ममता बनर्जी (फाइल फोटो)
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असम में हाल ही में प्रकाशित अंतिम राष्ट्रीय नागरिक पंजी (एनआरसी) में 19 लाख से ज्यादा लोगों के नाम नहीं हैं, जिसमें 12 लाख हिंदू शामिल हैं। इनमें भी बड़ी संख्या आदिवासियों की है, जिसे असम का मूल निवासी माना जाता है।
ममता बनर्जी ने कहा कि एनआरसी बंगाल या देश के किसी भी हिस्से में नहीं होगा। असम में तो यह असम समझौते की वजह से हुआ। साल 1985 में तत्कालीन राजीव गांधी सरकार और ऑल असम स्टूडेंट्स यूनियन के बीच यह समझौता हुआ था। उन्होंने कहा कि बंगाल में प्रदेश के लोग मुझ पर भरोसा रखें, यहां एनआरसी को कभी मंजूरी नहीं मिलेगी।
पीएम मोदी और गृहमंत्री अमित शाह
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असम में एनआरसी पर मचे बवाल और सरकार की किरकिरी होने के बाद भाजपा का उद्देश्य हर हाल में नागरिकता संशोधन बिल को पास कराना है। नवंबर में होने वाले संसद के शीतकालीन सत्र के दौरान भाजपा सरकार इस बिल को पारित कराना चाहती है।
असम में एनआरसी से छूटे लोगों के लिए भी सरकार ने रणनीति बना रखी है। पिछले दिनों गृह मंत्री अमित शाह ने अपने दो दिवसीय असम दौरे में राज्य सरकार से गहन विमर्श किया था। एनआरसी से छूटे परिवार के लोगों का नाम दर्ज कराने के लिए पार्टी कार्यकर्ताओं की जिम्मेदारी तय की गई।
सूत्रों की मानें तो भाजपा चाहती है कि राज्य सरकार इस मामले में सुप्रीम कोर्ट का दरवाजा खटखटाए। इस बीच थोड़ा समय बीतेगा और संसद का शीतकालीन सत्र शुरू हो जाएगा। फिर इसी सत्र में नागरिकता संशोधन बिल को पारित करा कर ऐसे लोगों को राहत दे दी जाएगी।
राजनीतिक विश्लेषक बताते हैं कि नागरिकता संशोधन बिल की पास कराना इतना भी आसान नहीं है। अपने पहले कार्यकाल में भाजपा सरकार इस बिल को पारित कराने में नाकाम रही है। राज्यसभा में बहुमत के अभाव में सरकार इसे कानूनी जामा नहीं पहना पाई। चूंकि यह संविधान संशोधन बिल है। ऐसे में सरकार को बिल पारित कराने के लिए दो तिहाई बहुमत चाहिए।