
सर्दियों में रात को कई बार करना पड़ता है स्टार्ट
ट्रेडमैन मनोज बताते हैं कि सर्दियों में जरूर थोड़ी दिक्कत होती है, क्योंकि जब तापमान -40 डिग्री सेल्सियस तक पहुंच जाता है, तो इसे स्टार्ट करने जैसी दिक्कतों का सामना करना पड़ता है। जिससे इसकी क्षमता पर भी असर पड़ता है। रात में जब तापमान काफी नीचे गिर जाता है, तो हमें टैंक के इंजन को 2-3 बार चालू रखना पड़ता है और इसके सिस्टम को लगातार चेक करते रहते हैं, ताकि यह लगातार काम करता रहे। वह बताते हैं कि हमें इसकी बकायदा ट्रेनिंग भी दी जाती है। वहीं, इस टैक्टिकल ड्रिल में टी-90 के अलावा टी-72 टैंक और एंफीबियस बीएमपी-2 ने भी हिस्सा लिया और अपने टास्क को सफलतापूर्वक पूरा किया। बीएमपी-2 में 8 लोग बैठ सकते हैं और इसे पानी और जमीन दोनों सतहों पर चलाया जा सकता है। बता दें कि टी-90 टैंक को चेन्नई के अवादी में मौजूद हैवी व्हीकल फैक्ट्री में बनाया जा रहा है। इसका टी-90 भीष्म मार्क 3 वर्जन भी बनाया गया है। इस समय करीब 1200 टैंक सर्विस में हैं और 464 टैंकों का ऑर्डर दिया गया है। वहीं 2025 तक 1657 भीष्म टैंकों की तैनाती की योजना है।
टी-90 के डिप्लॉयमेंट से घबरा गया था चीन
2020 में पूर्वी लद्दाख के गलवान में हुई हिंसा के बाद चीन को जवाब देने के भारतीय सेना को इन ऑपरेशनल इलाकों में बड़ी संख्या में टी-72 और टी-90 टैंक तैनात करने पड़े थे, जिसका असर यह हुआ था कि मिरर डिप्लॉयमेंट से चीन घबरा गया और उसे पीछे हटना पड़ा। इन टैंकों को चुमार और डेमचौक में भी तैनात किया गया था। उस दौरान सीमा पर चीनी सैनिकों के जमावड़े के बाद भारतीय वायु सेना भी हरकत में आई और तुरंत 68,000 से अधिक सैनिकों को फॉरवर्ड पोस्टों पर भेजा गया। इनमें 90 टैंक, 330 इन्फैंट्री कॉम्बैट व्हीकल, रूसी बीएमपी और कई आर्टिलरी गनों को हवाई मार्ग से एलएसी पर पहुंचाया गया। वहीं भारत अब हाई एल्टीट्यूड इलाकों में तैनाती के लिए 25 टन वजनी स्वदेशी भारतीय लाइट टैंक ’जोरावर’ पर काम कर रहा है, ताकि दुश्मन के हमले की स्थिति में जोरावार की तुरंत फॉरवर्ड पोस्ट पर तैनाती की जा सके। हाल ही में राजस्थान के जैसलमेर में जोरावर का ट्रायल किया गया। इसमें जोरावर का डेवलपमेंटल फील्ड फायरिंग ट्रायल का पहला फेज सफल रहा।