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एनजीटी: बंद सार्वजनिक स्थलों में भी सुधरे खराब हवा, संबंधित विभागों की समिति बनाकर तीन माह में नियम बनाने के आदेश

Thu, 28 Apr 2022 06:58 AM IST
देव कश्यप अमर उजाला ब्यूरो, नई दिल्ली।
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एनजीटी - फोटो : NGT
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चारों तरफ से बंद सार्वजनिक स्थलों में भी बिगड़ती हवा पर चिंता जाहिर करते हुए राष्ट्रीय हरित प्राधिकरण (एनजीटी) ने इसमें सुधार के निर्देश दिए हैं।

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इसके लिए केंद्रीय पर्यावरण, वन व जलवायु परिवर्तन मंत्रालय और केंद्रीय प्रदूषण नियंत्रण बोर्ड (सीपीसीबी) को शहरी मामलात व स्वास्थ्य जैसे अन्य मंत्रालयों के साथ एक संयुक्त समिति बनाकर नियमन तैयार करने को कहा गया है। इनडोर हवा की गुणवत्ता सुधारने कीसारी कवायद में नोडल एजेंसी की भूमिका सीपीसीबी को सौंपी गई है।

एनजीटी ने यह निर्देश 19 अप्रैल को याचिकाकर्ता दिलीप नेवतिया के आवेदन पर सुनवाई करते हुए दिए, जिसमें इनडोर वायु प्रदूषण (आईएपी) को आउटडोर वायु प्रदूषण (ओएपी) जितना ही खतरनाक बताया गया था।
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स्वास्थ्य पर पड़ रहा काफी बुरा असर
आवेदक ने आंकड़ों के आधार पर दलील दी कि आईएपी से सार्वजनिक स्वास्थ्य पर काफी बुरा असर पड़ रहा है। इससे बड़े पैमाने पर निमोनिया, फेफड़ों के कैंसर और क्रॉनिक ऑब्सट्रक्टिव पल्मोनरी डिसीज (सीओपीडी) के मरीजों की समय से पहले मौत हो रही है। इन बीमारियों से बच्चे और महिलाएं ज्यादा प्रभावित हो रहे हैं लेकिन सरकार इस ओर ध्यान नहीं दे रही।

एनजीटी अध्यक्ष व मुख्य न्यायाधीश आदर्श कुमार गोयल की अध्यक्षता वाली पीठ ने याचिका पर सुनवाई के बाद कहा कि इस मामले पर बनने वाली संयुक्त समिति एक माह में अपनी पहली बैठक करे। साथ ही आपस में चर्चा कर तीन महीने के भीतर जन स्वास्थ्य की सुरक्षा के लिए सार्वजनिक स्थलों पर पर्यावरण संरक्षण अधिनियम (ईपी एक्ट), ईपी नियम या एयर एक्ट के तहत इनडोर वायु गुणवत्ता के उचित मानक व प्रोटोकॉल तय किए जाएं।

रिपोर्ट मिलने के बाद होंगे जरूरी आदेश
पीठ ने कहा कि समिति की रिपोर्ट मिलने के बाद पर्यावरण मंत्रालय या सीपीसीबी संबंधित वैधानिक प्रावधानों के तहत इस मुद्दे पर जरूरी आदेश जारी कर सकता है। आवेदक के वकील केसी मित्तल ने कहा कि इनडोर वायु प्रदूषण से जुड़ी अधिकांश बीमारियां श्वसन संबंधी हैं। इन जगहों पर हवा में घुली सल्फर डाइऑक्साइड से गले में तकलीफ और अस्थमा में तेजी आती है।
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वहीं, नाइट्रोजन डाइऑक्साइड श्वसन नली संक्रमण और फेफड़ों की कार्यप्रणाली को बिगाड़ देती है। इसके अलावा, कार्बन मोनोऑक्साइड से जन्म के समय बच्चे का कम वजन, प्रसवकालीन रोग और मृत्यु का जोखिम भी पैदा होता है। आवेदक के मुताबिक, बड़े सार्वजनिक भवनों में हवा जनित रोगाणुओं के खिलाफ लोगों की सुरक्षा के लिए वायु अधिनियम 1981 के तहत उचित नियम बनाने की जरूरत है।

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