राष्ट्रीय हरित न्यायाधिकरण ने उत्तराखंड के मुख्य सचिव को यह सुनिश्चित करने का निर्देश दिया है कि गंगा में अनुपचारित कचरा न जाए। एनजीटी ने साथ ही मुख्य सचिव को ऋषिकेश में अनुपचारित कचरा गंगा में बहाए जाने वाली शिकायत पर भी संज्ञान लेने का निर्देश दिया। साथ ही राज्य में अपेक्षित सीवेज उपचार संयंत्र स्थापित करने के लिए पर्याप्त व्यवस्था सुनिश्चित करने को कहा।
एनजीटी अध्यक्ष जस्टिस आदर्श कुमार गोयल की पीठ ने याचिकाकर्ता की उन दलीलों पर गौर किया जिसमें कहा गया कि नगर निगम के एजेंट ऋषिकेश में गंगा के तट पर बने शौचालय के बाहर लगे नलों में नहाते हैं और अपने वाहन धोते हैं। पीठ ने कहा, हम उत्तराखंड के मुख्य सचिव को इस मामले में संज्ञान लेने और कानून के दायरे में उचित कार्रवाई करने का निर्देश देते हैं।
एनजीटी का आदेश उस याचिका पर आया जिसमें एनजीटी के ही 3 जनवरी 2022 के आदेश को लागू करने की मांग की गई है। एनजीटी ने उत्तराखंड सरकार को यह सुनिश्चित करने का आदेश दिया था कि गंगा और उसकी सहायक नदियों में अनुपचारित कचरा न जाने पाए। इसके साथ ही एनजीटी ने नगरपालिका स्तर पर निगरानी सेल खोलने व जागरूकता अभियान चलाने को भी कहा था।
मसूरी झील से पानी की निकासी में अनियमितता पर रिपोर्ट मांगी
एनजीटी ने एक दूसरे मामले की सुनवाई में उत्तराखंड सरकार से मसूरी के निजी होटलों द्वारा मसूरी झील से पानी निकासी में अनियमितता पर रिपोर्ट तलब की है। जस्टिस आदर्श कुमार गोयल की पीठ ने कहा, झील से पानी की अनियंत्रित निकासी निश्चित रूप से प्राकृतिक जल चक्र और इसके द्वारा किए जाने वाले पर्यावरणीय कार्यों को प्रभावित कर सकती है। इसलिए वैधानिक नियामकों द्वारा वास्तविक स्थिति और उपचारात्मक कार्रवाई का पता लगाना जरूरी है।
एनजीटी ने साथ ही एक समिति का गठन किया जिसमें केंद्रीय प्रदूषण नियंत्रण बोर्ड, उत्तराखंड प्रदूषण नियंत्रण बोर्ड, देहरादून जिला मजिस्ट्रेट और राज्य आर्द्रभूमि प्राधिकरण के अधिकारी शामिल हैं। यह समिति दो महीनों के भीतर तथ्य एवं की गई कार्रवाई की रिपोर्ट ईमेल के जरिये एनजीटी के समक्ष पेश करेंगे। इस मामले में अगली सुनवाई 25 जुलाई को होगी।