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अब आप भी बन सकते हैं सीआईए में जासूस , बस होनी चाहिए तेज आंखें और लंबे कान

Mon, 14 May 2018 02:28 PM IST
रवींद्र दुबे
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एक कतरा ग्लैमर, रंगों का एक छपाका और जासूसी का जबरदस्त अंतर्प्रवाह- ये सभी एक उत्तेजक जीवनशैली के अंग हैं। वर्जीनिया की सुनहरे बालों वाली सुंदरियां, कैलिफोर्निया का सूरज, मियामी के समुद्रतट, मैकडॉनल्ड्स के बड़े-बड़े बर्गर और एम्पायर स्टेट बिल्डिंग से नजर आने वाले दृश्य, ये सभी आपके हो सकते हैं। बशर्ते आपकी आंखें तेज, लंबे कान, चेहरे पर आत्मविश्वास जगाने वाली दोस्ताना मुस्कुराहट, बेहतरीन याददाश्त और आप में सही लोगों से बात करने की तत्परता हो।

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काम सरल है, तनख्वाह खासी और नियोक्ता उदार। अवसरों के देश में परिलब्धियों के साथ साल में दो बार छुट्टियों की भी सुविधा है। इन परिलब्धियों में एक महंगा शक्तिशाली मोबाइल फोन, गुप्त रिकॉर्डिंग के उपकरण और स्पाई कैमरे भी शामिल हैं। हो सकता है कि बाकायदा स्मिथ एंड वेसन या कोल्ट जैसी पिस्तौल भी आपको मुहैया करवा दी जाए, लेकिन पूरी तरह से भरोसा हो जाने के बाद। फिलहाल अमेरिका की खौफनाक, खतरनाक किंतु व्यवहारकुशल खुफिया एजेंसी- ‘सेंट्रल इंटेलिजेंस एजेंसी’ यानी सीआईए एजेंट्स की भर्ती कर रही है। खासतौर से डोनाल्ड ट्रंप के अमेरिका के राष्ट्रपति बनने के बाद डर्टी ट्रिक्स डिपार्टमेंट और भी डर्टी होता जा रहा है। आप भी अपनी बारी का इंतजार कीजिए। धर्म, जाति या रंग का कोई बंधन नहीं है।

सीआईए में काम करने वाले इसे 'कंपनी' कहते हैं। बहरहाल, सीआईए की भर्ती काफी निचले स्तर से शुरू होती है। सीआईए की आखों, कानों और सूचना बैंक में एक बहुत बड़ी संख्या वेटरों की है। चाहे आप डी सिल्वा हों, करतार सिंह या पुत्तू रामास्वामी अय्यर। लेकिन अगर आप किसी फाइव स्टार होटल में वेटर हैं, तो आपकी काफी पूछ है और अगर आप राजधानी में ही हैं, फिर तो आप बेहतर शर्तों के लिए सौदेबाजी भी कर सकते हैं। आप जो काम करेंगे, वह राष्ट्रीय महत्व का होगा। कहने की जरूरत नहीं कि यह राष्ट्र अमेरिका ही होगा।

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खाने में कुछ मिलाना भी पड़ सकता है

कभी-कभी आपको किसी केंद्रीय मंत्री के कोल्ड ड्रिंक या सूप में कुछ मिलाना भी पड़ सकता है। अधिकतर तो आपको आरक्षित सूची ही चेक करके यह पता करना होगा कि कौन-सी टेबल किस मंत्री, नौकरशाह या उद्योगपति के लिए आरक्षित है। आपको उसकी ऐशट्रे या टेबल के नीचे कोई बग भी फिट करना होगा। उनकी बातचीत भी अपनी अंडरवियर में छुपे मिनिएचर डिजिटल रिकॉर्डर में रिकॉर्ड करनी होगी। यह सब कुछ बहुत आसान है न? न तो आपको उस रिकॉर्डिंग को सुनने की जरूरत है और न ही उसे ‘ट्रांस्क्राइब’ करने की। आपको सिर्फ कॉन्सुलेट या उच्चायुक्त के असिस्टेंट सेक्रेटरी या आप ही की तरह के उनके लोगों को वह डिजिटल रिकॉर्डर देना होगा। 

कभी-कभी आपको छिपकर लोगों की बातें सुननी होंगी, तो कभी आपको ‘ड्रॉप’ का काम भी करना होगा। जैसा कि आपको पता चलेगा, ड्रॉप का मतलब होता है, ‘नेटवर्क का पोस्टमैन’। जब आप बिल लेने के लिए जाएंगे, तो नजरें न मिलाने वाला ब्यूरोक्रेट एक छोटा-सा लिफाफा आपके फोल्डर में पैसे के साथ रख देगा, जिसमें किसी उच्चस्तरीय वार्ता की विस्तृत जानकारी होगी। इसे आप तुरंत नेटवर्क के अगले आदमी को थमा देंगे। ठीक से काम कीजिए और आपकी लैंगले, वर्जीनिया की एक भुगतान शुदा यात्रा पक्की है। 

