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Section 66A: सुप्रीम कोर्ट का निर्देश, धारा 66 ए के तहत किसी भी नागरिक पर नहीं चलाया जा सकता मुकदमा

Wed, 12 Oct 2022 05:52 PM IST
Amit Mandal न्यूज डेस्क, अमर उजाला, नई दिल्ली

सार

शीर्ष अदालत ने 24 मार्च, 2015 को यह कहते हुए प्रावधान को हटा दिया था कि जनता का जानने का अधिकार सीधे सूचना प्रौद्योगिकी अधिनियम की धारा 66 ए से प्रभावित होता है।
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सुप्रीम कोर्ट - फोटो : Social media
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विस्तार
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सुप्रीम कोर्ट ने बुधवार को निर्देश दिया कि सूचना प्रौद्योगिकी अधिनियम, 2000 की धारा 66 ए के तहत किसी भी नागरिक पर मुकदमा नहीं चलाया जा सकता है, जिसे उसने 2015 में खत्म कर दिया था। रद्द की गई धारा के तहत आपत्तिजनक सामग्री पोस्ट करने वाले व्यक्ति को तीन साल तक की जेल हो सकती है और साथ ही जुर्माना लग सकता है। शीर्ष अदालत ने 24 मार्च, 2015 को यह कहते हुए प्रावधान को हटा दिया था कि जनता का जानने का अधिकार सीधे सूचना प्रौद्योगिकी अधिनियम की धारा 66 ए से प्रभावित होता है।

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सभी राज्यों और पुलिस अधिकारियों को दिया निर्देश 
मुख्य न्यायाधीश यू यू ललित की अध्यक्षता वाली पीठ ने कहा कि ऐसे सभी मामलों में जहां नागरिक अधिनियम की धारा 66-ए के उल्लंघन के लिए अभियोजन का सामना कर रहे हैं, उक्त प्रावधान पर संदर्भ हटा दिया जाएगा। हम सभी पुलिस महानिदेशकों के साथ-साथ राज्यों के गृह सचिवों और केंद्र शासित प्रदेशों में सक्षम अधिकारियों को निर्देश देते हैं कि वे अपने-अपने राज्यों / केंद्र शासित प्रदेशों में पूरे पुलिस बल को निर्देश दें कि वे धारा 66 ए के कथित उल्लंघन के संबंध में अपराध की कोई शिकायत दर्ज न करें।  

शीर्ष अदालत ने स्पष्ट किया कि यह निर्देश केवल धारा 66ए के तहत दंडनीय अपराध के संबंध में लागू होगा और यदि संबंधित अपराध में अन्य अपराधों का भी आरोप लगाया जाता है तो केवल धारा 66ए पर संदर्भ और निर्भरता को हटा दिया जाएगा। पीठ ने कहा कि केंद्र के वकील ने धारा 66ए के तहत लंबित मामलों के संबंध में एक अखिल भारतीय स्थिति रिपोर्ट को रिकॉर्ड में रखा है। इसने देखा कि जानकारी से पता चलता है कि शीर्ष अदालत द्वारा अधिनियम की धारा 66 ए की वैधता के बारे में निर्णय लेने के बावजूद कई आपराधिक कार्यवाही अभी भी इस प्रावधान पर निर्भर करती है और नागरिक अभी भी अभियोजन का सामना कर रहे हैं।
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पीठ ने कहा, इस तरह की आपराधिक कार्यवाही हमारे विचार में श्रेया सिंघल बनाम भारत संघ (मार्च 2015 के फैसले) में इस अदालत द्वारा जारी निर्देशों के सीधे तौर पर हैं और इसके परिणामस्वरूप हम ये निर्देश जारी करते हैं। ये दोहराने की आवश्यकता नहीं है कि 2000 अधिनियम की धारा 66 ए को इस अदालत ने श्रेया सिंघल बनाम भारत संघ में संविधान का उल्लंघन करने वाला पाया है और इस तरह किसी भी नागरिक पर मुकदमा नहीं चलाया जा सकता है। 

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