एक संसदीय समिति ने कहा है कि भारत सरकार में समूह ए, बी और सी पदों पर अन्य पिछड़ा वर्ग (ओबीसी) को 27 प्रतिशत प्रतिनिधित्व परिलक्षित नहीं हो रहा है। इससे आरक्षण नीति के पीछे कल्याण की भावना के दृष्टिकोण की अवहेलना हो रही है। लोकसभा सदस्य राजेश वर्मा की अध्यक्षता में गठित संसदीय समिति ने कार्मिक और प्रशिक्षण विभाग को ओबीसी से भरे जाने वाले पदों के प्रतिशत में अंतर की समीक्षा करने और नियमों का कड़ाई से पालन के लिए सभी संभव तरीके सुनिश्चित करने की सिफारिश की। यह रिपोर्ट बृहस्पतिवार को लोकसभा में पेश की गई।
रिपोर्ट में कहा गया है कि समिति को देश भर में अपने अध्ययन दौरों से राज्य स्तर पर जारी किए जाने वाले ओबीसी जाति प्रमाण पत्र के प्रारूप में भिन्नता की जानकारी मिली है। पाया गया है कि लाभार्थियों के बीच भ्रम की स्थिति है। इसके अलावा ओबीसी को सर्वाधिक पिछड़ा वर्ग (एमबीसी) और अत्यंत पिछड़ा वर्ग (ईबीसी) में उपवर्गीकृत करने की प्रथा को भी समिति के ध्यान में लाया गया।
संसदीय समिति ने की केंद्र व राज्य एजेंसियों की खिंचाई
कांग्रेस सांसद अधीर रंजन चौधरी की अध्यक्षता वाली समिति ने दिल्ली, पंजाब व सिक्किम में प्लास्टिक कचरा प्रबंधन नियमों की 2015 से 2020 के बीच अनुपालन की समीक्षा की। समिति ने कहा कि एजेंसियां कमजोर रवैया अपना रही हैं।
ये खामियां उजागर: प्लास्टिक कचरे पर नियंत्रण, उसके संग्रहण और सुरक्षित निस्तारण के लिए सभी संबंधित एजेंसियां व विभाग मिलकर काम नहीं कर रहे। शहरी विकास विभाग उचित निर्णय लेने के लिए मंत्रालय को सही और पूरा डाटा नहीं दे रहे। इससे सही मूल्यांकन नहीं हो रहा, न निस्तारण के प्रभावी रास्ते निकल रहे हैं।
कार्बन टैक्स 3 साल टालने के लिए यूरोपीय संघ से बात करे सरकार
प्रमुख उत्पादों का देश से निर्यात बढ़ाने और आयात घटाने की रणनीति पर अपनी रिपोर्ट में संसद की स्थायी समिति ने सरकार को कहा कि वह सूक्ष्म, लघु एवं मध्यम उद्योगों (एमएसएमई) पर कार्बन टैक्स टालने के लिए यूरोपीय संघ से बात करे। इसे 3 साल के लिए टाला जाए, क्योंकि घरेलू उद्योगों और उत्पादकों के पास टैक्स से जूझने के लिए जरूरी संसाधन नहीं हैं। यूरोपीय संघ ने एक जनवरी 2026 से सात सेक्टरों पर कार्बन बॉर्डर एडजस्टमेंट मैकेनिज्म नाम से कार्बन टैक्स लगाने की घोषणा की है।
कॉफी उद्योग: 55 प्रतिशत कॉफी यूरोपीय संघ को निर्यात होती है। उसने जंगलों की कटाई को लेकर कॉफी उद्योग के लिए कुछ नियम बनाए हैं, इसका बुरा असर कॉफी निर्यात पर हो सकता है।