एडवांस्ड ट्रेनिंग और ब्रीफिंग- डीब्रीफिंग के दौर के बाद कंपनी के खर्चे पर आप अमेरिका का भरपूर आनंद उठाएंगे। सुनहरे बालों वाली सुंदरियां और नाइट क्लब। एक पूरा किया गया वादा। यही बात फाइव स्टार होटल के बेल ब्वॉय, फ्रंट ऑफिस असिस्टेंट और कमरा साफ करने वालों पर भी लागू होती है। सभी भर्ती के लायक हैं, लेकिन इन प्रमुख अहर्ताओं का ध्यान रखें- तेज आंखें और लंबे कान। ओके!

समाज सेवा नहीं होती उबाऊ

समाज सेवा भी हमेशा उबाऊ या सस्ती नहीं होती। केवल आपके संपर्क होने चाहिए। एजेंसी को उन लोगों में काफी दिलचस्पी है, जो उन्हें लोगों के मन-मस्तिष्क की अच्छी जानकारी दे सकें। वे जानना चाहते हैं कि फिलहाल लोगों का रुझान किस तरफ है। इसके लिए किसी समाजसेवी या सामाजिक कार्यकर्ता से बेहतर और कौन हो सकता है। यह बात हर कोई जानता है, यहां तक कि ‘केजीबी’ भी जिसका कि रूसियों ने चेहरा बदल दिया है। इससे फर्क नहीं पड़ता कि आप मानसिक रूप से अविकसित बच्चों के लिए काम कर रहे हैं या मुफ्त दवाइयां बांट रहे हैं। 

हालांकि, बड़ी-बड़ी विस्फोटक झुग्गी बस्तियों, गरीब बच्चों की तालीम, प्रौढ़ शिक्षा कार्यक्रम या वेश्याओं के पुनर्वास के लिए काम करने वालों की पूछ ज्यादा है। बस आपको सीआईए को जानकारी देते रहना है। किस बारे में? किसी भी बारे में। चाहे वह सामाजिक असंतोष हो, सांप्रदायिक तनाव हो, खाद्यान्न की कमी हो, संभावित और स्थानीय नेतागण हों, लोगों का राजनीतिक चिंतन हो, या सिर्फ चंद उपयोगी आंकड़े हों। जो भी जानकारी आप देंगे, वह लैंगले, वर्जीनिया स्थित सीआईए मुख्यालय की सेंट्रल कंप्यूटर सिस्टम में जमा हो जाएगी। जरूरत पड़ने पर वह जानकारी एक क्लिक में उपलब्ध हो सकेगी।

बड़ी मेहरबानी, किसी भी सूरत में अपने द्वारा मुहैया कराई गई किसी भी जानकारी की कीमत को कम करके न आंकें। भले ही आप किसी भी छोटे से गांव में एक छोटे-मोटे कार्यकर्ता ही क्यों न हों। आपके शब्द कई किलो सोने में तौलने लायक होंगे। सीआईए अमेरिकी व्यापारियों के लिए इन्फॉर्मेशन प्रोसेसर, फ्रेंड, दार्शनिक और गाइड का काम करती है। आपके द्वारा दी गई जानकारी करोड़ों (डॉलर न कि रुपये) की हो सकती है। 

जी सकते हैं डॉलर भरी जिंदगी

उदाहरण के लिए, कई अविकसित देशों में सीआईए ने अपने मुखबिरों के जरिए गांवों से शहरों की तरफ भारी पलायन की स्थिति पैदा कर दी है। मकसद यह था कि उन गावों के प्राकृतिक संसाधन कई बहुराष्ट्रीय कंपनियों के लिए दोहन योग्य होने के साथ-साथ काफी फायदेमंद थे। इसलिए यदि आप सही वक्त पर सही जगह हैं, तो उसका पूरा-पूरा फायदा उठाएं।

अगर आप काफी संभावनाओं वाले सामाजिक कार्यकर्ता हैं, तो आपको अंदाजा ही नहीं है कि आप कितनी डॉलर भरी जिंदगी जी सकते हैं। सीआईए के पास दानदाता संगठनों की तरह लगने वाली संस्थाओं की भरमार है। जैसे क्रिश्चियन रिलीफ सर्विसेज, यूएस एजेंसी फॉर इंडस्ट्रियल डेवलपमेंट, एशिया केयर और कई निजी स्वयंसेवी संगठन। किसी के पास भी अनुदान के लिए आवेदन कीजिए और वह आपको त्वरित गति से मिल जाएगा। शर्त बस केवल एक होगी कि आपको नियमित रूप से सामाजिक स्थितियों, संलिप्त लोगों और इलाके के राजनीतिक ढांचे पर ई-मेल के जरिए रिपोर्ट भेजनी होगी। इस काम के लिए आप किसी रिटायर्ड मीडियाकर्मी को रखकर उससे लिखवा भी सकते हैं।

