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फिर 'पलटूराम' बने नीतीश कुमार!: बिहार में टूटा जदयू-भाजपा का गठबंधन, जानें सीएम को ये नाम मिला कैसे?

Tue, 09 Aug 2022 06:38 PM IST
कीर्तिवर्धन मिश्र न्यूज डेस्क, अमर उजाला, नई दिल्ली

सार

आखिर नीतीश कुमार को पलटूराम का नाम दिया किसने? किस वजह से विपक्षी नेता उन्हें बार-बार पलटूराम कहते हैं? वह कौन-कौन से मौके रहे, जब नीतीश कुमार के इस नाम की चर्चा सबसे ज्यादा रही?
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बिहार की राजनीति - फोटो : अमर उजाला
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विस्तार
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बिहार में एक बार फिर भाजपा और जनता दल यूनाइटेड (जदयू) गठबंधन टूट गया है। हालांकि, जल्द ही नीतीश फिर से मुख्यमंत्री बन सकते हैं। वह राष्ट्रीय जनता दल (राजद) के साथ महागठबंधन की सरकार का नेतृत्व करेंगे।  इस बीच सोशल मीडिया पर एक बार फिर नीतीश कुमार को 'पलटूराम' नाम से बुलाया जा रहा है। नीतीश के साथ ये नाम हाल ही में नहीं जुड़ा है। 
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आखिर नीतीश कुमार को पलटूराम का नाम दिया किसने? किस वजह से विपक्षी नेता उन्हें बार-बार पलटूराम कहते हैं? वह कौन-कौन से मौके रहे, जब नीतीश कुमार के इस नाम की चर्चा सबसे ज्यादा रही?
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नीतीश कुमार को किसने दिया पलटूराम का नाम?
नीतीश कुमार के करीब चार दशक लंबे राजनीतिक करियर में उन्होंने पांच बार पाला बदला है। इस दौरान उनके ऊपर लालू प्रसाद यादव के अलावा जॉर्ज फर्नांडिस और शरद यादव जैसे नेताओं को किनारे लगाने का आरोप लगा। नीतीश को सबसे पहले राजद अध्यक्ष लालू प्रसाद यादव ने पलटूराम कहा था।

कैसा रहा है नीतीश कुमार का पाला बदलने का इतिहास?

लालू पसाद यादव-नीतीश कुमार - फोटो : PTI
1994: जिसे कहा बड़ा भाई, उसी के खिलाफ की बगावत
नीतीश ने बिहार में राजनीति की शुरुआत लालू प्रसाद यादव के साथ ही की थी। जयप्रकाश नारायण के आंदोलन के दौरान दोनों नेताओं ने जबरदस्त नेतृत्व क्षमता का प्रदर्शन किया। यह वह दौर था, जब नीतीश ने लालू यादव को अपना 'बड़ा भाई' तक करार दे दिया था। 

मार्च 1990 में नीतीश कुमार ने लालू प्रसाद यादव को बिहार का मुख्यमंत्री बनाने में अहम भूमिका निभाई। हालांकि, जल्द ही उन्होंने जनता दल पर लालू के नियंत्रण का विरोध शुरू कर दिया। 1994 आते-आते नीतीश ने जॉर्ज फर्नांडिस के साथ मिलकर समता पार्टी बना ली। 2003 में फर्नांडिस की समता पार्टी और बिहार की कुछ अन्य छोटी पार्टियों को मिलाकर जनता दल (यूनाइटेड) बना। समता पार्टी के दौर से ही नीतीश भाजपा के साथ रहे। 

