विद्रोही नगा समूह नेशनलिस्ट सोशलिस्ट काउंसिल ऑफ नगालिम-इसाक मुइवा (एनएससीएन-आईएम) ने बुधवार को दशकों पुराने नगा मुद्दे का स्थायी समाधान तलाशने के लिए केंद्र के साथ शांति वार्ता के प्रयास में एक सरकारी प्रतिनिधि के साथ बैठक की। अधिकारियों ने यह जानकारी दी। उन्होंने बताया कि एनएससीएन-आईएम के प्रतिनिधिमंडल ने वरिष्ठ नेता वी एस अतेम के नेतृत्व में राष्ट्रीय राजधानी में एक अज्ञात स्थान पर वार्ताकार एके मिश्रा से मुलाकात की।
बातचीत बेनतीजा रही, आज फिर वार्ता शुरू होने की संभावना
प्रतिनिधिमंडल ने नगाओं के लिए एक अलग झंडा सहित विद्रोही समूह की मुख्य मांगों पर चर्चा की। वार्ता की जानकारी रखने वाले एक अधिकारी ने कहा कि बातचीत बेनतीजा रही और गुरुवार को इसके फिर से शुरू होने की संभावना है। एनएससीएन-आईएम प्रतिनिधिमंडल ने वार्ताकार से प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी के साथ बैठक की व्यवस्था करने का भी अनुरोध किया। समूह के शीर्ष नेता थुइंगलेंग मुइवा (Thuingaleng Muivah) ने बैठक के इस दौर में हिस्सा नहीं लिया।
नगा बहुल क्षेत्रों के एकीकरण और एक अलग झंडे की अपनी मांग पर कायम
सरकार के साथ बातचीत शुरू करने से एक दिन पहले मंगलवार को एनएससीएन-आईएम ने कहा कि वह नगा बहुल क्षेत्रों के एकीकरण और एक अलग झंडे की अपनी मांग पर कायम है और इन पर कोई समझौता नहीं किया जा सकता है।
एनएससीएन-आईएम ने अपने मुखपत्र ‘नगालिम वॉइस’ में एक संपादकीय में कहा कि यह एक विडंबना है कि अपनी उपलब्धियों का प्रचार पसंद करने वाले प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी से उनके नगा संबंधी मुद्दे को तार्किक निष्कर्ष पर ले जाने की उम्मीद है जबकि भारत-नागा वार्ता फ्रेमवर्क एग्रीमेंट (एफए) पर गतिरोध कायम है।
संपादकीय में कहा गया कि सात साल पहले जब प्रधानमंत्री मोदी ने तीन अगस्त 2015 को अपने आवास पर एफए हस्ताक्षर समारोह का आयोजन किया था, तो उनके भाषण ने एक उम्मीद जगाई थी। प्रधानमंत्री ने इस बात का बड़े गर्व के साथ एलान किया था कि उन्होंने दक्षिण पूर्व एशिया में सबसे लंबे समय से चली आ रही उग्रवाद की समस्या का हल निकाल लिया है। इसके अलावा, इस समारोह का पूरी दुनिया में सीधा प्रसारण किया गया, ताकि नगा मुद्दा सुलझाने में उनकी उपलब्धि को सभी तक पहुंचाया जा सके।
पीएम मोदी नगा मुद्दे से पीछे नहीं हट सकते: नगालिम वॉइस
संपादकीय में कहा गया कि पीएम मोदी नगा मुद्दे से पीछे नहीं हट सकते, लेकिन उन्हें राजनीतिक समझ से एक बार फिर समझौते की रूपरेखा पर गौर करना होगा। संपादकीय में आगे कहा गया कि एफए लाने का श्रेय तो उन्होंने ले लिया है....अब नगा मुद्दे को सुलझाने के लिए आगे की कार्रवाई भी करें।
केंद्र सरकार 1997 से ही एनएससीएन (आईएम) और 2017 से सात संगठनों वाले नगा नेशनल पॉलिटिकल ग्रुप्स (एनएनपीजी) के साथ अलग-अलग बातचीत कर रही है। वह एनएससीएन-आईएम की अलग नगा ध्वज और संविधान की मांग ठुकरा चुकी है जबकि समूह इस पर अड़ा हुआ है। केंद्र ने तीन अगस्त 2015 को एनएससीएन (आईएम) के साथ रूपरेखा के समझौते पर हस्ताक्षर किए थे और दिसंबर 2017 में एनएनपीजी के साथ भी सहमति बनाई थी।
पड़ोसी राज्यों ने एकीकरण का विरोध किया
नगालैंड के पड़ोसी राज्य - मणिपुर, असम और अरुणाचल प्रदेश ने अपने अधिकार क्षेत्र के तहत बसे हुए नगा क्षेत्रों के एकीकरण के विचार का कड़ा विरोध किया है। बता दें कि फ्रेमवर्क समझौता 18 वर्षों में 80 से अधिक दौर की बातचीत के बाद आया है। 1997 में पहली सफलता तब हाथ लगी थी जब नगालैंड में दशकों के विद्रोह के बाद संघर्ष विराम समझौते को पूरी तरह बंद कर दिया गया था, जो 1947 में भारत की स्वतंत्रता के तुरंत बाद शुरू हुआ था।
हालांकि, एनएससीएन-आईएम के साथ बातचीत नहीं की जा रही थी क्योंकि समूह एक अलग नगा ध्वज और संविधान के लिए जोर दे रहा था, लेकिन केंद्र सरकार ने इस मांग को खारिज कर दिया था। अब सरकार अलग से संघर्ष विराम समझौते के तहत एनएससीएन के अलग-अलग समूहों के साथ शांति वार्ता भी कर रही है। जिन समूहों ने संघर्ष विराम समझौते किए हैं वे हैं- एनएससीएन-एनके, एनएससीएन-आर, एनएससीएन के-खांगो और एनएससीएन (के) निकी।