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जानिए अविश्वास प्रस्ताव से किस पार्टी को हुआ फायदा, किसे पहुंचा नुकसान

Sat, 21 Jul 2018 06:23 PM IST
न्यूज डेस्क, अमर उजाला, नई दिल्ली
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नरेंद्र मोदी - फोटो : PTI
अविश्वास प्रस्ताव लाए जाने से नरेंद्र मोदी की चार साल पुरानी सरकार को भले ही कोई डर नहीं रहा हो, लेकिन इसने सभी राजनीतिक दलों को 2019 के लोकसभा चुनावों के लिए खुद को कमर कसने का एक मौका जरूर दे दिया। सवाल यह है कि विभिन्न राजनीतिक पार्टियों की अविश्वास प्रस्ताव के मतदान से क्या हासिल करने की मंशा थी। पेश है एक विश्लेषण। 

कांग्रेस 

यह जानते हुए भी कि यह निश्चित था कि अविश्वास प्रस्ताव के नतीजे खिलाफ ही होंगे, कांग्रेस का एकमात्र लक्ष्य अविश्वास प्रस्ताव के साथ सरकार पर हमला करना था और राहुल गांधी को एक सक्षम नेता के रूप में पेश करना था। पार्टी ऊंचे मनोबल के साथ उभरी और उसने इस बात से आश्वस्त किया कि, राहुल गांधी ने अपने आत्मविश्वास से भरे आक्रामक भाषण और प्रधान मंत्री नरेंद्र मोदी को गले लगाकर, आकर्षण का केंद्र बन गए। हालांकि पार्टी के लिए अब यह चुनौती है कि इस फायदे को चुनावी जीत में कैसे बदले।
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भाजपा को क्या मिला

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राहुल गांधी, नरेंद्र मोदी
भारतीय जनता पार्टी (भाजपा)

भाजपा शुक्रवार के मतदान में विजेता बनकर उभरी। इसने दो तिहाई बहुमत के खुद के लक्ष्य से कहीं ज्यादा विश्वास मत हासिल किया जो सदन के 70 फीसदी से भी ज्यादा था। दोपहर में पार्टी ने जरूर झटके का सामना किया जब राहुल गांधी ने व्यक्तिगत और आक्रामक हमला किया। लेकिन प्रधानमंत्री मोदी के भाषण के साथ ही पार्टी ने महसूस किया कि पूरी बहस फिर से उनकी पकड़ में आ गई है। पार्टी के अध्यक्ष अमित शाह ने ट्वीट किया कि यह जीत 2019 के चुनावों की एक झांकी है। 
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शिवसेना को कुछ मिला भी!

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उद्धव ठाकरे
शिवसेना

शिवसेना सदन की कार्यवाही से बाहर रही। गुरुवार दोपहर को सरकार का समर्थन करने का फैसला करने के बाद, फिर उसी शाम को अपना फैसला पलट दिया और आखिरकार अविश्वास प्रस्ताव और मतदान का बहिष्कार करने का निर्णय लिया। पार्टी के हर क्षण बदलते फैसले भाजपा के साथ उसके जटिल संबंध को दर्शाते हैं। यह केंद्र और महाराष्ट्र में सरकार में सहयोगी है। फिर भी, यह नाराज है और मानती है कि बीजेपी ने उसकी जगह कम कर दी है। यह अंदर नहीं है, लेकिन यह बाहर भी नहीं है। 

एआईएडीएमके ने खोल दिए पत्ते

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एआईएडीएमके
अखिल भारतीय अन्ना द्रविड़ मुनेत्र कड़गम (एआईएडीएमके) 

तमिलनाडु की सत्तारूढ़ पार्टी ने सरकार के पक्ष में मतदान किया। भाजपा के पक्ष में पार्टी की नजदीकी, खास तौर से जयललिता की मृत्यु के बाद जगजाहिर थी। इसने राजनीतिक और नीतिगत मुद्दों पर प्रत्यक्ष और अप्रत्यक्ष रूप से एनडीए का समर्थन किया है। ऐसी उम्मीद की जा रही थी कि वे मतदान से दूर रहेंगे। लेकिन इस खुले समर्थन का असर तमिलनाडु में देखने को मिलेगा, जहां एआईएडीएमके बंटा हुआ है और बाहरी चुनौतियों का सामना कर रहा है। 
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प्रस्ताव लाने वाली टीडीपी को क्या हासिल हुआ?

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चंद्रबाबू नायडू
तेलुगू देशम पार्टी (टीडीपी) 

टीडीपी ने सदन में अपने प्रस्ताव से बहस शुरू की थी। वह निश्चित तौर पर इस बात से खुश नहीं होगी कि सदन में हुई बहुत से विषयों पर चर्चा हुई लेकिन उनका आंध्र प्रदेश को विशेष दर्जा देने से कोई खास ताल्लुक नहीं थी। लेकिन तथ्य यह है कि संसद ने टीडीपी द्वारा लाए गए प्रस्ताव पर बहस किया, जिसका फायदा पार्टी को अपने राज्य में मिलेगा कि उसने राज्य के हितों के लिए केंद्र और दिल्ली को चुनौती दे दी। 
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टीआरएस का दांव पर क्या था

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के. चंद्रशेखर राव
तेलंगाना राष्ट्र समिति (टीआरएस) 

टीआरएस ने मतदान में हिस्सा नहीं लिया। शुक्रवार के संसद में हुए मतदान की जड़ तेलंगाना राज्य बनाना था। जिसे लेकर आंध्र में नाराजगी है और वे विशेष दर्जा मांग रहे हैं। टीआरएस ने यह स्पष्ट कर दिया कि चूंकि यह मुद्दा आंध्र को लेकर था, इसलिए उनका इससे कोई संबंध नहीं है। लेकिन पार्टी के रुख से यह अटकलें लगाई जा रही हैं कि टीआरएस की भाजपा के साथ एक तरह की समझदारी बनी हुई थी। इसके साथ ही, टीआरएस मुख्य के चंद्रशेखर राव ने खुद को संघीय मोर्चे के नेता के रूप में भी पेश किया हुआ है। 
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बीजेडी ने क्या साबित किया?

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नवीन पटनायक
बीजू जनता दल (बीजेडी) 

बीजेडी ने सदन का बहिष्कार किया था। उनका यह कदम नवीन पटनायक की राजनीतिक शैली की अनोखी झलक थी। वे अपने राज्य के बहुत दबंग राजनीतिक योद्धा हैं, भले ही उनके बार में इस बारे में कम बात की जाती है। लेकिन वे दिल्ली की राजनीतिक लड़ाई में उलझने से थोड़ा परहेज करते हैं जिसका उनके राज्य में कोई खास चुनावी फायदा नहीं दिखता। हालांकि बीजेडी अब ओडिशा में आक्रामक बीजेपी का सामना कर रही है, फिर भी उनके इस कदम को सरकार का समर्थन करने के रूप में देखा गया। 
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