पीएम मोदी और नीतीश कुमार
2013: भाजपा के साथ गठबंधन छोड़ने का दौर
1998 में जब एनडीए की केंद्र में सरकार बनी तो नीतीश और जॉर्ज फर्नाडिस  अटल कैबिनेट का हिस्सा थे। नीतीश कुमार ने तब वाजपेयी और लालकृष्ण आडवाणी को अपना पसंदीदा नेता करार दिया था। हालांकि, 2013 में लोकसभा चुनाव से ठीक पहले नीतीश कुमार ने भाजपा से 17 साल का गठबंधन तोड़ लिया। उनकी नाराजगी की वजह नरेंद्र मोदी थे, जिन्हें भाजपा ने प्रधानमंत्री पद का उम्मीदवार बनाया था। कहा जाता है कि नीतीश एनडीए की तरफ से ऐसा पीएम प्रत्याशी चाहते थे, जो साफ और धर्मनिरपेक्ष छवि वाला हो। भाजपा से अलग होने के बाद ही नीतीश ने संघ-मुक्त भारत का नारा दिया था। तब उन्होंने यहां तक कह दिया था कि मिट्टी में मिल जाएंगे, भाजपा के साथ वापस नहीं जाएंगे। 

नीतीश कुमार और तेजस्वी यादव(फाइल फोटो) - फोटो : Social media
2017: दूसरी बार छोड़ा लालू की पार्टी का साथ
बिहार में 2015 का विधानसभा चुनाव नीतीश कुमार ने राजद के साथ लड़ा। कांग्रेस और लेफ्ट पार्टियों के साथ इसे महागठबंधन नाम दिया गया। इस महागठबंधन ने बिहार में 178 सीटें जीतीं और नीतीश कुमार फिर मुख्यमंत्री बने। हालांकि, 2017 में नीतीश कुमार एक बार फिर इस गठबंधन से अलग हो गए। आईआरसीटीसी घोटाले के मामले में लालू और उनके बेटों की संपत्ति पर सीबीआई के छापे पड़ने के बाद नीतीश कुमार ने तेजस्वी यादव से जवाब मांगा। राजद ने भी इसे असम्मान के तौर पर देखा। इसके बाद नीतीश ने महागठबंधन को भी छोड़ने का फैसला किया और एनडीए के साथ जुड़ गए। नीतीश की वापसी के पीछे भाजपा के नेता सुशील मोदी की अहम भूमिका मानी जाती है। सुशील मोदी को नीतीश कुमार ने इस नई सरकार में डिप्टी सीएम बनाया। 

राजद प्रमुख लालू प्रसाद यादव ने नीतीश कुमार की इस कदम को धोखाधड़ी करार दिया और निजी लाभों के लिए महागठबंधन में टूट का कारण बताया। लालू ने तब नीतीश को मौकापरस्त और पलटूराम नेता तक कह दिया था। यहीं से बिहार सीएम के साथ पलटूराम नाम जुड़ गया। 
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नीतीश कुमार-तेजस्वी यादव का फिर मिलन - फोटो : Amar Ujala
2022: भाजपा को भी नीतीश ने दिया दूसरा झटका
2017 में भाजपा के साथ लौटने के बाद 2020 का विधानसभा चुनाव जदयू ने एनडीए गठबंधन में रहते हुए ही लड़ा। हालांकि, नतीजों के एलान के साथ ही यह साफ हो गया कि एनडीए गठबंधन में अब जदयू बड़े भाई की भूमिका खो चुकी है। बल्कि 74 सीट जीतकर भाजपा सीधे-सीधे राजद से टक्कर में आ गई। इस बीच बिहार के मुख्यमंत्री के लिए नीतीश कुमार के नाम के एलान को लेकर भी पसोपेश की स्थिति रही। 

एक बार जब भाजपा ने नीतीश कुमार को सीएम बनाने का एलान कर दिया, तब भी दोनों पार्टियों के बीच जारी विवाद कम नहीं हुए। चाहे जनसंख्या नियंत्रण विधेयक की बात हो, जातिगत जनगणना या बिहार के लिए विशेष दर्जे की मांग। भाजपा और जदयू में विवाद बना रहा। इसके बाद भाजपा नेताओं के बयान और आरसीपी सिंह के केंद्र सरकार से करीबी बढ़ाने के मामलों ने दोनों पार्टियों के बीच दरार को खाई में बदलने का काम किया और नीतीश कुमार ने आखिरकार भाजपा से गठबंधन तोड़ दिया।
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