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ग्लेशियरों पर किसी का नियंत्रण नहीं, लेकिन भूकंप के इस टॉप जोन में प्रलय को कंट्रोल कर सकते हैं

Mon, 08 Feb 2021 06:21 PM IST
Harendra Chaudhary जितेंद्र भारद्वाज, अमर उजाला, नई दिल्ली

सार

अभी तक उत्तराखंड में पावर प्लांट निर्माण को लेकर किसी ठोस नीति पर काम नहीं हो रहा। पावर प्लांट मंजूर होता है और निर्माणकार्य शुरू, केवल यही हो रहा है...
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glacier - फोटो : Amar Ujala (File)
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विस्तार
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उत्तराखंड में ग्लेशियरों को रोकना संभव नहीं है। राज्य में छोटे-बड़े सभी तरह के ग्लेशियर हैं। कब कौन से ग्लेशियर का प्रलय झेलना पड़ जाए, इस बाबत कुछ कहा नहीं जा सकता। हालांकि इनकी प्रलय और उससे होने वाले नुकसान पर नियंत्रण संभव है। इसमें उत्तराखंड सरकार या पावर प्रोजेक्ट का निर्माण करने वाली कंपनियों के हाथ में ज्यादा कुछ नहीं है। भारत सरकार और उसके वैज्ञानिकों की टीम अगर इस दिशा में जुटती है तो ग्लेशियरों की मारक क्षमता व उससे होने वाले नुकसान को काफी हद तक कम कर सकते हैं।

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सेंटर फॉर साइंस एंड एनवायरनमेंट के प्रोग्राम डायरेक्टर 'क्लाइमेट चेंज' सम्राट सेन गुप्ता कहते हैं, उत्तराखंड युवा हिमालयन रेंज में आता है। भूकंपीय क्षेत्र का जोन-5, जिसे बहुत गंभीर तीव्रता वाला क्षेत्र कहा जाता है, उत्तराखंड इसका हिस्सा है। अब पावर प्रोजेक्ट को रोकना या संचालित प्लांट को उखाड़ना भी संभव नहीं है। ऐसे में ग्लेशियरों के आसपास और नदियों पर सुरक्षित निर्माणकार्य एवं वन क्षेत्र बढ़ाकर इसके भारी नुकसान को कम कर सकते हैं।

सम्राट सेन गुप्ता के मुताबिक, उत्तराखंड में ग्लेशियर तो हैं ही, इसके अलावा बड़ी नदियां भी हैं। कई राज्यों तक यहां के ग्लेशियरों का पानी पहुंचता है। ऐसा कोई प्रबंधन नहीं है कि जिनकी मदद से ग्लेशियरों से होने वाली आपदा को रोका जा सके। बहुत से पर्यावरणविदों का बयान आता है कि उत्तराखंड में नदियों पर बन रहे बड़े बांध इस तरह की प्राकृतिक आपदाओं के लिए जिम्मेदार हैं। यह बात सही है। दूसरे पक्ष के लोग कहते हैं कि विकास भी तो जरूरी है।
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वह कहते हैं, पावर प्रोजेक्ट को अधर में तो नहीं छोड़ा जा सकता। ऐसा भी संभव नहीं है कि भविष्य में ये प्लांट न लगाए जाएं। ग्लेशियर तो आते रहेंगे, यहां पर लड़ाई ये है कि इनकी मारक क्षमता को कम कैसे करें। उत्तराखंड में डैम और टनल, इनका निर्माण कार्य व्यवस्थित होना अनिवार्य है। यहां का भूगर्भ पहले से ही कमजोर है, ऐसे में प्राकृतिक आपदा आती रहेंगी।

अभी तक उत्तराखंड में पावर प्लांट निर्माण को लेकर किसी ठोस नीति पर काम नहीं हो रहा। पावर प्लांट मंजूर होता है और निर्माणकार्य शुरू, केवल यही हो रहा है। इन जगहों पर प्राकृतिक आपदाओं का प्रभाव कम किया जा सकता है। भारत सरकार के विभिन्न मंत्रालय को इस योजना में शामिल किया जाए। खासतौर पर वन विभाग, टनल एक्सपर्ट और जल संसाधन मंत्रालय, इन्हें एक संयुक्त नीति पर काम करना होगा। मौजूदा समय में अनेक प्रोजेक्ट ऐसे हो सकते हैं, जिनके निर्माणकार्य में सौ फीसदी नियमों का पालन नहीं किया गया है।

इन प्लांट की जांच पड़ताल और उन्हें फाइनल मंजूरी देने वाली संस्था को जिम्मेदारी लेनी पड़ेगी। भारत सरकार को प्लानिंग में शामिल होना होगा। मौजूदा प्लांट और भावी प्लांट की साइट पर डीआरडीओ व पावर क्षेत्र के वैज्ञानिकों को मौके पर जाकर रिपोर्ट तैयार करनी चाहिए। निर्माण साइट की निगरानी का दायरा बढ़ाना आवश्यक है। इसमें किसी तरह की बाईपास नीति न रहे।

सम्राट सेन का कहना है कि सभी पावर प्लांट के आसपास आबादी, जिसमें वर्किंग साइट व दूसरे स्थानीय लोग शामिल हैं, उनके लिए सुरक्षित स्थल बनाना सबसे जरूरी है। प्राकृतिक आपदा की सूचना देने के लिए एक ऐसा अलार्म इन क्षेत्रों में लगाना होगा, जिसकी पहुंच जंगल और पहाड़ में दूर तक सुनाई दे। क्षतिपूरक वनीकरण कोष एवं क्षतिपूरक वनीकरण कोष प्रबंधन एवं योजना प्राधिकरण के तहत पौधे लगाने के लिए जो पैसा मिलता है, उसका इस्तेमाल दूसरे किसी कार्य में न हो।

देखने में आया है कि इस योजना के तहत आए करोड़ों रुपयों का इस्तेमाल कंप्यूटर खरीदने के लिए होता है। नियम ये है कि इस योजना के एक-एक पैसे को वन क्षेत्र बढ़ाने में लगाया जाए। सभी पावर प्रोजेक्ट का दोबारा से सिक्योरिटी ऑडिट कराया जाए। केंद्र के वैज्ञानिकों की टीम द्वारा नदी के किनारे, टनल और प्लांट के आसपास नए सिरे से सुरक्षा उपकरण लगाए जाएं।
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