नौकरशाह, राजनेता और सत्ता केंद्रों के मुहाने पर बैठे लोग खुफिया एजेंसी की प्राथमिकता सूची में सबसे ऊपर हैं। उन्हें कुछ अधिक काम करना पड़ता है। जैसे गोपनीय दस्तावेजों की फोटो कॉपी करना, राष्ट्रीय नीतियों को खुले छिपे रूप से प्रभावित करना और लोगों एवं देश की राजनीति को पश्चिमी देशों के अनुसार करने की कोशिश करना। पिछले तीन दशकों में सीआईए को इस काम में कितनी कामयाबी मिली है, ये कहने की जरूरत नहीं है। सीआईए आपके लिए खजाना खोल देगी, लेकिन काम तो आप ही को करना होगा। जिंदगी के सारे मजे आपका इंतजार कर रहे हैं। आपका स्तर अमेरिकी उच्चायोग, दूतावास या कॉन्सुलेट के लोगों से भी ऊंचा हो सकता है और जीवनशैली भी।   
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आप क्यों नहीं?

सेना व पुलिस के अफसरान, स्थानीय गुंडे, कसरती बदन वाले पहलवान, स्किल्ड वर्कर्स (खासकर संचारकर्मी) और श्रमिक नेता एक वर्ग विशेष में आते हैं। उनका उपयोग सीआईए के गुप्त अभियानों में होता है। वे बड़े पैमाने के बहुआयामी अभियानों में सक्रिय तौर पर आक्रामक भूमिका निभाते हैं। वे एजेंसी के 'मसल्स' हैं। एजेंसी उन्हें जानकारी निकालने के लिए यातनाओं और थर्ड डिग्री में प्रशिक्षित तो करती ही है, साथ ही यातना देने के नवीनतम उपकरण भी उन्हें मुहैया करवाती है। मामला काफी ऊंचा है और वक्त भी काफी मुफीद है। फिलहाल एजेंट्स को ऐसे एजेंट्स की जरूरत है, जिनका आवरण अभी उघड़ा नहीं है। हर कोई इस भर्ती के काबिल है। कंपनी के पे-रोल पर कई राजे-रजवाड़े, बादशाह, नवाब, राष्ट्रपति और प्रधानमंत्री हैं।
 
सीआईए के पास सैकड़ों उच्च स्तरीय नौकरशाह, मीडियाकर्मी, हजारों मामूली क्लर्क, कंप्यूटर ऑपरेटर, अनुवादक, गुप्त रेडियो ऑपरेटर, वेटर इत्यादि हैं... तो फिर आपके न होने का कोई कारण आपको नजर आता है? और कंपनी में भर्ती होने के लिए फिलर्स भेजना बहुत ही आसान है। अगर आप उन पार्टियों में जाते हैं, जहां अमेरिकी राजनयिक अक्सर दिखाई देते हैं, तो आपके लिए उन जगहों पर नजर आना बहुत जरूरी है। यदि नहीं, तो दूतावास या उच्चायुक्त जब भी जाएं, तो अंडर सेक्रेटरी से बात करते वक्त जानकारी के कुछ चुनिंदा टुकड़े फेंक दीजिए। जब वह मासूम से लगने वाले सवाल पूछने लगे, जैसे कि क्या आप अपनी नौकरी से संतुष्ट हैं? तो समझ लीजिए कि आपने आधा किला फतह कर लिया है। लेकिन ध्यान रहे, ऐसा न लगे कि आप इसी सवाल का इंतजार कर रहे थे। 

वे समझेंगे कि आप किसी और के लिए जासूसी कर रहे हैं और वहीं आपकी संभावनाओं का अंत हो जाएगा। वैसे भी देशी जीवन से बचने के लिए आपके पास क्या विकल्प है? फिर खुफिया एजेंसियों में से चुनने का अवसर भी सीमित है। फ्रेंच और ब्रिटिश तकरीबन दिवालिया हैं और उनके ही कई लोग खुद सीआईए के लिए काम करने के इच्छुक हैं। पाकिस्तान, चीन और बांग्लादेश का तो सवाल ही नहीं उठता, क्योंकि उनके लिए काम करना देश से गद्दारी होगी। अब ले देकर सिर्फ ‘केजीबी’ बचती है। लेकिन उनके पास आपको देने के लिए है ही क्या? बर्फ, साइबेरिया की खुली हवा, ठंडा और पराया-सा मॉस्को और साथ देने के लिए कोई भालूनुमा रूसी। नहीं, किसी भी सूरत में नहीं। सीआईए और सिर्फ सीआईए। और कौन जाने, आप अगर भारत और अमेरिका दोनों को एक-दूसरे के नजदीक ले ही आएं!
वरिष्ठ पत्रकार, रविंद्र दुबे।   
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