गंगा को निर्मल और अविरल बनाने की कड़ी में किए जा रहे प्रयासों में सबसे बड़ी बाधा इस नदी पर बने या बनाए जा रहे बांध हैं। विशेषज्ञों का मानना है कि गंगा को स्वच्छ बनाने के लिए इन बांधों से उसकी मुक्ति जरूरी है। गंगा जीर्णोद्धार मामले पर बनी संसद की प्राकलन समिति ने भी बांधों की बाधा को खत्म करने को जरूरी माना है। समिति का कहना है कि गंगा को निर्मल बनाने के लिए उसकी अविरलता जरूरी है। गंगा में पानी का बहाव निश्चित करने की सलाह दी गई है।
वरिष्ठ सांसद मुरली मनोहर जोशी की अगुवाई वाली तीस सदस्यीय संसदीय समिति की रिपोर्ट में बांधों को समाप्त करने पर जोर दिया गया है। रिपोर्ट में अनुसंधान समितियों के निष्कर्ष के हवाले से कहा गया है कि नदियों पर जल विद्युत परियोजनाओं के निर्माण से निश्चित तौर पर स्थानीय परिस्थितियों पर अतिरिक्त बोझ पड़ा है। साफ किया है कि वन की हानि, जल गुणवत्ता, भूगर्भीय जल प्रभाव के रूप में पर्यावरण को साफ तौर पर नुकसान दिखाई दे रहा है। सावधान किया है कि ऐसा होने से लगातार भूखस्लन और दूसरी अपदाओं का खतरा बढ़ जाने की आशंका है।
रिपोर्ट में इस बात की उठाया गया है कि गंगा नदी पर मौजूद बंधे और विद्युत संयंत्रों (एचईपीसी), जल भंडारण और विद्युत उत्पादन परियोजना एक तरह से इसको घेरे हुए हैं।समिति ने विद्युत मंत्रालय के रिपोर्ट में आकंड़े के आधार पर बताया है कि गंगा नदी और उसकी सहायक नदियों पर 2668 मेगावाट की कुल क्षमता वाली सात स्कीम फिलहाल प्रचलन में हैं। संसदीय समिति की रिपोर्ट में पर्यावरण और जल मंत्रालय की तरफ से जारी रिपोर्ट का हवाला देकर कहा गया है कि गंगा, भगीरथी और अलकनंदा बेसिन में जल विद्युत परियोजनाओं से भी पर्यावरण पर दबाव बढ़ रहा है।